शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

जिन्दगी ....तू इतनी पैनी क्यूँ है

जिन्दगी
तू इतनी पैनी क्यूँ है
इतनी नुकीली
कि
दिल ही चिर जाए
चीरना ही था
तो
घुटन चीर देती
रुदन चीर देती
तपन चीर देती
जिन्दगी तू इतनी पैनी क्यूँ है
इतनी तीखी
कि
हौसला ही चिर जाए (रश्मि)

हमेशा हमेशा के लिए ....

बड़ा भयावह है
इन अंधेरों और उजालों का चक्कर
मूँद लेती हूँ पलकें
तो
अंधेरा टीसने लगता है
आँख खोल लूँ जो जरा
तो
 उजाला भी चुभने लगता है
दोनों ही
 गहराते जा रहे हैं
मेरी रूह में
और
चिपट से गए हैं
मेरे वजूद से
काश ...!
नोंच कर फेंक सकती इन्हें
 या ...
रौंद कर मिटा ही देती
 फिर न अँधेरा खौफ देता
न उजाला डरा पाता
उतर जाती किसी शून्य में
गहरे .....खूब गहरे
गुम-सी हो जाती
उसी शून्य में
हमेशा हमेशा के लिए .....(रश्मि)


अपाहिज से सवाल

  * अपाहिज से सवाल *

मेरे जिन सवालों के जवाब
तुमने नहीं दिए
वे अपाहिज बनकर
घूम रहे हैं
...भटक रहे हैं
दर-ब-दर
बेसहारा
और तलाश रहे हैं
ऊसर जमीं
जहाँ मुँह छुपा लें अपना
और दफन हो जाएँ
सदा सदा के लिए ......(रश्मि)