शनिवार, 29 मार्च 2014

सज्जन कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ते

        
                            सज्जन कभी अपना स्वभाव नहीं छोड़ते
        सत्चरित्र मनुष्य कभी भी अपना स्वभाव नहीं बदलते| संसार की सभी विषय वासनाएँ और बुराइयाँ उनसे कोसों दूर रहती हैं| जिस प्रकार चन्दन के वृक्ष पर कितने भी विषधारी-सांप लिपटे रहें लेकिन चन्दन कभी अपनी सुगंध और शीतलता नहीं छोड़ता उसी प्रकार ये भी सच है कि विष-प्रवृत्ति वाला सांप लाख चन्दन से लिपटा रहे तब भी अपने विष को छोड़ता नहीं|
         श्री वृन्दावन धाम में एक बड़े ही सिद्ध संत हुए हैं, ग्वारिया बाबा| वे सदैव श्रीराधा वल्लभ के युगल रूप की वन्दना में तल्लीन रहते थे| वे जगह-जगह भ्रमण करते रहते और कान्हा के भजन गाते रहते थे| उन्हें इस संसार की कोई भी लालसा अपनी ओर आकर्षित ही नहीं कर पाती थी| किन्तु वे ईश्वर भक्ति में इतने बेसुध रहते थे कि कोई उनसे कुछ भी कहता तो वे कर देते थे| इसी प्रकार एक बार वे खुद में तल्लीन यमुना के किनारे वंशीवट पर बैठे हुए थे| तभी तीन चोर भी उन्हीं के नज़दीक आकर बैठ गए| वे चोर अपनी अगली चोरी की योजना बना रहे थे और उन्हें संदेह हुआ कि ये बाबा सब सुन न रहा हो इसलिए उन्होंने ग्वारिया बाबा के पास आकर पूछा कि, “तुम कौन हो?” बाबा ने अपने सहज भाव से मुस्कान बिखेरते हुए कहा- “वही जो तुम हो|” चोर निश्चिन्त हो गए कि ये बाबा तो हमारी ही बिरादरी का है अतः उनसे बोले- “फिर तुम भी हमारे साथ चलो|” भोले-भाले से ग्वारिया बाबा उन चोरों के साथ एक गृहस्थ के घर में प्रवेश कर गए| चोरों ने तो अपना लूट-पाट का काम शुरू कर दिया लेकिन ग्वारिया बाबा दुविधा में थे कि वे क्या करें !! उनके लिए तो ये सभी वस्तुएं मट्टी थीं| अँधेरे में ही इधर-उधर भटकते भटकते बाबा को गृहस्वामी का पूजा-घर दिख गया| फिर क्या था, बाबा तो अपने राधा-किशन को देख प्रसन्न| उन्होंने पास ही एक ढोलकी रखी देखी और उसे गले में लटकाकर जोर-जोर से गाने लगे- “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे| हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे||” बस फिर क्या था, ढोलक की आवाज़ हुई नहीं कि घर वाले जाग गए| ख़तरा भांपते ही तीनो चोर नौ दो ग्यारह हो गए लेकिन घर के सब लोगों और पड़ोसियों ने मिलकर बाबा को चोर जानकार पीटना शुरू कर दिया| हलके धुंधलके में भी किसी व्यक्ति को एहसास हुआ कि ये तो अपने ग्वारिया बाबा हैं, तो सभी उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे| बाबा से लोगों ने पूछा- “बाबा! आप इन चोरों के चक्कर में कैसे पड़ गए?” बाबा ने पूरी बात उन सबको बता दी और कहा- “जब वे अपने कर्म का निर्वाह कर रहे थे, तब मैंने अपना धर्म निभा दिया|”

       ऐसे होते हैं संत| वे कुसंगति में भी अपने साधुत्व को नहीं छोड़ते| लेकिन जो दुर्जन लोग होते हैं वे संतों में भी बुराइयाँ खोजने का कार्य करते रहते हैं| हमें भी आपने भीतर पल रहे दुर्जन-भाव को समाप्त करके संत-भाव को पल्लवित कारना चाहिए|  
- डॉ. रश्मि   
   *******************************************************************

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें