सोमवार, 9 सितंबर 2013

सलाह

                                   सलाह    
         
           मोबाइल की घंटी बजते ही उन्होंने अपना चश्मा नाक़ पर चढ़ा कर पढ़ना चाहा लेकिन अब तो आँखें भी इतनी कमज़ोर हो गईं हैं कि वक्त-बेवक्त साथ ही नहीं देतीं |
        “पता नहीं किसका फ़ोन है....उठा ही लेती हूँ, वर्ना नाम पढ़ने के चक्कर में रही तो फ़ोन कट ही जाएगा |”
        फोन उनकी बहन के बेटे का था | कह रहा था कि, “मौसी जी, आपसे कुछ सलाह करनी है | कुछ उलझन आ गई है और आपकी मदद चाहता हूँ |”
        भांजे से घर चले आने का कहकर उन्होंने फ़ोन काट दिया और सोच में डूब गईं | खुद से ही बतियाने लगीं - कैसी विडंबना है यह...अपने तीस साल के टीचिंग पीरियड में मैंने हजारों बच्चों की काउंसलिंग की....आज भी आस-पड़ोस, मित्र, रिश्तेदार सभी मुझसे सलाह मांगते हैं | लेकिन इसी सलाहने मेरे अपने ही बेटे को मुझसे दूर कर दिया | मैं सभी की उलझनें दूर करती रही और अपने ही रिश्तों की उलझने न सुलझा सकी | मेरा अपना बेटा सिर्फ इसीलिए मेरे पास नहीं रहना चाहता क्योंकि उसे मेरी सलाह..........|”

2 टिप्‍पणियां:

  1. by nature insaan pariwar m rahna chahta hai, lekin yah bhi hakikat hai ki harwaqt baisakhi pasand nahi karta ( jo samaj dimag m dalta hai ki apni pehchan banao ). sayad

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  2. समाज में रहना और परिवार के अनुसार खुद को ढालकर अपनी पहचान बनाना अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

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