बोलो नेता जी ! जनता जवाब चाहती है
आसमान में बादल छाए नहीं कि तालाब किनारे खलबली मचनी शुरू... जितने भी मेंढक मुँह छुपाए बैठे थे सब फुदकने
लगते हैं। ये बरसाती मेंढक हैं साहब ! न जाने कहाँ कहाँ से निकल कर आने लगते
हैं।
कुछ ऐसा ही मौसम एक बार फिर छा गया है मेरे देश में। चुनाव का समय आया नहीं कि मानों सभी राजनैतिक दलों के लिए एक प्रकार से परीक्षा का समय आ गया है। ये वो लोग हैं जो पाँच साल तक पैसा बटोरते रहते हैं और उसी के ऊपर बिस्तरा बिछा कर पड़े रहते हैं। जैसे ही इलैक्शन करीब आ जाते हैं, इनकी नींद खुलने लगती है। नहा धोकर, अपने कालिख-पुते खादी-कुर्ते को उतार कर झकाझक सफेदी ओढ़कर आम पब्लिक को चौंधियाने निकल पड़ते हैं। कोई पूछे इन बरसाती मेंढकों से कि भैय्या अब तक कौन-से खोल में छुपे बैठे थे, अब तक जनता की दशा दिखती न थी का ? खानदान के खानदान जुट आते हैं साहब ! माँ, बेटी के प्रचार में तो बेटी माँ के प्रचार में | बहन, भाई के प्रचार में तो हीरो नेता के प्रचार में | दोस्त दुश्मन सब इतने सहिष्णु हो उठते हैं कि इंसानियत भी वारी-वारी जाए| पर्दे पर ठुमके लगाने वाले सनस्क्रीन लगाकर टूटी-फूटी गलियों तक में रोड-शो करने पहुँच जाते हैं मानो उनके काले-काले चश्में से कड़कती धूप भी शर्माती हो|......मज़बूरी है साहब ! मज़बूरी, आज ये सब न सहा तो पाँच साल तक न जाने क्या-क्या सहते रहना होगा| हर धर्म गुरू के दर पर मथ्था टेकना शुरू!!! गली गली की खाक छानना शुरू!!! चुनाव बीते नहीं कि फिर कुंभकर्णी नींद में डूब जाएँगे।
कुछ ऐसा ही मौसम एक बार फिर छा गया है मेरे देश में। चुनाव का समय आया नहीं कि मानों सभी राजनैतिक दलों के लिए एक प्रकार से परीक्षा का समय आ गया है। ये वो लोग हैं जो पाँच साल तक पैसा बटोरते रहते हैं और उसी के ऊपर बिस्तरा बिछा कर पड़े रहते हैं। जैसे ही इलैक्शन करीब आ जाते हैं, इनकी नींद खुलने लगती है। नहा धोकर, अपने कालिख-पुते खादी-कुर्ते को उतार कर झकाझक सफेदी ओढ़कर आम पब्लिक को चौंधियाने निकल पड़ते हैं। कोई पूछे इन बरसाती मेंढकों से कि भैय्या अब तक कौन-से खोल में छुपे बैठे थे, अब तक जनता की दशा दिखती न थी का ? खानदान के खानदान जुट आते हैं साहब ! माँ, बेटी के प्रचार में तो बेटी माँ के प्रचार में | बहन, भाई के प्रचार में तो हीरो नेता के प्रचार में | दोस्त दुश्मन सब इतने सहिष्णु हो उठते हैं कि इंसानियत भी वारी-वारी जाए| पर्दे पर ठुमके लगाने वाले सनस्क्रीन लगाकर टूटी-फूटी गलियों तक में रोड-शो करने पहुँच जाते हैं मानो उनके काले-काले चश्में से कड़कती धूप भी शर्माती हो|......मज़बूरी है साहब ! मज़बूरी, आज ये सब न सहा तो पाँच साल तक न जाने क्या-क्या सहते रहना होगा| हर धर्म गुरू के दर पर मथ्था टेकना शुरू!!! गली गली की खाक छानना शुरू!!! चुनाव बीते नहीं कि फिर कुंभकर्णी नींद में डूब जाएँगे।
अरे
नेता जी ! अबकी बार वो जनता वोट देने आ रही है जिसके घर गैस
सिलेंडर बोझ बनकर पहुँचता है, उसकी जेब और पेट दोनों खाली हैं, वह अपने बच्चों को महँगी
शिक्षा देने को मजबूर है क्योंकि उसे लगता है कि उसके बेटे की कलम से पूरे परिवार
का परिवर्तन लिखा जाएगा। इस बार वो नौजवान वोट देगा जो मोटी फाइल और पिचका पेट
लेकर बेरोजगारी का बोझ ढोते-ढोते बढ़ती आयुसीमा रेखा के
करीब जाकर हाँफकर बैठ गया है। वो युवा भी होगा जो बिना शिक्षा, बिना रोजगार, बिना भोजन के, सुपारी सने दांत में तीली घुमाता हुआ मौके की फिराक में हर गली-नुक्कड़ पर
खड़ा मिल जाता है। उस किसान की पत्नी भी आएगी वोट देने
जिसका पति अपने सूखे खेत की गहरी दरारें कर्जे की मोटी रकम से भी पाट नहीं पाया तो
बटाई के उस खेत पर उगे बबूल के पेड़ पर झूलती रस्सी से झूल गया जिसपर शायद उसका
बचपन पेंगे लेता रहा होगा| एक बात तो बताओ नेता जी ! कैसे हजम कर
पाओगे उस बुजुर्ग के वोट को जो अपने बेटे की पीठ पर लदकर मतदान-केंद्र तक आता है और
तुम्हें अपना वोट देकर जिताना चाहता है। आजादी के इतने सालों के बाद भी वह अपने
देश के बद-हालात को देखते हुए भी आशावादी है और तुम्हे साल-दर-साल वोट
देकर कुर्सी तक पहुंचाकर खुद अपनी जिंदगी से कुछ कदम और पीछे हो जाता है।
नेता जी ! क्या कर सकोगे इन सबके सपने
पूरे ? ....या इस बार भी वहीं बवंडर, वही शोर मचाकर फिर सो जाओगे पाँच साल के लिए ?? ........बोलो प्रिय नेता जी, ये जनता जवाब चाहती है।
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- रश्मि
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