पूरा एक वर्ष बीत गया। अपने बेटे को आईआईटी में एड्मीशन दिलाने से पहले कलाम साहब का आशीर्वाद दिलाने और स्ट्रीम की राय लेने उनके घर गई थी। बेटी भी साथ हो ली थी।
जैसे ही अलख ने कलाम साहब के पैर छुए, वे भी झुक गए और कंधे पकड़कर अलख को अपने पास बैठा लिया। उन्होंने उसकी पीठ को खूब देर तक थपथपाया।
मैंने बताया कि सर आप पर उपन्यास लिखने की कोशिश कर रही हूँ तो खिलखिलाकर हँस दिए।
सर! उपन्यास पूरा हो चुका है। इसी महीने (प्रभात प्रकाशन) से आ रहा है....आप अब भी हम सब के बीच हैं...आप कहीं नहीं गए।

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