बुधवार, 11 जून 2014

जीवन का सौन्दर्य

                                   जीवन का सौन्दर्य

          मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ है, ऐसा हम अपने बुजुर्गों से सुनते आ रहे हैं | हमने स्वयं के अनुभव से भी जाना है कि जीवन जीना और समाज के हित में काम करते हुए दुनिया में मिसाल कायम करना आसान नहीं है | मनुष्य जीवन की सार्थकता तभी है जब वह अपने समाज, राष्ट्र और मानवता के लिए कुछ बहुमूल्य काम कर जाएँ | हर मनुष्य बेहतरीन जीवन चाहता है | विद्यार्थी-जीवन हो या युवावस्था या फिर वृद्धावस्था ही क्यों न हो ‘जीवन का सौन्दर्य’ ही प्राथमिक है |
         एक बार की बात है एक विद्यार्थी ने अपने अध्यापक से पूछा – “सर, मैं अपने जीवन में बहुत उपलब्धियां हासिल करना चाहता हूँ | मैं खूब बड़े-बड़े काम कर जाना चाहता हूँ ताकि लोग मुझे और मेरे कामों को हमेशा याद रखें | मैं इस दुनिया को सभी के लिए बेहद खुबसूरत बना देना चाहता हूँ ताकि सभी प्रेम और शांति से रह सकें |” अध्यापक अपने होनहार विद्यार्थी की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे | उन्होंने कहा – “बेटा पहले अपने जीवन को खुबसूरत बनाओ | अगर हम सबका जीवन खुबसूरत बन जाएगा तो यह दुनिया खुद-ब-खुद खुबसूरत लगने लगेगी |” बच्चे ने उत्साह से पूछा – “अपने जीवन को खुबसूरत कैसे बनाया जाए ? आप मुझे बताइए, मैं ऐसा ज़रूर करूँगा |” अध्यापक ने तीन चीजें उस विद्यार्थी को दीं - थोड़ी सी रूई, एक मोमबत्ती और एक सुई |...और कहा - “अब तुम जाओ |” वह बच्चा उन तीनों चीज़ों को लेकर वहां से चल पड़ा, पर उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अध्यापक ने ये चीजें उसे क्यों दीं ! वह वापस उनके पास आकर बोला, ‘‘सर ! यह जो कुछ आपने मुझे दिया, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है !’’ अध्यापक ने समझाया - ‘‘यह जो रूई मैंने तुम्हें दी है, इसकी खासियत यह है कि यह धागा बनकर हर एक की लाज ढंकती है ईश्वर को भी वही इंसान प्यारा है जो दूसरों की लाज ढंकता है और दूसरों को संरक्षण देता है ’’ ‘‘और यह मोमबत्ती?’’ ‘‘मोम बनकर जलती जरूर है, लेकिन प्रकाश बनकर अंधेरा दूर करती है, भटकों को रास्ता दिखाती है। तुम भी इसी तरह के बन जाओ । सदैव दूसरों के लिए प्रकाश बनकर रहना | तुम्हें तीसरी चीज जो मैंने दी है, वह है, सुई । सुई के बिना संसार का काम नहीं चलता यह टुकड़ों को, फटे हुओं को, कटे हुओं को जोडऩे का काम करती है। सुई के बिना कुछ भी नहीं जुड़ा करता। दुनिया में भी वही ईश्वर को प्यारा है जो फटे हुए दिलों को सिला करता है, जो टूटे हुए दिलों को जोड़ा करता है, बिखरे हुओं को जो इकट्ठा करता है।
        बच्चा अपने अध्यापक की बात को बड़े ध्यान से सुन रहा था | उसने उन तीनों चीज़ों को समेटा और उनको प्रणाम करके आत्मविश्वास से अपने घर की ओर चल दिया |
       आज हमारे विद्यार्थियों और युवाओं में इन तीनो गुणों की बेहद आवश्यकता है | जिस दिन हर बालक ऐसा बन जाएगा संसार फिर खुबसूरत हो उठेगा |

