शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

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प्रकाशन :1/7/2015
रश्मि
ल छोरी ! मंदिर चल म्हारे साथ। थारा जी बहल जावेगा। ”
“मन्ने नी जाना। ”
कजरी जानती थी कि उसकी पोती जिस हादसे से निकली है, उसके ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भरने वाले। कभी वह खुद भी तो इस ज़ख्म से अपने तन-मन को छलनी कर चुकी थी इसलिए अपनी पोती के दर्द को बखूबी समझ सकती थी। वह तो फिर भी सोलह-सत्रह बरस की थी लेकिन उसकी फुलवा ...उसकी पोती वह तो अभी दस ही बरस की है और इतना बड़ा वज्र सह गई। कजरी को अपना लड़कपन याद हो आया। सोलह-सत्रह की ही रही होगी वो, जब गौना होकर अपने सासरे लौटी थी। ...और अपने ही गाँव के मुखिया की बदनियती का शिकार बन गई थी।
उसकी मुँह दिखाई के दिन की बात है, जब पूरे गाँव की लुगाइयाँ उसके आँगन में जुड़ आईं थीं तब सास ने सबके सामने कहा था – “बहुरिया ! पूरे गाँव ने अपना ही घर मानिजो। यहाँ सब तेरे अपने ही रिश्ते-नातेदार हैं। कोई तेरी माँ समान है तो कोई तेरी भाभी समान ...कोई तेरी बहन सरीखी है तो कोई तेरी सहेली-सी। बीनणी ! तू सबने अपना पिता और भाई मानिजो। ”
मैंने भी हामी में अपना सर हिलाया था ...और सच भी था, मुझे पूरे गाँव का प्यार मिला। इतना प्यार कि अपने पीहर की भी सुध न रही थी। जो जो रिश्ते वहाँ पीहर में बिछुड़े, वो सब यहाँ सासरे में मिल गए थे। इन्हीं सब अच्छे लोगों के बीच एक इंसान, उसकी नियत कब बदल गई ...कि राम जाने वह पहले से ही ऐसा ही था, पता ही न चला। वह इंसान था म्हारे ही गाँव का मुखिया। मैं उसके आगे लाख गिड़गिड़ाई ...हाथ जोड़के मिन्नतें कीं ...अपने पेट से होने की दुहाई दी ...लानतें दीं ...तड़फी ...मचली और फिर सिसकती ही रह गई। मैं अपने दर्द को जिस्म में लिए आत्मा के भीतर दबा गई। मुखिया की धमकी और लोकलाज के भय से किसी के भी आगे अपना मुँह न खोला और साल दर साल बीतते गए। वह निगोड़ा मुखिया भी दूसरे ही बरस बीमारी के चलते राम जी को प्यारा हो गया। ...और मैं बड़े जतन करके उस काली याद को किसी अँधेरे कुएँ में दफना आई थी और अपनी आगे की ज़िन्दगी सँवारने लगी।
धीरे-धीरे समय बीता ...सात बच्चे जने ...फिर अपने बच्चों में ही रम गई। माँ बनी ...फिर दादी बनी। अब जब वही सब मेरी पोती के साथ दोहराया गया तो सालों बाद दर्द की सारी परतें फिर उघड़ गईं, ज़खम फिर से हरा हो उठा। उसी मुखिया के बिगड़े सपूत ने म्हारी फूल-सी पोती को मसल डाला। यह तो बेचारी अभी इन सबका मतलब भी न जाने थी। क्या होवे हैं आदमी-औरत के रिश्ते ...कैसी होवे है तन की भूख ...कुछ भी तो न जाने थी। उम्र ही क्या है अभी इसकी, दस बरस की ही तो है अभी म्हारी छोरी। दस बरस में वो क्या जानती तन के खिलवाड़ ...जिस्म के नोच-खंसोट। कजरी मन-ही-मन अपना जी कड़वा किये जा रही थी और सामने बैठी उसकी पोती फुलवा डलिया बिन रही थी।
महीने-भर पहले गाँव के मुखिया के छोरे ने फुलवा की इज्ज़त को तार-तार कर दिया था। घर आकर बहुत रोई बेचारी बच्ची। वह नादान तो अब तक ना समझ पा रही थी कि ‘आखिर उसके साथ ये हुआ क्या है !’
