पूरे
दिन में कुछ समय हमें सिर्फ अपने लिए निकालना चाहिए| उस समय कोई हमारे साथ न हो, न
प्रत्यक्ष में और न ही मन में| हम सिर्फ अपने साथ हों ...सिर्फ अपने साथ ...एकदम अकेले| धीरे-धीरे
हमें एक परम सत्ता का अहसास होने लगेगा ...हमें अहसास होने लगेगा कि सारी सृष्टि
हममे ही समा रही है ...या...हम विस्तृत और विस्तृत होते जा रहे हैं ...इतने
विस्तृत कि हमारी चेतना पूरी सृष्टि में फ़ैलती जा रही है|
गुरुवार, 9 अप्रैल 2015
बुधवार, 1 अप्रैल 2015
सही और गलत
हम सही और गलत को कैसे तय करते हैं? कैसे डिसाइड करते हैं कि यह मानने योग्य है और यह मानने योग्य नहीं है?
जैसे सभी को पता है कि छत से कूदेंगे तो हमारे हाथ पैर टूट जाएँगे या मर भी सकते हैं, तो हम सीढ़ी से उतर आते हैं।
कोई कंकर-पत्थर नहीं खाता क्योंकि सभी को मालूम है कि ये पचेंगे नहीं, तो मूर्ख से मूर्ख भी उन्हें नहीं खाता।
.....लेकिन तब फिर झूठ बोलना, धोखा देना, नुक्सान पहुँचाना ये कैसे सब कैसे खुशीे सकते हैं!! ....मुझे तो नहीं देते। यदि किसी को देते हैं तो फिर उसके लिए वही सही है, वही मानने योग्य है।
मानकर देखिए नतीजा कुछ ही दिनों में मिलने लगेगा जो छत से कूदने या कंकर खाने से कहीं ज्यादा कष्टकर होगा।— आपकी रश्मि
जैसे सभी को पता है कि छत से कूदेंगे तो हमारे हाथ पैर टूट जाएँगे या मर भी सकते हैं, तो हम सीढ़ी से उतर आते हैं।
कोई कंकर-पत्थर नहीं खाता क्योंकि सभी को मालूम है कि ये पचेंगे नहीं, तो मूर्ख से मूर्ख भी उन्हें नहीं खाता।
.....लेकिन तब फिर झूठ बोलना, धोखा देना, नुक्सान पहुँचाना ये कैसे सब कैसे खुशीे सकते हैं!! ....मुझे तो नहीं देते। यदि किसी को देते हैं तो फिर उसके लिए वही सही है, वही मानने योग्य है।
मानकर देखिए नतीजा कुछ ही दिनों में मिलने लगेगा जो छत से कूदने या कंकर खाने से कहीं ज्यादा कष्टकर होगा।— आपकी रश्मि
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