शनिवार, 30 जुलाई 2016
शुक्रवार, 29 जुलाई 2016
शुक्रवार, 15 जुलाई 2016
शुक्रवार, 8 जुलाई 2016
पूरा एक वर्ष बीत गया। अपने बेटे को आईआईटी में एड्मीशन दिलाने से पहले कलाम साहब का आशीर्वाद दिलाने और स्ट्रीम की राय लेने उनके घर गई थी। बेटी भी साथ हो ली थी।
जैसे ही अलख ने कलाम साहब के पैर छुए, वे भी झुक गए और कंधे पकड़कर अलख को अपने पास बैठा लिया। उन्होंने उसकी पीठ को खूब देर तक थपथपाया।
मैंने बताया कि सर आप पर उपन्यास लिखने की कोशिश कर रही हूँ तो खिलखिलाकर हँस दिए।
सर! उपन्यास पूरा हो चुका है। इसी महीने (प्रभात प्रकाशन) से आ रहा है....आप अब भी हम सब के बीच हैं...आप कहीं नहीं गए।
मंगलवार, 5 जुलाई 2016
माँगना नहीं देना सीखो
माँगना नहीं देना सीखो
मनुष्य का स्वभाव भी बड़ा अजीब होता है | वह हमेशा कुछ न कुछ पाने की जद्दोजहद में लगा रहता है | समाज से, राष्ट्र से, रिश्तों से सभी से कुछ न कुछ माँगने की ही चेष्टा में रहता है | सबसे विचित्र बात ये है कि इस माँग का कोई अंत नहीं है |
हम हमेशा असंतुष्ट से माँगते ही रहते हैं | हमें इतना अव्यवस्थित, असंतुष्ट किसने बना रखा है ? हमारी माँग ने, इच्छाओं ने, जो कभी ख़त्म नहीं होतीं |हम अपने पूरे जीवन भर सबसे प्यार माँगते हैं और खुद किसी को न प्यार ही दे पाते हैं और न ही विश्वास | हम हमेशा धन की ख्वाहिश करते हैं लेकिन कभी भी अपनी जेब से किसी ज़रूरतमंद पर खर्च नहीं करना चाहते | अपने अंतिम समय तक ईश्वर से भी कुछ-न-कुछ फ़रियाद ही करते रहते हैं लेकिन उसे अपनी निश्छल-भक्ति और श्रद्धा नहीं दे पाते | इसीलिए वॉटर टोंपिल कहते हैं -“मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो रोता हुआ पैदा होता है और निराशा में मरता है |”
हमारे बुज़ुर्ग एक कहानी कहते हैं-
शुरू-शुरू में ईश्वर ने सभी प्राणियों को बराबर आयु दी थी | सभी को चालीस-चालीस वर्ष आयु मिली | मनुष्य को अपनी उम्र काफी कम लगी और वह लोभ-वश और चाहने लगा| गधे को भी चालीस वर्ष आयु मिली थी लेकिन वह दूसरों का बोझ ढोते-ढोते इतना उकता चुका था कि अपनी आयु घटवाना चाहता था |ईश्वर ने दोनों के मन की बात जान ली और गधे की आयु के बीस वर्ष मनुष्य को दे दिए | इसीलिए हम चालीस वर्ष की उम्र के बाद जिम्मेदारियों के बोझ से दबे होते हैं | घर, परिवार, नौकरी, बच्चे, धन, माँ-प्रतिष्ठा इन्हीं सबको जोड़ने में उलझे रहते हैं | कुछ समय के बाद कुत्ते को भी अपनी चालीस वर्ष की उम्र लम्बी और उबाऊ लगने लगी | पूरे-पूरे दिन भौंकते रहना, इसके अतिरिक्त और कोई काम नहीं | अतः वह भी अपनी फरियाद लेकर ईश्वर के पास पहुँच गया |इधर मनुष्य को अब भी अपनी आयु कम लग रही थी और उसने कुत्ते की उम्र के बीस साल भी स्वीकार कर लिए | इसीलिए साठ वर्ष के बाद मनुष्य को रिटायर समझा जाता है और वह चाहे जितनी भी नसीहत दे, कोई उसकी बात को तवज्जो नहीं देता | आश्चर्य ये कि इतने पर भी मनुष्य की इच्छा का अंत नहीं हुआ, वह अब भी अपने जीवन से असंतुष्ट ही रहा | शायद उसे खुद ही पता नहीं था कि उसे क्या चाहिए| उसे जो भी मिला, वह लेता रहा | आखिरकार उल्लू को भी एहसास हुआ कि उसकी उम्र भी कुछ ज्यादा है | वह दिन-रात औंधा पड़ा करता ही क्या है ? इसीलिए उसने भी ईश्वर से अपनी आयु कम कर देने की विनती की | ईश्वर ने देखा कि मनुष्य का लोभ तो अब भी नहीं मिटा है और उसने उल्लू की आयु भी मनुष्य को ही दे दी | तभी से अस्सी वर्ष के बाद मनुष्य को न नींद आती है, न दिखाई देता है और न ही सुनाई देता है | वह रात-रात भर जागता रहता है |
