आम आदमी की ख़ास सरकार
मौजूदा दौर में बड़ी राजनैतिक पार्टियों से आहत आम आदमी के दर्द के रूप में बड़ी तेज़ी से उभरी एक आम आदमी की पार्टी खासी चर्चा में है| ये पार्टी आम आदमी के ज़ख्मों को खुद में महसूस करते हुए उभरी और इसने उनकी नब्जों को टटोला| महंगाई, भ्रष्टाचार, अराजकता से उकताया आम आदमी इनकी टोपी पहनकर प्रजातंत्र का सच्चा प्रतीक बन बैठा| लेकिन ये सुपरमैन सरीखी कुछ दिन की सरकार अपने मुद्दों की जिद्द में अड़कर सारा खेल बिखेर कर चल दी| केजरीवाल और उनके सलाहकारों ने ये तो दिखा दिया कि राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के मुकाबले वे भले ही कम अनुभवी हों, लेकिन वे इन दलों से बेहतर मुद्दे उठा सकते हैं| विधानसभा चुनाव में उन्होंने बिजली, पानी और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया जो आम आदमी को प्रभावित करता रहा| किन्तु राजनीति कोई बच्चों का खेल नहीं कि ग्राउंड में चादर बिछायी, खेल जमाया, जब तक जमा, खेला, और विफरे नहीं कि खेल बिगाड़ कर चल दिए| दिल्ली की जनता ने विधानसभा चुनावों में एक नवीन प्रयोग किया और भावनात्मक तौर पर जुड़कर एक नए दल को सत्ता तक पहुँचा आई| किन्तु लोकसभा चुनावों कि गहमा-गहमी और राजनीतिक दलों कि रस्साकसी उस आम राजा को भी उसी कठघरे में ले आई| वैसे भी ज़रूरी नहीं कि जो पार्टी राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीते, वही लोकसभा चुनाव में भी जीत हासिल करे| लोकसभा चुनाव का कैनवास बड़ा होता है| विधानसभा चुनावों में वोटर स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा तवज्जो देता है जबकि विधानसभा चुनावों में ये मुद्दे विस्तृत रूप ले लेते है| इसमें अनेक नीतियां, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे शामिल हो जाते हैं| इसलिए विधानसभा और लोकसभा के चुनावी नतीजे एक सामान नहीं होते| इस समय मतदाता का जागरूक होना बहुत आवश्यक है| हमारे देश को प्रयोग की बजाए सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता है| देश का हर वर्ग ज़िम्मेदार हो और अपने अधिकारों और कर्तव्यों से भागे नहीं, बल्कि उसका उचित प्रयोग करे|
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-डॉ. रश्मि
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