हम सही और गलत को कैसे तय करते हैं? कैसे डिसाइड करते हैं कि यह मानने योग्य है और यह मानने योग्य नहीं है?
जैसे सभी को पता है कि छत से कूदेंगे तो हमारे हाथ पैर टूट जाएँगे या मर भी सकते हैं, तो हम सीढ़ी से उतर आते हैं।
कोई कंकर-पत्थर नहीं खाता क्योंकि सभी को मालूम है कि ये पचेंगे नहीं, तो मूर्ख से मूर्ख भी उन्हें नहीं खाता।
.....लेकिन तब फिर झूठ बोलना, धोखा देना, नुक्सान पहुँचाना ये कैसे सब कैसे खुशीे सकते हैं!! ....मुझे तो नहीं देते। यदि किसी को देते हैं तो फिर उसके लिए वही सही है, वही मानने योग्य है।
मानकर देखिए नतीजा कुछ ही दिनों में मिलने लगेगा जो छत से कूदने या कंकर खाने से कहीं ज्यादा कष्टकर होगा।— आपकी रश्मि
जैसे सभी को पता है कि छत से कूदेंगे तो हमारे हाथ पैर टूट जाएँगे या मर भी सकते हैं, तो हम सीढ़ी से उतर आते हैं।
कोई कंकर-पत्थर नहीं खाता क्योंकि सभी को मालूम है कि ये पचेंगे नहीं, तो मूर्ख से मूर्ख भी उन्हें नहीं खाता।
.....लेकिन तब फिर झूठ बोलना, धोखा देना, नुक्सान पहुँचाना ये कैसे सब कैसे खुशीे सकते हैं!! ....मुझे तो नहीं देते। यदि किसी को देते हैं तो फिर उसके लिए वही सही है, वही मानने योग्य है।
मानकर देखिए नतीजा कुछ ही दिनों में मिलने लगेगा जो छत से कूदने या कंकर खाने से कहीं ज्यादा कष्टकर होगा।— आपकी रश्मि
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