इसीलिए ज्ञानी समझाते हैं कि ईश्वर से लम्बी आयु मत माँगो बल्कि बड़ी आयु माँगो | कभी भी अथाह धन की लालसा मत करो बल्कि कम-से-कम धन के भी सही उपयोग का ज्ञान माँगो | रिश्तों से प्यार मत माँगो बल्कि उन्हें इतना स्नेह दो कि वे सदा-सदा के लिए आपके हो जाएँ | हमारा देश, हमारा समाज सब हमसे ही है और ये समृद्ध हैं तो हमारा अस्तित्व भी है इसीलिए ये मत सोचो कि देश और समाज ने हमें क्या दिया बल्कि खुद उसे देना सीखो | फिर एक दिन ऐसा होगा कि हम देते-देते भी पूरी तरह से तृप्त हो उठेंगे, प्रेम और संतुष्टि से भर उठेंगे |
-रश्मि
शुक्रवार, 1 जुलाई 2016
मनोबल न खोएं
मनोबल न खोएं
------------------------------------------------ रश्मि
हम अपने जीवन में अनेक सपने सजाते हैं | अनेक इच्छाएँ पैदा करते हैं और बड़े-बड़े लक्ष्य बनाते हैं | अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अनेकानेक प्रयत्न भी करते हैं | उनके लिए योजनाएँ बनाते हैं और जी जान से जुट जाते हैं किन्तु विडंबना ये है कि अक्सर हम किसी भी काम के पूरा होने में अधिक समय लगता देखकर निराश हो उठते हैं और अपनी उन योजनाओं को बीच में ही छोड़ देते हैं | कहीं न कहीं हम नकारात्मकता से भर उठते हैं और अपने प्रयास बंद कर देते हैं | यह निराशा और नकारात्मक सोच ही हमारी सफलता की राह की सबसे बड़ी बाधा है | काफी साल पहले मैंने एक किस्सा सुना था जो कुछ यूँ था –
एक व्यक्ति था | वह बहुत ही परिश्रमी था | उसने अपने पूरे जीवन के लिए अनेक योजनाएँ बना रखीं थीं और उन्हें पाने के लिए भरसक प्रयास भी करता था लेकिन उसकी एक बड़ी कमजोरी थी कि वह बहुत जल्द ही निराश हो जाता था | इसी निराशा के चलते वह अनेकों कार्यों को आजमाता रहा | किन्तु धैर्य और सकारात्मकता का आभाव होने के कारण वह जल्द ही पुराने काम को बीच में ही छोड़ नए कामों पर हाथ आजमाने लगता और इसी प्रकार दिन गुज़रते गए | एक रोज़ उसकी मृत्यु हो गई और वह अपनी अनेक अधूरी इच्छाओं के साथ दुनिया से विदा हो गया | जब वह स्वर्ग पहुँचा तो देवदूत उसे एक कमरे में ले गए जहाँ वे सभी चीज़ें बड़े ही करीने से सजी रखीं थीं, जिन्हें पाने की इच्छा वह धरती पर किया करता था | उसने देवदूत से पूछा –“क्या ये सब मेरे लिए हैं !” देवदूत ने उत्तर दिया –“जी हाँ ! ये सारी चीज़ें आपकी ही हैं | ये वे ही चीज़ें हैं जिन्हें आप पाना चाहते हैं |” “.....तो ये सब आपने मुझे जीते-जी ही धरती पर ही क्यों नहीं दीं !” “जब आप इच्छा करते थे तो हम बनाना शुरू कर देते थे और फिर हम जैसे ही आपको देने वाले होते थे कि आप उसे पाने का ख्याल छोड़ कुछ और चाहने लगते थे |....फिर हम आपके लिए उस दूसरी चीज़ को बनाने में जुट जाते थे | इस प्रकार कुछ चीज़ें तो हम आपको दे पाए और कुछ नहीं दे पाए, सब यहीं इकट्ठी होतीं गईं | ये सब आपकी ही हैं, आप इनका इस्तेमाल कीजिए |”
मित्रों ! ये एक काल्पनिक कथा है | दूसरी दुनिया का सच हम नहीं जानते | लेकिन इस दुनिया के सच से हम सब बखूबी परिचित हैं | और यह सच है कि जब हम अपने भीतर किसी भी तरह की इच्छा पैदा करते हैं तो हमारी सारी शक्ति, सोच, प्रकृति, गतिविधियाँ उसे प्राप्त करने के लिए उद्यत हो उठतीं हैं | आवश्यकता है तो बस ‘मनोबल’ की | यदि हम पूरे जोश और लगन के साथ किसी काम को करने में जुट जाएँ तो वह काम अवश्य ही पूरा होता है जबकि थककर या निराश होकर उस काम को बीच में ही छोड़ दें तो असफलता ही हाथ लगती है | वैसे ही यदि हम कोई खवाहिश पैदा करें तो उसे पाने के लिए अपनी पूरी निष्ठा और शक्ति लगा दें | हम कभी भी न तो निराश हों और न ही हताश | हमारी लगन और आत्मबल ही हमारे भीतर वो उत्साह और शक्ति पैदा करता है जो कठिन से कठिन काम को भी पूरा करते हैं |
------------------------------------------------ रश्मि
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