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शनिवार, 7 जून 2014

मनुष्य की परख उसकी भीतरी सुन्दरता से ही होती है


               मनुष्य की परख उसकी भीतरी सुन्दरता से ही होती है
            मनुष्य का सम्मान उसकी शक्ल-सूरत, धन-दौलत या रुतबे से नहीं होती बल्कि उसके व्यक्तिगत गुण और उसकी विद्व्यतता ही उसके परिचायक हैं | संकीर्ण मानसिकता के लोग ही बाहरी सौन्दर्य की ओर आकर्षित होते हैं | विद्वान हमेशा भीतरी सुन्दरता को ही परखते हैं | हमारे व्यक्तित्व के वे गुण सराहनीय हैं जिनसे समाज और देश का कल्याण हो | अच्छी शक्ल सूरत होना हमारी निजी उपलब्धि नहीं है बल्कि आनुवंशिक कारण या प्रकृति की देन है | इसी प्रकार धनवान घर में जन्म लेने या धनी बन जाने का तब तक कोई औचित्य नहीं जब तक वो धन मानवता के लिए उपयोग में न लाया जाए | हमारा अपना रुतबा भी व्यक्तिगत ही होता है | इसके जरिये हम समाज में दबदबा तो पैदा कर सकते हैं लेकिन कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल नहीं कर सकते | इसीलिए मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके भीतरी सौन्दर्य और ज्ञान का विकास है |
           एक बार की बात है मिथिलेश नरेश जनक अपने दरबार में सुदूर से आए विद्वानों के साथ अध्यात्म-चर्चा कर रहे थे कि तभी वहां ‘अष्टावक्र’ नामक एक ब्राह्मण-कुमार आ पहुंचे | अष्टावक्र का चेहरा कुरूप था और नाम के अनुरूप उनका शरीर भी विभिन्न जोड़ों से टेढ़ा था | वे बड़ी कठिनाई से यहाँ तक पहुंचे थे क्योंकि राजा जनक विदेह कहे जाते थे और उनके दरबार में संसार भर के विद्वान बड़े सम्मान और गौरव के साथ पहुँचते थे | अष्टावक्र की टेढ़ी-मेढ़ी शारीरिक-संरचना को देखकर वहां उपस्थित दरबारी-जन हंसने लगे | उन्हें इस प्रकार हँसता देख अष्टावक्र भी तीव्र ध्वनि में हँसने लगे | राजा जनक अपने सिंहासन से उठे, उन्होंने ब्राह्मण-कुमार का अभिनन्दन किया और उनके हँसने का कारण पूछा- “महाराज ! इन सब की ओर से मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ किन्तु मुझे आपके हँसने का कारण विदित नहीं हुआ ?” अष्टावक्र ने उनसे पूछा- “विदेहराज ! पहले क्या आप इन सभाजनों के हँसने का कारण बताएंगें ?” जनक ने सर झुका लिया तभी एक ब्राहमण खड़ा हुआ और बोला- “हमें आपकी टेढ़ी-मेढ़ी काया देखकर हंसी आ रही है |” अष्टावक्र ने राजा जनक की ओर देखते हुए मुस्कुरा कर कहा- “राजन! मैंने तो सुना था कि आपके दरबार में विद्वान-जनों का समूह है | इसीलिए मैं भी भागवद्चर्चा के लिए आ पहुंचा | किन्तु मैं तो यहाँ चमारों का जमघट देख रहा हूँ ....यही देखकर मुझे हँसी आ गई |” राजा जनक बेहद शर्मिंदा थे किन्तु तभी एक अन्य ब्राह्मण ने विरोध किया और बोला – “ब्राह्मण ! आप हमें चमार कहकर हमारा अपमान कर रहे हैं |” इस पर अष्टावक्र ने बड़े धैर्य से सबकी ओर देखते हुए उत्तर दिया- “ठीक ही तो कह रहा हूँ | जो लोग हड्डियों और चमड़े की परीक्षा करते हैं, उन्हें चमार न कहूँ तो भला और क्या कहूँ ? मुझे लगा कि आप सभी ज्ञानी होंगें किन्तु आप तो मेरी विकृत-काया को देखकर ही हँसने लगे अतः मुझे भी आप सभी की परख की तुच्छता पर हँसी आ गई |”    
            इसी प्रकार हम भी अक्सर किसी भी मनुष्य के गुणों का आकलन उसके वस्त्रों, शारीरिक बनावट या आर्थिक स्तर के अनुसार करने लगते हैं | जबकि मनुष्य के भीतरी गुण इन सबके मोहताज नहीं हैं | यदि हम अपने व्यक्तिगत गुणों को उभार देकर भीतरी सुन्दरता को निखार लें तो हमारा जीवन सार्थक हो जाए.....क्योंकि आख़िरकार परख तो भीतरी सुन्दरता की ही होती है |  
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-    रश्मि