शनिवार, 13 दिसंबर 2014

मैं और मैं ही

मैं और मैं ही
मैं क्या है ? बस एक छोटा-सा शब्द जिसे हमने विस्तार दे देकर उसे अपना पूरा का पूरा वजूद बना लिया है | मैं एक शब्द के सिवाए कुछ भी नहीं है ...एक ऐसा शब्द जिसे हमने सिर्फ अपनी एक अलग पहचान देने के लिए गढ़ा था | ताकि हम अपने बारे में कह सकें | हमारा नाम मोहन हो या सोहन, हम उसी नाम से पहचाने जाते हैं | लोग मोहन कहकर पुकारते हैं तो हम दौड़े चले जाते हैं कि, ‘हाँ ! मैं ही मोहन हूँ’ लेकिन यदि हमें कोई सफलता मिल जाए या हम कुछ भी करें तो हम ये नहीं कहते कि, ‘मोहन को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तब हम यही कहते हैं कि, ‘मुझे सफलता मिली या मैंने ये किया’ क्योकि यदि हमने ये कहा कि, ‘मोहन को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तो लोग हमें नहीं किसी और को ही मोहन समझेंगे | इसलिए ‘मैं’ शब्द का प्रयोग खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया | किन्तु हमने उसे इतना विस्तार दे दिया कि यह हमारी पहचान पर ही हावी हो गया |

हम इस ‘मैं’ को ज्यों ज्यों अपने इर्दगिर्द लपेटते जाते हैं यह हमारे व्यक्तित्व पर हावी होने लगता है| तब यह उछाल मारने लगता है और उथल-पुथल मचा देता है | ‘मैं’ सिर्फ खुद को बताने के लिए बनाया गया ...खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया लेकिन धीरे-धीरे यह खुद ही अपनी पहचान बनने लगा | इसका काम था यह कहना कि, ‘फलां काम मैंने किया’ लेकिन यह कहने लगा कि, ‘फलां काम मैंने ही किया’ ज्यों ही इस मैं ने खुद पर जोर डालना शुरू कर दिया त्यों ही ये पूरे के पूरे अस्तित्व पर हावी हो बैठा | हमारे व्यक्तित्व के बाकी सब गुण इसके आगे छोटे पड़ने लगे और यही उभरने लगा यह काम ‘मैंने ही’ किया | सारी मुसीबत की जड़ ‘ही’ पर ज़ोर डालने की प्रवृत्ति है | ‘मैं’ जो भी करे करने दीजिये | ‘मैं ही’ पर जोर मत डालिए | क्योंकि ‘मैं करता हूँ’ अच्छा है लेकिन यदि यह सोचें कि ‘मैं ही करता हूँ’ तो बस ! यहीं से परेशानी शुरू | सोचकर देखिये, जो जो काम हमने नहीं किये वे भी किसी ने तो किये ही न ? तो फिर हम अपने ‘मैं’ को इतना पोषित क्यों करें ?

संसार के सभी काम मिलकर होते हैं, कोई काम अकेले नहीं होता | इसलिए ‘मैं’ की कोई आवश्यकता नहीं है, ‘हम’ ही पर्याप्त है | मैं को तो सिर्फ खुद की पहचान बताने के लिए ही बचाए रखिये | इसे भीतर ही रखिये, बाहर विस्तार मत दीजिये | ‘मैं’ हमारा समूचा व्यक्तित्व नहीं है | एक उदाहरण देखिये - ‘यह मेरा घर है’ उचित है ...लेकिन यह कहना कि ‘यह मेरा ही घर है’ सारी मुसीबत की जड़ है | क्योंकि यदि यह हमारा न होता तो किसी और का होता | यहाँ तक कि हमारा रहते हुए भी किसी और का हो सकता है | ...और हमारे जाने के बाद तो यकीनन किसी और का ही हो जाएगा |


मित्रों ! ‘मैं’ को अपनी पहचान बताने तक ही सीमित रखिए | इसे ‘मैं’ से ‘मैं ही’ मत बनने दीजिये|   ______________________________________________________________रश्मि      

