बड़ा भयावह है
इन अंधेरों और उजालों का चक्कर
मूँद लेती हूँ पलकें
तो
अंधेरा टीसने लगता है
आँख खोल लूँ जो जरा
तो
उजाला भी चुभने लगता है
दोनों ही
गहराते जा रहे हैं
मेरी रूह में
और
चिपट से गए हैं
मेरे वजूद से
काश ...!
नोंच कर फेंक सकती इन्हें
या ...
रौंद कर मिटा ही देती
फिर न अँधेरा खौफ देता
न उजाला डरा पाता
उतर जाती किसी शून्य में
गहरे .....खूब गहरे
गुम-सी हो जाती
उसी शून्य में
हमेशा हमेशा के लिए .....(रश्मि)
इन अंधेरों और उजालों का चक्कर
मूँद लेती हूँ पलकें
तो
अंधेरा टीसने लगता है
आँख खोल लूँ जो जरा
तो
उजाला भी चुभने लगता है
दोनों ही
गहराते जा रहे हैं
मेरी रूह में
और
चिपट से गए हैं
मेरे वजूद से
काश ...!
नोंच कर फेंक सकती इन्हें
या ...
रौंद कर मिटा ही देती
फिर न अँधेरा खौफ देता
न उजाला डरा पाता
उतर जाती किसी शून्य में
गहरे .....खूब गहरे
गुम-सी हो जाती
उसी शून्य में
हमेशा हमेशा के लिए .....(रश्मि)
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