आज पूरा विश्व
कोविड-19 की चपेट में है. यह एक ऐसी महामारी की तरह पूरे विश्व पर छाया है कि सभी
की ज़िन्दगी दाँव पर लग चुकी है और जो लोग सावधानी हेतु लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं
उनकी थम गई है. फिलहाल हमारे पास कोई और विकल्प भी तो नहीं है. जब तक इसकी वैक्सीन
नहीं बन जाती तब तक हमें अनेक तरह की सावधानियाँ बरतनी ही होंगी. आज विज्ञान और तकनीक
के युग में इस वायरस ने मनुष्य को यह सीख तो दे ही दी है कि वह चाहे जितनी भी
तरक्की कर ले लेकिन रहेगा हमेशा प्रकृति के वश में ही. इंसान कभी भी प्रकृति से
ऊपर नहीं उठ सकता. कदाचित् यही कारण है कि हमारे बड़े हमें समझाया करते थे कि कभी
भी अपनी जड़ें नहीं काटनी चाहिए. इंसान जैसे-जैसे ऊँचा उठता जाए, उसे वैसे ही वैसे
और विनम्र होते जाना चाहिए.
आज का मनुष्य भौतिक
शक्ति से अति उत्साहित होकर अपनी आध्यात्मिक और आत्मिक शक्तियों को विस्मृत कर
बैठा है. फिलहाल इस लेख के माध्यम से मेरा उद्देश्य यह कतई नहीं है कि हम यह चर्चा
करें कि कोरोनावायरस मानवनिर्मित था या प्रकृति का प्रकोप. हालाँकि आज लोगों के
बीच कभी सोशल साइट्स पर, तो कभी समाचारों में, तो कभी फोन पर इस विषय में
हास्यास्पद से लेकर गंभीर चर्चाएँ और विचार-विमर्श देखने-सुनने-पढ़ने को मिलते ही
रहते हैं. मेरा उदेश्य तो मात्र इतना ही है कि इंसान को जगाया जा सके, चेताया जा
सके. वह जाग्रत हो और यह सोचे कि प्रकृति उसे तभी सुरक्षित रखेगी जब वह प्रकृति को
संरक्षण देगा. हम चाहे जितनी भी तरक्की कर लें लेकिन इस बात को नहीं भूल सकते कि प्रकृति
ही हमारी मूल है. हम इसी के पंचतत्वों के संजोग से बने हैं. हम इसका निरादर कतई
नहीं कर सकते. जो प्राणवायु हमें ज़िन्दा रखती है, क्या हम उसका निरादर कर सकते हैं?
जो धरती हमें धारण किए हुए है, तो जल और अनाज हम ग्रहण कर रहे हैं या जो अम्बर
हमें आवरण दिए रहता है, उसका आवयश्यकता से अधिक दोहन हानिकारक नहीं है?
प्रकृति ने सभी को
जीवन के साथ-साथ संघर्ष करने की शक्ति भी प्रदान की है. लेकिन यह शक्ति उसने अपनी
सुरक्षा और अपने भरण-पोषण के लिए दी है न कि किसी निरीह पर अत्याचार करने के लिए.
इस संसार में जड़-चेतन सभी का अपना महत्त्व है लेकिन विडंबना यह है कि विज्ञान और
तकनीक के विकास में अंधा हुआ व्यक्ति इस सत्य को भूल बैठा और हर वस्तु, व्यक्ति,
रिश्ते का हानिकारक स्तर तक दोहन करने लगा. यह कोरोना वायरस भी उसी का दुष्परिणाम
है. इंसान को फिर प्रकृति की ओर लौटना होगा. विध्वंस को छोड़ संरक्षण को अपनाना
होगा.
आने वाले समय में इस
महामारी की वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी और हम इसके साथ भी जीना सीख जाएँगे. किन्तु इस
महामारी के दौरान हमने प्रकृति और जीव-जंतुओं के जिस महत्त्व को समझा है, उसे अब
कभी नहीं भूलना चाहिए. हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमसे न तो किसी को कष्ट हो
और न ही किसी की हानि हो. सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः यही मूल मंत्र
है.
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