शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

आखिर क्यों पुकार रहे हैं ‘भारत-माता भारत-माता’

                         आखिर क्यों पुकार रहे हैं ‘भारत-माता भारत-माता’

          बहुत बढ़िया बोले आप हमारे महान जननेता जी | देश की सभी महिलाएँ आपके इस वक्तव्य की ह्रदय से आभारी हैं | एक बार तो हमें लगा कि आपके भीतर कोई जज्बा ही नहीं है, किन्तु है न...है क्यों नहीं | आपको वो युवा मासूम लगता है जो किसी की मान-मर्यादा और इज्ज़त से खिलवाड़ करता है ! आप उसके हिमायती बन रहे हैं ! क्या शब्द कहूँ आपकी इस सोच पर | क्या ही बढ़िया हो कि यह हुनर भी युवाओं की योग्यता का प्रमाण बना दिया जाए | ठीक ही तो कहा आपने ....क्या गलत कहा ? बेचारे मासूम ने किया ही क्या ? अपने एक अंग का प्रयोग ही तो कर दिया और तो कोई गुनाह नहीं किया ? किसी मासूम के तन से ही तो खेला, जान थोड़े ही न ले ली ! किसी की आत्मा को छलनी करना कोई गुनाह तो नहीं कि इतनी-सी मासूमियत के लिए बेचारे को फांसी की सजा सुना दी जाए ? सच ! ये तो वाकई नाइंसाफी है उस मासूम के साथ | उसे तो उसी वक्त........ |
        आदरणीय ने बेचारे लड़कों के दर्द को तो खूब समझा लेकिन काश ! हमारे नेता किसी लड़की का दर्द करीब से महसूस कर पाते | एक तरफ तो हमारे देश के युवा कंधे से कन्धा मिलाकर बिना किसी लिंग-भेद के उपब्धियाँ हासिल कर रहे हैं और दूसरी तरफ चरित्र से भ्रष्ट ऐसे युवाओं का जमावड़ा है जो स्त्री को सिवाय एक देह के कुछ और नहीं मानते | अच्छा ही है आप जैसे महानुभाव उनका मनोबल और बढाइये ताकि वे अपनी ही बहन बेटियों की इज्ज़त को तार-तार करने में ज़रा भी संकोच न करें | हम आधुनिक हुए ही कहाँ हैं ? हम तो वही आदिमानव हैं जो तन के अलावा और कुछ जानते ही नहीं हैं |
         एक तरफ तो उसे आधी आबादी कहकर बराबर का सम्मान दिया जाता है और दूसरी तरफ उसी की मान और प्रतिष्ठा को भरी सभा में सिर्फ एक भाषण से उछाल दिया जाता है ! क्यों भारत-माता भारत-माता का नारा बुलंद किए जा रहे हैं आप लोग ? बंद कीजिये ....कोई पुरुषवादी नाम दे दीजिए इस देश को | और ये देवी-पूजन, कन्या-पूजन किस लिए ? मंदिरों की भी क्या ज़रूरत है ? सोच तो ये भी कह रही है कि यदि भोग ही सब-कुछ है तो परिवार नाम की संस्था किस सिरफिरे ने बनाई ? जब न परिवार में स्त्री की इज्ज़त है, न समाज में उसकी इज्ज़त है, न राजनीतिज्ञों के बीच कोई अहमियत है तो उसको आधी दुनिया कह कर क्यों पुकारे जा रहे हो ? क्यों मंदिरों में सजाकर आरती उतारे जा रहे हो ? एक ओर तो लड़कियों की घटती संख्या को लेकर चर्चाएँ और अभियान चलाए जाते हैं दूसरी ओर इन्हीं लड़कियों को आहत करने वाले मासूमों के लिए फाँसी जैसी सज़ा को ज्यादती समझा जाता है | लानत है ऐसी मासूमियत पर | महोदय सजाओं पर आप खूब चर्चा कर सकते हैं ; दर्दों पर चर्चा करना आसान नहीं |
         यही सब कारण हैं जो हमारे देश से इस घिनौने अपराध को ख़त्म ही नहीं होने देते | विश्व का कोई देश इस अपराध पर तुरंत न्याय कर देता है लेकिन हमारा कानून उस मासूम को पुचकारे जाता है | क्यों ?...क्योंकि उसने जान थोड़े ही न ली है ? खेल खेल में एक छोटी सी भूल ही तो की है |
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-    रश्मि

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