रविवार, 31 अगस्त 2014

फ़ोन कट चुका था

                              फ़ोन कट चुका था
          
          समीरा दफ्तर से आते ही सीधे अपने कमरे की ओर गई और अपने हैंड बैग को एक ओर फेंकती हुई खुद भी बिस्तर पर औंधी गिर पड़ी | न जाने क्यों आजकल उसे अपनी ज़िन्दगी भी कुछ औंधी-सी महसूस हो रही है | इस वक्त उसके कमरे में लगभग अँधेरा है, चीज़ें नज़र तो आ रही हैं मगर धुंधली धुंधली-सी | वह उन्हें देखने की कोशिश भी नहीं करना चाहती | क्या करेगी उन्हें देखकर...वह उन्हें देखेगी...वे उसे देखेंगी...बस यही न ?
                 ‘तस्वीर दीवार पर लटकी है तो लटकी रहे, मैं भी तो ऐसी ही किसी कील पर गड़ी हुई हूँ | घड़ी अपनी जगह पर चल रही है.... चलती रहे, मैं भी तो चल ही रही हूँ | वो तो फिर भी एक बार बंद हो जाए तो सेल बदलते ही फिर चल पड़ती है | लेकिन मैं....मैं दोबारा नहीं चलना चाहती....आखिर कब ख़त्म होंगे मेरे सेल !! अच्छे भले गुलाबी पर्दे भी मटमैले से नज़र आते हैं बिलकुल रिश्तों की तरह | चुपचाप लटक रहे हैं लेकिन जैसे ही मेरी भावनाएँ जोर मारतीं हैं, ये भी हिल पड़ते हैं | बड़ा अजीब-सा रिश्ता बन गया है मेरा इस कमरे की इन निर्जीव चीज़ों से..... पता ही नहीं चलता है कि ये ज्यादा निर्जीव हैं या मैं ?’
अपने ख्यालों में गुम समीरा के मन में एक बार तो आया कि उठे और कमरे की लाइट जला ले लेकिन फिर सोचने लगी क्या करेगी इस कमरे का अँधेरा मिटाकर.... ये कमरा है ही ऐसी जगह पर कि जहाँ जब देखो तब अँधेरा ही रहता है | यही हाल ज़िन्दगी का भी हो गया है....चौबीसों घंटे धुंधलका-सा.... बिलकुल इस कमरे के जैसा | कभी-कभी तो वह बड़ी असमंजस में पड़ जाती कि कमरे का धुंधलापन सिमटकर मन में समा रहा है या मन का धुंधलका विस्तार लेकर कमरे में गहरा रहा है !! अक्सर ऐसी ही ऊल-जलूल कल्पनाएँ करती हुई अपने इस कमरे में घंटों पड़ी रहती | पड़े-पड़े उसे वक्त का भी पता नहीं चलता | वह अपनी सोच की लहरों के उतार-चढ़ाव उतरा रही थी कि एकाएक उसके कानों में बेटे की आवाज़ गूंजी-
           “मम्मी! शाम हो गई है, मुझे दूध दे दो |”
समीरा हरकत में आ गई और उठ बैठी लेकिन फिर ठहर गई और दो मिनट तक यूँ ही बैठी रही...थोड़ी उदास और परेशान....फिर अपनी हथेलियों से आँखों को रगड़ते हुए पीछे टेक लगाकर बैठ गई | खुद से बुदबुदाई-
              ‘कहाँ है अमी ? वो तो इस वक्त कॉलेज में होगा...या अपने दोस्तों के साथ...या फिर हॉस्टल में | उसे गए हुए तो दो महीने हो चुके हैं लेकिन अब भी शाम होते ही लगता है मानो वो मुझे पुकार रहा है |’
शाम होते ही क्यों, समीरा को तो हर वक्त अपने बेटे की ही आवाज़ सुनाई देती रहती | अब भी सुबह-सुबह बाथरूम से आवाज़ आती है-
            “मम्मी ! प्लीज़ टॉवल दे दो, बाहर ही भूल गया |”
            “मम्मी ! जल्दी से नाश्ता दो न, बस आती होगी |”
            “मम्मी ! मेरा एक जूता नहीं मिल रहा |”
........और कभी-कभी बड़े करीब आकर गले में हाथ डाल देता और अपनी आवाज़ में चॉकलेट घोलता हुआ कहता-
             “मम्मी ! थोड़े-से पैसे दे दो न |”
......मम्मी! ये दे दो न...वो दे दो न...बचपन से यही सीखा उसने | वह भी देती रही...चाहे जैसे भी दे पाई हो, लेकिन जितना भी संभव हो सका उसे देती रही | पिछले इतवार जब घर आया था तब फिर कुछ माँग गया-
             “मम्मी, मुझे भी थोड़ी आज़ादी चाहिए | आप तो हर वक्त कॉन्टेक्ट में रहना चाहती हैं | खाना खाया... पानी पिया.... कॉलेज के लिए निकल गया.... टाइम पर सो गया....? बस मॉम, बहुत हो गया | अब मैं बच्चा नहीं रहा, संभाल सकता हूँ खुद को |”
समीरा सन्न रह गई | कैसे दे दे उसे वो, जो इस वक्त वो मांग रहा है | उसी को देख-देखकर ही तो इतने साल गुज़ारे हैं और अब वही खुद को उससे छीन लेना चाहता है !! रुपयों-पैसों से खरीदी जा सकने वाली चीज़ों की माँग करने वाला अमी आज माँ की भावनाएँ माँग रहा है, उनसे आज़ादी माँग रहा है |...... काश ! तूने कोई नया मोबाइल मांग लिया होता या लेपटॉप जैसा कुछ और माँग लेता..... तूने अपनी माँ से खुद को ही माँग लिया | छोटा-सा अमी, जो हर वक्त उसका दुपट्टा पकड़े उसके पीछे-पीछे घूमता था और पूछता था