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

चिरस्थाई सुख

                                                                चिरस्थाई सुख 
भ्रम से छुटकारा पाना बेहद आवश्यक है | और यह ज़रा भी मुश्किल नहीं है, आवश्यकता है तो बस मजबूत इच्छाशक्ति की | जिस दिन हमें इस बात का एहसास हो जाता है कि 'यदि ये पूरी की पूरी दुनिया भी मिल जाए तो भी कुछ नहीं मिलेगा', उसी दिन से सभी भ्रम, सभी चाहतें ...सारी ख्वाहिशें खत्म हो जातीं हैं | विचित्र बात यही तो है कि हम सालों साल जद्दोजहद में लगे रहते हैं, कुछ न कुछ पाने के लिए संघर्ष करते रहते हैं | लेकिन हम जो कुछ भी पाने की चाहत करते हैं वे सभी चीज़ें संसारी हैं, भौतिक हैं, नश्वर हैं | सच तो ये है कि ऐसी दुनियावी चीज़ें प्राप्त करना कठिन भी नहीं होता | लेकिन ये जितनी आसानी से मिल जातीं हैं उतनी ही आसानी से छूटतीं भी जातीं हैं | ये वे चीज़ें हैं जो जो हम इस दुनिया में खोजते हैं, पाना चाहते हैं और फिर एक दिन ये इसी दुनिया में कहीं गुम भी हो जातीं हैं | उसी के बाद हमारी चेतना जागती है और हमें एहसास होने लगता है कि ये चीज़ें मेरा लक्ष्य नहीं हैं | ये जिंतनी भी वस्तुएँ दिख रही हैं, मुझे ये नहीं चाहिए ...और तब हमारे भीतर उनकी चाहत खत्म हो जाती है और हम उनकी ओर से आँख मूँद लेते हैं | 

जैसे ही हम बाहरी वस्तुओं की ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं वैसे ही उनकी इच्छा खत्म हो जाती है | फिर बाहरी आकर्षण छोड़ हम भीतर की ओर देखने लगते हैं और भीतर प्रकाश होना प्रारंभ हो जाता है ...सारा सत्य साफ-साफ नज़र आने लगता है | अब तक स्थूल नेत्र संसार की वस्तुओं को देख रहे थे इसीलिए उनमें ही सुख की तलाश कर रहे थे, उन्हें पाने की मशक्कत में लगे थे लेकिन स्थूल नेत्र ज्यूँ ही बंद हुए सूक्ष्म नेत्र खुल गए | सूक्ष्म नेत्र भीतर की ओर दृष्टि डालते हैं | वे यह देखने की चेष्टा करते हैं कि मैं कौन हूँ ? मेरा अस्तित्व क्या है ? मैं इस संसार में क्या लेने आया हूँ ? मेरी आत्मा को किस वस्तु की तलाश है, उसे किस्में सुख मिलेगा ? ...और इसी के साथ सत्य का बोध प्रारंभ हो जाता है |

हमारे भीतर की आवाज़ इतनी शक्तिशाली होती है कि यदि एक बार जाग जाए तो मनुष्य फिर कभी संसारी आवाजों में नहीं भटकता | हमें अपने भीतर की आवाज़ को ध्यान लगाकर सुनना चाहिए | ये जो भी माँगे, देना चाहिए | यकीन करिए सुख उसी में मिलेगा ...असीम सुख | ये वो सुख होगा जो संसारी वस्तुओं में कभी भी न मिला होगा | ...चिरस्थाई सुख |  
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बुधवार, 3 दिसंबर 2014

विवशता

विवशता ....
किसे कहा जाए
कर्महीनता को
या
कर्म-प्रवृत्ति होने पर भी
घिर आई विषम विडंबना को ।
कर्महीनता विवशता नहीं
निष्क्रियता है ।
विवशता है
सामर्थ्यवान की कर्महीनता ।
रुदन ..नहीं विवशता
किसी के अश्रुओं से
अस्पृश्य रहना विवशता है ।
विवशता है
निकट से ताज को देखना
और स्व-अतित्व
जकड़ा हो जंजीरों में ।
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