मैं और मैं ही
मैं क्या है ? बस एक
छोटा-सा शब्द जिसे हमने विस्तार दे देकर उसे अपना पूरा का पूरा वजूद बना लिया है |
मैं एक शब्द के सिवाए कुछ भी नहीं है ...एक ऐसा शब्द जिसे हमने सिर्फ अपनी एक अलग पहचान
देने के लिए गढ़ा था | ताकि हम अपने बारे में कह सकें | हमारा नाम मोहन हो या सोहन,
हम उसी नाम से पहचाने जाते हैं | लोग मोहन कहकर पुकारते हैं तो हम दौड़े चले जाते
हैं कि, ‘हाँ ! मैं ही मोहन हूँ’ लेकिन यदि हमें कोई सफलता मिल जाए या हम कुछ भी
करें तो हम ये नहीं कहते कि, ‘मोहन को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तब हम यही
कहते हैं कि, ‘मुझे सफलता मिली या मैंने ये किया’ क्योकि यदि हमने ये कहा कि, ‘मोहन
को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तो लोग हमें नहीं किसी और को ही मोहन समझेंगे |
इसलिए ‘मैं’ शब्द का प्रयोग खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया | किन्तु हमने उसे
इतना विस्तार दे दिया कि यह हमारी पहचान पर ही हावी हो गया |
हम इस ‘मैं’ को
ज्यों ज्यों अपने इर्दगिर्द लपेटते जाते हैं यह हमारे व्यक्तित्व पर हावी होने
लगता है| तब यह उछाल मारने लगता है और उथल-पुथल मचा देता है | ‘मैं’ सिर्फ खुद को
बताने के लिए बनाया गया ...खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया लेकिन धीरे-धीरे
यह खुद ही अपनी पहचान बनने लगा | इसका काम था यह कहना कि, ‘फलां काम मैंने किया’
लेकिन यह कहने लगा कि, ‘फलां काम मैंने ही किया’ ज्यों ही इस मैं ने खुद पर जोर
डालना शुरू कर दिया त्यों ही ये पूरे के पूरे अस्तित्व पर हावी हो बैठा | हमारे
व्यक्तित्व के बाकी सब गुण इसके आगे छोटे पड़ने लगे और यही उभरने लगा यह काम ‘मैंने
ही’ किया | सारी मुसीबत की जड़ ‘ही’ पर ज़ोर डालने की प्रवृत्ति है | ‘मैं’ जो भी
करे करने दीजिये | ‘मैं ही’ पर जोर मत डालिए | क्योंकि ‘मैं करता हूँ’ अच्छा है
लेकिन यदि यह सोचें कि ‘मैं ही करता हूँ’ तो बस ! यहीं से परेशानी शुरू | सोचकर
देखिये, जो जो काम हमने नहीं किये वे भी किसी ने तो किये ही न ? तो फिर हम अपने ‘मैं’
को इतना पोषित क्यों करें ?
संसार के सभी काम
मिलकर होते हैं, कोई काम अकेले नहीं होता | इसलिए ‘मैं’ की कोई आवश्यकता नहीं है, ‘हम’
ही पर्याप्त है | मैं को तो सिर्फ खुद की पहचान बताने के लिए ही बचाए रखिये | इसे
भीतर ही रखिये, बाहर विस्तार मत दीजिये | ‘मैं’ हमारा समूचा व्यक्तित्व नहीं है | एक
उदाहरण देखिये - ‘यह मेरा घर है’ उचित है ...लेकिन यह कहना कि ‘यह मेरा ही घर है’
सारी मुसीबत की जड़ है | क्योंकि यदि यह हमारा न होता तो किसी और का होता | यहाँ तक
कि हमारा रहते हुए भी किसी और का हो सकता है | ...और हमारे जाने के बाद तो यकीनन
किसी और का ही हो जाएगा |
मित्रों ! ‘मैं’ को
अपनी पहचान बताने तक ही सीमित रखिए | इसे ‘मैं’ से ‘मैं ही’ मत बनने दीजिये| ______________________________________________________________रश्मि