जब फुलवा छोटी-सी थी, तभी से खूब मार खाती आई थी। अपने बापू से खूब पिटती थी। उसकी माँ भी कभी-कभार उसे झाड़ू या चिमटे से पीट देती। बड़ी अम्मा (कजरी) बस चिल्लाकर ही रह जातीं, एक वो ही थीं, जो उसे कभी पीटतीं न थीं। ...यहाँ तक कि उसका छुटका भाई भी जो हाथ आए वही फुलवा पे दे मारता था। इसलिए बचपन से ही मार-पिटाई सहने की खूब आदत थी फुलवा को। उसने देखा था कि जब उसके बापू को छुटके पर खूब गुस्सा आता तो वह उसकी बुशर्ट उतार कर नंगी पीठ पर मारता। इससे छुटके को खूब लगती ...सीधे चमड़ी पे। लेकिन फुलवा इस बात पर बड़ी हैरान होती कि उसकी माँ तो निरीह गाय-सी, पूरे दिन चुपचाप घर भर के काम करती रहती है ...किसी के भी साथ कोई फूटे बोल पलट के भी न बोलती है ...फिर काहे को उसका बापू हर दूसरे तीसरे दिन आधी रात को उसकी माँ का बदन उघाड़ कर पीटता है ! दबोचता है ! कचोटता है ! काहे बेचारी पे चढ़ बैठता है और वह सिसकती रह जाती है ...बस यही बात फुलवा नहीं समझ पाती थी।
एक दिन फुलवा अपनी बनाई टोकरियाँ सिर पर धरकर पगडंडियों और खेतों से होती हुई मंडी की तरफ चली जा रही थी। रास्ते में मुखिया जी का छोरा मिल गया। बोला – “फुलवा ! कहाँ ले जा रही है ये टोकरियाँ ? एक-आध म्हारे घर भी पहुँचा दे। अम्मा खुश हो जाएगी। ”
“भाईसा ! अपने पसंद के रंग और दाम बताओ। मैं कल ही बीन के हवेली पहुँचा दूँगी। ”
“जे बात ! तीन रंग-बिरंगी टोकरीं बीन के हवेली पहुँचा देना और उनके दाम इसी टेम यहीं पे आके म्हारे हाथों से ले जाना। "
‘हाँ’ में सिर हिलाकर फुलवा मंडी को चल दी। वह किसी से भी ज्यादा बोलती चालती ना थी। स्वभाव से वह अपनी माँ पर ही गई थी। काम से काम बस ! न ज्यादा किसी से बोलना ...न ही बिना काम कहीं घूमना-फिरना। फुलवा उस दिन शाम ढले बाज़ार से लौटी, घर पहुँची और चटपट रंगबिरंगी टोकरियाँ बुनने बैठ गई। घर के बाकी लोग भी यह जानकर खूब खुश हुए कि हवेली में टोकरियाँ जावेंगी तो दाम भी अच्छे मिलेंगे। फुलवा अगले दिन बाजार न गई। दिन भर टोकरियाँ बीनती रही। सांझ तक तीन टोकरियाँ बनाकर हवेली पहुँचाने चल दी। हुकुम टोकरियों को देखकर बड़ी खुश हुईं और उन्होंने फुलवा को उनके दाम चुका दिए। जब फुलवा घर लौट रही थी तो गन्ने के घने खेतों के बीच मुखिया के छोरे ने उसे अपनी और घसीट लिया।
“क्यों री ! तूने अम्मा से पैसे क्यों लिए, मैंने कहा था न कि मैं दूँगा। ”
“मालकिन ने दे दिए तो मैं काईं करती भाईसा ?” उसने कसमसाते हुए और खुद को उसके चंगुल से छुड़ाते हुए कहा।
“लेकिन इब म्हने भी देने का मन है ...फुलवा मैं काईं करूँ ? इब म्हारे से भी ले ...।”
फुलवा हाथ जोड़कर माफी माँगती रही... रोती रही ...लेकिन उसके तन से एक-एक कपड़ा उतरता गया। नादान बच्ची अब तक यही सोचती रही कि जैसे मेरा बापू छुटके को (कभी भी) और माँ को (आधी रात को) कपड़े उतार कर पीटता है वैसे ही छोटे मालिक भी पीटेंगे ...और वह मासूम लड़की कुचली जाती रही, मसली जाती रही। जो फुलवा के साथ हो रहा था, वह उसका मतलब भी नहीं समझती थी। बस वह इतना ही जानती थी कि इससे पहले कभी किसी ने उसे इस तरह से नहीं पीटा है। उसकी जांघों के बीच से खून रिस रहा था। तन का हर हिस्सा दुख रहा था। वह समझ ही न पा रही थी कि उसे मारा गया है कि रौंदा गया है। वह इस उम्र में बलात्कार के मायने ही कहाँ जानती थी !
