शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

कपड़े

                                   कपड़े 
      
            भोर होने में थोड़ा ही समय बाकी है | आज जन्माष्टमी है इसीलिए नौ बरस की मुनिया शाम से ही राधा बनाकर मंदिर के सामने वाले चौक पर बैठा दी गई थी | मुनिया की उम्र अमीरी-गरीबी का भेद तो समझने लगी थी लेकिन दुनियादारी से अभी अनजान थी | जिसके घर पर उसकी माँ रोज़ बर्तन घिसती है, उसी हलवाई का बेटा रघु, कृष्ण बनकर उसकी बगल में बैठा था | जन्माष्टमी होने के कारण मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी हुई थी | लोग-बाग़ भगवान की मूर्ति के आगे दंडवत करते और फिर राधा-कृष्ण बने दोनों बच्चों के भी पैर छू रहे थे | 
     “रात के तीन बज गए हैं, अब कहीं जाकर भक्तों का ताँता ख़त्म होने आया है| पुजारी जी खुद से बुदबुदाए फिर दोनों बच्चों की तरफ़ देखकर तेज़ आवाज़ में बोले, चलो-चलो जाओ, अपने-अपने कपड़े बदल लो और ठाकुर जी के वस्त्र पुजारिन को धोने के लिए दे दो |" 
कपड़े बदल कर आई मुनिया ने पुजारी जी के आगे हाथ फैलाते हुए कहा, पुजारी जी, थोड़ा-सा खाना दे दो न, बहुत भूख लगी है|
    “चल भाग यहाँ से, ऐसा क्या किया है तूने जो तुझे खाना दूँ | बैठी ही तो रही है, बड़ा कोई पहाड़ तोड़ा है | पुजारी झिडकते हुए सारा चढ़ावा और प्रसाद मंदिर के भीतर ले गए | 
     मुनिया खड़ी-खड़ी अपने कपड़ों को देखती रही | कपड़े बदलते ही वह भी बदल दी गई थी |

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

दरारें

                                                                        दरारें 
          
                जब से बेटी का फ़ोन आया है, वे बड़ी परेशान हैं |  
     “ये तो हद्द ही हो गई...विनोद जी ऐसा कैसे कर सकते हैं | माना हमारी नेहा थोड़ी मॉडर्न है पर है तो संस्कारी.....उनकी उसे मारने की हिम्मत कैसे हुई....!”
पतिदेव ने पत्नी  को समझाते हुए कहा – “कोई बात नहीं नेहा की माँ, तुम भी थोड़ा सब्र से काम लो.... आखिरकार बेटी और दामाद का मामला है | तुम जा तो रही हो उसके पास....वहीँ जाकर पहले सारा मामला समझना और फिर उन्हें भी समझाना-बुझाना...सही राह दिखाकर आना | अभी दोनों की नई-नई ग्रहस्थी है |” 
      माँ जब बेटी के घर पहुंची तब तक सारी कहानी बदल चुकी थी | नव-दम्पति बड़े प्रेम-पूर्वक अपने घर के रंग-रोगन के बारे में बातचीत कर रहे थे | नेहा ने माँ को घर आया देख उनका स्वागत-सत्कार किया | माँ के बार-बार पूछने पर उसने पति के सामने ही बड़े ही संतुलित लहजे में रात के झगड़े के बारे में माँ को सब सच कह सुनाया | माँ ने भी स्थिति संभली देख बात को और तूल देना ठीक न समझा और शाम को ही अपने घर लौट जाना उचित समझा | 
      जाने से पहले माँ की नज़र सामने वाली दीवार पर पड़ी | उन्होंने उस दीवार पर कुछ दरारें देखीं | उसी वक्त उन्होंने बेटी और दामाद को बड़े प्यार से पास बुलाया और उस दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा कि - “बेटा, तुम लोगों का घर बहुत ही खूबसूरत है लेकिन इस दीवार पर कुछ दरारें हैं.....रंग-रोगन से पहले इन दरारों को भली प्रकार भरवा देना | अगर ये दरारें तुम लोगों ने सही समय पर नहीं भरवाईं तो यह दीवार ही कमज़ोर हो जाएगी | और अगर घर की एक दीवार भी कमज़ोर हो जाए तो, वो हलकी-सी ठोकर से भी ढह जाती है......फिर ऐसे घर के अन्दर किसी भी बाहर वाले के झांकते देर नहीं लगती |”          

बुधवार, 21 अगस्त 2013

राजनैतिक पोशाक

                    राजनैतिक पोशाक 


             एक युवक का सिर फिर गया | वह मुन्ना भाई फिल्म देखकर आया और उसने डिसाइड किया कि अब से वह खादी ही पहनेगा | नया-नया गांधीवादी बना वह युवक खादी के कपड़े खरीदने चल दिया | वह एक ऐसी दुकान पर पहुँचा ....ओह ! माफ़ कीजिए...ऐसे शो-रूम में पहुँचा जहाँ खादी के ही कपड़े बिकते थे | वह एक-एक पोशाक देखता और फिर उसमे लगे रेट-टैग को देखता |......वह बड़ी देर की जद्दोजहद के बाद भी अपने लिए कुछ नहीं खरीद सका |
         क्योंकि...... उसकी जेब में गांधीजी की तस्वीरों वाले इतने ‘हरे पत्ते’ थे ही नहीं कि इस ‘राजनैतिक-पोशाक’ को खरीद पाता |