भोर होने में थोड़ा ही समय बाकी है | आज जन्माष्टमी है इसीलिए नौ बरस की मुनिया शाम से ही राधा बनाकर मंदिर के सामने वाले चौक पर बैठा दी गई थी | मुनिया की उम्र अमीरी-गरीबी का भेद तो समझने लगी थी लेकिन दुनियादारी से अभी अनजान थी | जिसके घर पर उसकी माँ रोज़ बर्तन घिसती है, उसी हलवाई का बेटा रघु, कृष्ण बनकर उसकी बगल में बैठा था | जन्माष्टमी होने के कारण मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी हुई थी | लोग-बाग़ भगवान की मूर्ति के आगे दंडवत करते और फिर राधा-कृष्ण बने दोनों बच्चों के भी पैर छू रहे थे |
“रात के तीन बज गए हैं, अब कहीं जाकर भक्तों का ताँता ख़त्म होने आया है|” पुजारी जी खुद से बुदबुदाए फिर दोनों बच्चों की तरफ़ देखकर तेज़ आवाज़ में बोले, “चलो-चलो जाओ, अपने-अपने कपड़े बदल लो और ठाकुर जी के वस्त्र पुजारिन को धोने के लिए दे दो |"
कपड़े बदल कर आई मुनिया ने पुजारी जी के आगे हाथ फैलाते हुए कहा, “पुजारी जी, थोड़ा-सा खाना दे दो न, बहुत भूख लगी है|”
“चल भाग यहाँ से, ऐसा क्या किया है तूने जो तुझे खाना दूँ | बैठी ही तो रही है, बड़ा कोई पहाड़ तोड़ा है |” पुजारी झिडकते हुए सारा चढ़ावा और प्रसाद मंदिर के भीतर ले गए |
मुनिया खड़ी-खड़ी अपने कपड़ों को देखती रही | कपड़े बदलते ही वह भी बदल दी गई थी |
Ye hakikat ha mam aaj bhi insaan ki ijjat uske chritra se nahi uske kapdo se hoti ha.jis din hindustaan me ye khatm ho jayega hamara hindustaan apna ho jayega.
जवाब देंहटाएंसही कहा आपने सुनील जी
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जवाब देंहटाएंक्या बात है । इतनी गंभीर कहानी
जवाब देंहटाएंललित भैया
Very true reality, its same across religions.
जवाब देंहटाएंVery true reality, its same across religions.
जवाब देंहटाएंआभार
हटाएंheart touching....and reality of life...
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