बुधवार, 23 अप्रैल 2014

प्रेम के लिए प्रेम ही पर्याप्त है

                             प्रेम के लिए प्रेम ही पर्याप्त है
           प्रेम एक ऐसा शब्द है जिस पर समस्त सृष्टि टिकी है | प्रेम की कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती क्योंकि प्रेम शब्द नहीं रस है | रूप नहीं भाव है | प्रेम तो वह सतत प्रवाह है जो कभी अवरुद्ध नहीं होता, वो प्रपात है जो अविरल गिरता रहता है | हम जिसे देखते हैं, जिस पर अपना एकाधिकार रखना चाहते हैं, जकड़ना चाहते हैं, वह प्रेम नहीं है | प्रेम तो विस्तार पाकर फैलता है | प्रेम के लिए बंधन नहीं प्रेम ही पर्याप्त है | संसार के सभी लोग बंधन की ओर भागे जा रहे हैं | कोई प्रेम की ओर नहीं दौड़ता | प्रेम मुक्ति है, बंधन नहीं | साधारण मनुष्य प्रेम की वास्तविकता को समझ ही नहीं पाता | वह जिसे प्यार समझ बैठता है वह सिवाय आकर्षण के और कुछ नहीं होता | वह अपनी स्थूल बुद्धि के चलते उसे अपने एकाधिकार में लेना चाहता है और यही कारण है कि जो प्रेम कभी उसके लिए सुखदाई था वही बाद में दुःख का कारण बनने लगता है | जिस प्रकार ह्रदय का कोई आदि और अंत नहीं है, भावनाओं के लिए कोई अंकुश नहीं है उसी प्रकार प्रेम के विस्तार की कोई सीमा नहीं है | बड़े-बड़े देव भी इस प्रेम के आगे नतमस्तक हैं | न तो यह कोई धर्म देखता है न सम्प्रदाय | प्रेम किसी भाषा-बोली के व्याकरण को भी नहीं जानता | प्रेम की अपनी ही भाषा है, अपना ही गणित | प्रेम कोई आकांक्षा भी नहीं रखता और न ही कोई प्रतिवाद करता है | मैं पहले ही बता चुकी हूँ कि प्रेम तो आज़ादी है, बंधन नहीं | प्रेम लेना नहीं देना जानता है ; सिर्फ देना | जिस-जिस ने प्रेम के इस वास्तविक और विराट स्वरुप को जाना, वही प्रेममय हो गया | जो प्रेम की स्थूलता तक सिमट कर रह गया वह कुछ समय बाद अपने ही प्रिय के प्रति सशंकित हो उठा |
            मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना ही यही है कि वह हर चीज़ पाना चाहता है, देना नहीं चाहता | जबकि प्रेम की सबसे पहली शर्त ही है - देना | प्रेम “माँगना” नहीं “देना” है | हम इसे जितना देंगें, उतना ही पाते जाएँगे ....प्रेम से भर उठेंगें | लेकिन जहाँ प्रेम माँगा, वहीँ संकीर्ण हो गए | यदि हम प्रेम के पीछे भागे तो ये और दौड़ाएगा लेकिन ज्यों ही थम कर बैठ गए और अपने हृदय, नयन और वाणी में इसे बसा लिया तो हम खुद ‘प्रेम’ बन जाएँगे | प्रेम रिश्तों के दायरे, जज्बातों के बंधन, उम्र और लिंग के भेद को नहीं मानता | प्रेम ‘किसी एक’ में नहीं वरन ‘हर एक’ में है | प्रेम गीत है, संगीत है, तरंग है | यह कण-कण में है, हर मन में है | इसको पाने का बस एक ही तरीका है कि इसे खुद में न जकड़ा जाए बल्कि सब में फैला दिया जाए | इसे इतना लुटा दिया जाए कि खुद ही प्रेम से सराबोर हो जाएँ |      
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·        रश्मि 

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