बुधवार, 21 अगस्त 2013

राजनैतिक पोशाक

                    राजनैतिक पोशाक 


             एक युवक का सिर फिर गया | वह मुन्ना भाई फिल्म देखकर आया और उसने डिसाइड किया कि अब से वह खादी ही पहनेगा | नया-नया गांधीवादी बना वह युवक खादी के कपड़े खरीदने चल दिया | वह एक ऐसी दुकान पर पहुँचा ....ओह ! माफ़ कीजिए...ऐसे शो-रूम में पहुँचा जहाँ खादी के ही कपड़े बिकते थे | वह एक-एक पोशाक देखता और फिर उसमे लगे रेट-टैग को देखता |......वह बड़ी देर की जद्दोजहद के बाद भी अपने लिए कुछ नहीं खरीद सका |
         क्योंकि...... उसकी जेब में गांधीजी की तस्वीरों वाले इतने ‘हरे पत्ते’ थे ही नहीं कि इस ‘राजनैतिक-पोशाक’ को खरीद पाता |

12 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया रश्मिजी!
    इस युवक का आगे क्या हुआ?

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  2. यदि सच पूछा जाए तो बापू अभिजात्य वर्ग
    का ही चेहरा थे। जमनालाल बजाज । घनश्याम दास बिरला उस समय बापू के स्पोंनसर थे।
    इस लिए बापू सर्वहारा वर्ग का कभी प्रितिनिधित्व

    नही करते थे।हालाकि इससे बापू के कृतित्व पर
    कोई प्रभाव नही पड़ता।

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    1. मैं आपकी बात से सहमत हूँ किन्तु ऊपरी वर्ग जुड़ा ये मनुष्य निचले दर्जे और अधम सा जीवन जी रहे वर्ग पर भी दृष्टि डालता था| जबकि आज का नेता तो इनके सूत्र-वाक्य को ही अपना मूल मन्त्र मान बैठा है...बुरा मत देखो,बुरा मत सुनो,बुरा मत बोलो ...यानि इसी कारण हमारे पालनहार न हमारी सुनते हैं,न हमें देखते हैं और न ही हमारे कष्टों पर कुछ कहते हैं...

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  3. gr8 blog rashmi ji... and your first post is really so nice.. and u also cmmnt for your viewers,, i lke that....

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  4. मुबारक हो जी। …। इस खूबसूरत ब्लॉग के लिए....

    एक बच्चे ने बड़ी ही मसुमिअत से बोला " भगवन से बड़े तो यह हरे पत्ते वाले गाँधी जी हैं। । दिवाली के समय पूजा के वक़्त भी पहले इन्हें ही पूजा जाता है…"

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद |
      आपकी दो पंक्तियाँ भी कमाल की हैं |

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  5. गांधी को पहनावे और दिखावे पर ढूँढने वालों की परिणति यही होती है. आज लोग गांधी के विचारों को नहीं, बल्कि उनके पहनावे की तरफ अधिक ध्यान देते हैं. हमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है की 'गांधी व्यक्ति नहीं विचार है'

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