सज्जन कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ते
सत्चरित्र मनुष्य कभी भी अपना स्वभाव
नहीं बदलते| संसार की सभी विषय वासनाएँ और बुराइयाँ उनसे कोसों दूर रहती हैं| जिस
प्रकार चन्दन के वृक्ष पर कितने भी विषधारी-सांप लिपटे रहें लेकिन चन्दन कभी अपनी
सुगंध और शीतलता नहीं छोड़ता उसी प्रकार ये भी सच है कि विष-प्रवृत्ति वाला सांप
लाख चन्दन से लिपटा रहे तब भी अपने विष को छोड़ता नहीं|
श्री
वृन्दावन धाम में एक बड़े ही सिद्ध संत हुए हैं, ग्वारिया बाबा| वे सदैव श्रीराधा
वल्लभ के युगल रूप की वन्दना में तल्लीन रहते थे| वे जगह-जगह भ्रमण करते रहते और
कान्हा के भजन गाते रहते थे| उन्हें इस संसार की कोई भी लालसा अपनी ओर आकर्षित ही
नहीं कर पाती थी| किन्तु वे ईश्वर भक्ति में इतने बेसुध रहते थे कि कोई उनसे कुछ
भी कहता तो वे कर देते थे| इसी प्रकार एक बार वे खुद में तल्लीन यमुना के किनारे
वंशीवट पर बैठे हुए थे| तभी तीन चोर भी उन्हीं के नज़दीक आकर बैठ गए| वे चोर अपनी
अगली चोरी की योजना बना रहे थे और उन्हें संदेह हुआ कि ये बाबा सब सुन न रहा हो
इसलिए उन्होंने ग्वारिया बाबा के पास आकर पूछा कि, “तुम कौन हो?” बाबा ने अपने सहज
भाव से मुस्कान बिखेरते हुए कहा- “वही जो तुम हो|” चोर निश्चिन्त हो गए कि ये बाबा
तो हमारी ही बिरादरी का है अतः उनसे बोले- “फिर तुम भी हमारे साथ चलो|” भोले-भाले
से ग्वारिया बाबा उन चोरों के साथ एक गृहस्थ के घर में प्रवेश कर गए| चोरों ने तो
अपना लूट-पाट का काम शुरू कर दिया लेकिन ग्वारिया बाबा दुविधा में थे कि वे क्या
करें !! उनके लिए तो ये सभी वस्तुएं मट्टी थीं| अँधेरे में ही इधर-उधर भटकते भटकते
बाबा को गृहस्वामी का पूजा-घर दिख गया| फिर क्या था, बाबा तो अपने राधा-किशन को
देख प्रसन्न| उन्होंने पास ही एक ढोलकी रखी देखी और उसे गले में लटकाकर जोर-जोर से
गाने लगे- “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे| हरे राम हरे राम राम राम हरे
हरे||” बस फिर क्या था, ढोलक की आवाज़ हुई नहीं कि घर वाले जाग गए| ख़तरा भांपते ही
तीनो चोर नौ दो ग्यारह हो गए लेकिन घर के सब लोगों और पड़ोसियों ने मिलकर बाबा को चोर
जानकार पीटना शुरू कर दिया| हलके धुंधलके में भी किसी व्यक्ति को एहसास हुआ कि ये
तो अपने ग्वारिया बाबा हैं, तो सभी उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे| बाबा से
लोगों ने पूछा- “बाबा! आप इन चोरों के चक्कर में कैसे पड़ गए?” बाबा ने पूरी बात उन
सबको बता दी और कहा- “जब वे अपने कर्म का निर्वाह कर रहे थे, तब मैंने अपना धर्म निभा
दिया|”
ऐसे होते हैं संत| वे कुसंगति में भी अपने
साधुत्व को नहीं छोड़ते| लेकिन जो दुर्जन लोग होते हैं वे संतों में भी बुराइयाँ
खोजने का कार्य करते रहते हैं| हमें भी आपने भीतर पल रहे दुर्जन-भाव को समाप्त
करके संत-भाव को पल्लवित कारना चाहिए|
- डॉ. रश्मि
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