बुधवार, 3 जून 2020

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः


आज पूरा विश्व कोविड-19 की चपेट में है. यह एक ऐसी महामारी की तरह पूरे विश्व पर छाया है कि सभी की ज़िन्दगी दाँव पर लग चुकी है और जो लोग सावधानी हेतु लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं उनकी थम गई है. फिलहाल हमारे पास कोई और विकल्प भी तो नहीं है. जब तक इसकी वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक हमें अनेक तरह की सावधानियाँ बरतनी ही होंगी. आज विज्ञान और तकनीक के युग में इस वायरस ने मनुष्य को यह सीख तो दे ही दी है कि वह चाहे जितनी भी तरक्की कर ले लेकिन रहेगा हमेशा प्रकृति के वश में ही. इंसान कभी भी प्रकृति से ऊपर नहीं उठ सकता. कदाचित् यही कारण है कि हमारे बड़े हमें समझाया करते थे कि कभी भी अपनी जड़ें नहीं काटनी चाहिए. इंसान जैसे-जैसे ऊँचा उठता जाए, उसे वैसे ही वैसे और विनम्र होते जाना चाहिए.
आज का मनुष्य भौतिक शक्ति से अति उत्साहित होकर अपनी आध्यात्मिक और आत्मिक शक्तियों को विस्मृत कर बैठा है. फिलहाल इस लेख के माध्यम से मेरा उद्देश्य यह कतई नहीं है कि हम यह चर्चा करें कि कोरोनावायरस मानवनिर्मित था या प्रकृति का प्रकोप. हालाँकि आज लोगों के बीच कभी सोशल साइट्स पर, तो कभी समाचारों में, तो कभी फोन पर इस विषय में हास्यास्पद से लेकर गंभीर चर्चाएँ और विचार-विमर्श देखने-सुनने-पढ़ने को मिलते ही रहते हैं. मेरा उदेश्य तो मात्र इतना ही है कि इंसान को जगाया जा सके, चेताया जा सके. वह जाग्रत हो और यह सोचे कि प्रकृति उसे तभी सुरक्षित रखेगी जब वह प्रकृति को संरक्षण देगा. हम चाहे जितनी भी तरक्की कर लें लेकिन इस बात को नहीं भूल सकते कि प्रकृति ही हमारी मूल है. हम इसी के पंचतत्वों के संजोग से बने हैं. हम इसका निरादर कतई नहीं कर सकते. जो प्राणवायु हमें ज़िन्दा रखती है, क्या हम उसका निरादर कर सकते हैं? जो धरती हमें धारण किए हुए है, तो जल और अनाज हम ग्रहण कर रहे हैं या जो अम्बर हमें आवरण दिए रहता है, उसका आवयश्यकता से अधिक दोहन हानिकारक नहीं है?
प्रकृति ने सभी को जीवन के साथ-साथ संघर्ष करने की शक्ति भी प्रदान की है. लेकिन यह शक्ति उसने अपनी सुरक्षा और अपने भरण-पोषण के लिए दी है न कि किसी निरीह पर अत्याचार करने के लिए. इस संसार में जड़-चेतन सभी का अपना महत्त्व है लेकिन विडंबना यह है कि विज्ञान और तकनीक के विकास में अंधा हुआ व्यक्ति इस सत्य को भूल बैठा और हर वस्तु, व्यक्ति, रिश्ते का हानिकारक स्तर तक दोहन करने लगा. यह कोरोना वायरस भी उसी का दुष्परिणाम है. इंसान को फिर प्रकृति की ओर लौटना होगा. विध्वंस को छोड़ संरक्षण को अपनाना होगा.
आने वाले समय में इस महामारी की वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी और हम इसके साथ भी जीना सीख जाएँगे. किन्तु इस महामारी के दौरान हमने प्रकृति और जीव-जंतुओं के जिस महत्त्व को समझा है, उसे अब कभी नहीं भूलना चाहिए. हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमसे न तो किसी को कष्ट हो और न ही किसी की हानि हो. सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः यही मूल मंत्र है.   
***************************************************************************

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

kalam ki aatmkatha



प्यारे मित्रों ! मेरी नई किताब "कलाम की आत्मकथा" आप अमेज़ॉन में प्राप्त कर सकते हैं | - आपकी रश्मि

रविवार, 28 अगस्त 2016

whatsapp ki kahaniyan

मित्रों! व्हाट्सएप आज हम सभी के जीवन का अभिन्न अंग बन गया है| इसी को ध्यान में रखते हुए पिछले वर्ष पहली बार इस थीम पर छोटी-छोटी कहानियाँ लिखीं थीं | वह पुस्तक प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई - "व्हाट्सएप रिश्ते नातों की कहानियाँ" किताब खूब सराही गई और खूब बिकी | मैने इसमें अपने पाठकों को चैटिगों के माध्यम से सकारात्मक सन्देश देने का प्रयास किया था |
इसका लोकार्पण विश्व पुस्तक मेले में 14 जनवरी 2016, दिन गुरूवार को वरिष्ठ कथाकार आदरणीय चित्रा मुद्गल जी, वरिष्ठ कहानीकार श्री तेजेंद्र शर्मा जी और सुप्रसिद्ध कवि एवं प्रोड्यूसर दूरदर्शन डॉ. अमरनाथ अमर जी के हाथों संपन्न हुआ था |
आज भी याद है कि आदरणीय चित्रा जी ने कहा था कि, “छोटी-छोटी कहानियों के रूप में यह नए तरह का प्रयास है | संभव है आगे ऐसी कहानियाँ अन्य लोगों द्वारा भी लिखीं जाएँ |”
श्री तेजेंद्र जी ने कहा था कि, “भविष्य में जब भी इस प्रकार की कहानियों का मूल्यांकन होगा तो उसकी पहली लेखिका ‘रश्मि’ ही मानी जाएगी |”
डॉ. अमरनाथ जी का कथन था कि, “आने वाले समय में ऐसी कहानियाँ बड़ी संख्या में लिखी जाएँगी |”
......और सभी महानुभावों के कथन सत्य सिद्ध हुए | व्हाट्सएप की कहानियाँ अन्य लेखकों द्वारा लिखी जाने लगीं हैं और बाज़ार में आ रही हैं | 
मेरी यह किताब आप फ्लिपकार्ट, अमेज़न, स्नैपडील, पुस्तकमंडी आदि अनेक जगहों से (पेपरबैक मूल्य मात्र 72 से 80 रुपयों के आसपास और हार्डकवर मूल्य 180 रुपयों के आसपास) में उपलब्ध हैं |

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

पूरा एक वर्ष बीत गया। अपने बेटे को आईआईटी में एड्मीशन दिलाने से पहले कलाम साहब का आशीर्वाद दिलाने और स्ट्रीम की राय लेने उनके घर गई थी। बेटी भी साथ हो ली थी। 
जैसे ही अलख ने कलाम साहब के पैर छुए, वे भी झुक गए और कंधे पकड़कर अलख को अपने पास बैठा लिया। उन्होंने उसकी पीठ को खूब देर तक थपथपाया। 
मैंने बताया कि सर आप पर उपन्यास लिखने की कोशिश कर रही हूँ तो खिलखिलाकर हँस दिए।

सर! उपन्यास पूरा हो चुका है। इसी महीने (प्रभात प्रकाशन) से आ रहा है....आप अब भी हम सब के बीच हैं...आप कहीं नहीं गए।