रात होने को आई थी, आसमान धुंधलका हो चला था। फुलवा के मन के भीतर भी गहरी दुविधा मची थी, वह मासूम अब तक इसी ऊहापोह में थी कि छोटे मालिक ने उसका बदन उघाड़ के उसे क्यों पीटा ? क्या उन्हें टोकरियों के रंग पसंद नहीं आए ? ...या मैंने बड़ी मालकिन से पैसे ले लिए क्या इस कारण से नाराज़ हो गए ? ... बेचारी जैसे-तैसे उठी, खुद को समेटा और कराहती हुई घर चल दी। माँ की नज़र ज्यों ही बच्ची पर पड़ी वह दौड़ पड़ी और अपनी कोखजाई को आंचल में छुपाकर कोठरी के भीतर खींच लाई। माँ रोती जाती थी और फुलवा को बाहों में भींचती जाती भी। बापू, बड़ी अम्मा, छुटका सब उसके जिस्म से बहता खून देख-देखकर रो रहे थे। बड़ी माँ ने इतना ही पूछा था – “छोरी थारा जे हाल किस निपूते ने किया ?” ...और फुलवा के मुँह से ‘छोटे मालिक’ का नाम सुनके उसका बापू जहर बुझे सांप-सा बिलबिला के रह गया था। ...फिर कई दिन तक माँ ने फूलवा की देखभाल की। किसी ने भी उसे घर से बाहर ना जाने दिया।
एक दिन फुलवा के बापू ने आकर कहा – “चल फुलवा, म्हारे साथ चल, उस छोरे की सिकायत मैंने सरपंच जी से की थी। सरपंच जी थारा सटेटमेंट लेवेंगे। वे जो भी पूछें सच्ची-सच्ची कह देना, सरमाना मत छोरी ...और ना ही घबराना। मैं तो उस दरिन्दे को कोरट-कचहरी तक खींचूँगा। बड़े होंगे तो अपने घर के। जेल की हवा न खिला दी तो ...।”
फुलवा सिर झुकाए बापू के पीछे-पीछे चल दी। सरपंच ने बच्ची के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कमरे के भीतर ले गए। अकेले में बड़े प्यार से उसका बयान लिया और उसके बापू को दो-तीन दिन बाद फिर आने की कह कर वापस भेज दिया। तीन दिन के बाद विधायक जी ने खुद उसे और फुलवा को हवेली में बुलवा भेजा। फुलवा का बापू समझ गया कि यह सब उसकी शिकायत का ही असर है और अब तो ज़रूर उस छोरे को सजा हो ही जावेगी। वह बेटी को लेकर विधायक की ड्योढ़ी पर पहुँचा।
“राधे ! मैं बच्ची से अकेले में बात करना चाहूँ हूँ। ” ...और वह फुलवा को भीतर ले गया। बड़े प्यार से उसके तन पर हाथ फेर-फेर के बयान लेता रहा।
यूँ ही दो हफ्ते बीत गए। फुलवा की अम्मा ने उसके बापू को खूब समझाया कि, "बेटी की जात है, मत करो जिद्द ...इन ऊँची हवेली वालों को कोई सजा न होवेगी बल्कि हमारी ही इज्जत खाक में मिलती जावेगी। बिटिया के जखम हम मिलके भर देवेंगे। काहे बार-बार सबके सामने अपनी ही इज्जत को उघाड़ना। कोई बयान लेवेगा, कोई गवाही, तो कोई सटेटमेंट ...गरीब की कब कौन सुनता है ...हमें कब मिला है न्याय जो अब मिलेगा। ”


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सोमवार, 12 जनवरी 2015

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प्रिय मित्रों ! आज जिस तरह से महिलाएँ और ख़ासकर मासूम बच्चियाँ बलात्कार नाम के खौफनाक कृत्य का शिकार बन रही हैं, वह शर्मनाक है | इस विषय पर मेरी नई लिखी कहानी पढ़िए और अपने विचार एवं सुझाव दीजिए |
सृजनगाथा.कॉम पर मेरी कहानी को स्थान मिला इसके लिए मैं आदरणीय सम्पादक महोदय और उनकी पूरी टीम को सादर धन्यवाद देती हूँ | -आपकी रश्मि