                “मम्मी ! पापा मुझे छोड़कर क्यों चले गए? मम्मी आप तो नहीं जाओगी ना मुझे छोड़कर ?”
.......और आज वही अमी इतना बड़ा हो गया है कि अपनी माँ से ही आज़ादी मांग रहा है | दुपट्टा तो कब का छोड़ चुका है, अब हाथ भी झटक लेना चाहता है | आज इतना बड़ा हो गया है कि मुझे ही आज़ादी के मायने सिखा रहा है |
        एक समय था जब इसी अमी की खातिर मैंने आज़ादी शब्द को अपनी फीकी पड़ चुकी लाल चूनर में लपेटकर घर के सबसे पुराने संदूक की तली में डाल दिया था, हमेशा-हमेशा के लिए | सभी मिलने-जुलने वाले दूसरी शादी कर लेने का सुझाव देते और समझाते-
              “अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, दूसरी शादी कर लो | अभी बेटा भी मासूम है, उसे ढलने में परेशानी नहीं होगी |
.....लेकिन सिर्फ तुम्हारे लिए अमी... सिर्फ तुम्हारे लिए..... तुम्हारी मासूम मुस्कान के लिए मुझे ‘ढलने’ शब्द से परेशानी होने लगी थी | मैं कल्पना मात्र से काँप जाती थी कि एक अनजाने इंसान को तुम अपना पिता कैसे कह पाओगे.... उसके लिए तुम खुद को कैसे ढाल पाओगे.... अपने बचपन और अपनी माँ को हिस्सों में कैसे बाँट पाओगे ? उस वक़्त सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी परवरिश की खातिर मैंने इस आज़ादी शब्द को अपने जीवन से मिटा दिया था ....हमेशा हमेशा के लिए | सभी नाते रिश्तेदारों को दो टूक जवाब देने के बाद मैं तुम्हारी कंचे जैसी मासूम आँखों में सिमटने लगी और तुम मेरी बाहों के खुले गगन में निर्बाध और निर्द्वंद्व उड़ने लगे | तुम बचपन से ही बड़े शरारती और बातूनी थे | तुम्हारी मीठी-मीठी बातें सबको बताने का मन करता लेकिन किसे बताती.... बहुत छोटी-सी दुनिया थी हमारी |
         समीरा ने विचारों में खोए खोए ही अपना हाथ बढ़ाया और कमरे की लाइट जला दी | पूरा कमरा दूधिया रौशनी से भर उठा और समीरा की पनीली आँखें इस दूधिया रौशनी से चौंधिया उठीं | धीरे - धीरे उसे अपने भीतर कमजोरी महसूस होने लगी, उसका बदन भी टूट रहा है | उसे लगा कि जैसे उसे बुखार चढ़ रहा हो | बिस्तर पर ही धीरे-धीरे खिसकते हुए उसने सिरहाने रखी मेज़ की दराज से थर्मामीटर निकाला और अपने मुँह से लगाया | उसने देखा, वाकई बुखार है मगर अभी हल्का ही है | कुछ देर यूँ ही बैठी रही, शांत निश्चेष्ट फिर उसने थर्मामीटर दराज़ में रख दिया और मेज़ पर रखी डायरी उठा ली और उसके पन्ने पलटने लगी | डायरी के पन्ने पलटते ही समीरा के कानों में फिर से अमी की आवाज़ गूंज उठी –
               “मम्मी, आप इस डायरी में क्या लिखती रहती हैं ?”
               “कुछ नहीं बेटा, जो भी मेरे मन में आता है, वो सब इस डायरी में लिख देती हूँ... तुम्हारी सारी शैतानियाँ और मीठी-मीठी बातें भी इसी के पन्नों में उतार देती हूँ | बेटा, मैं तुम्हारे बचपन को तो रोक नहीं सकती इसीलिए तुम्हारी हर रंग-बिरंगी याद को इस डायरी के रीते पन्नों में कैद करने की कोशिश करती रहती हूँ | जब तुम बड़े हो जाओगे, तो मैं इसे पढ़-पढ़कर तुम्हारा बचपन दोहरा लिया करुँगी, और जब तुम पापा बनने वाले होओगे, तब यही डायरी अपनी बहू को गिफ्ट कर दूंगी |”
                 “मम्मी आप भी न ! कैसी-कैसी बातें करती हैं.... अभी तो मैं बच्चा हूँ |”
अब वही मासूम बच्चा कितना बड़ा हो गया है ....दुनियादारी से भरा हुआ | अपने एकमात्र रिश्ते से भी आज़ादी माँग रहा है | क्या इस कड़वाहट को भी मैं इस डायरी में उतार दूँ ?...... कैसे करूँ ऐसा.... जिस डायरी में अब तक फूल उगाती आई थी, अब धीरे-धीरे काँटों को कैसे जगह लेने दूँ ?.... तुम क्यों बदल गए अमी ?...... उसे लगा कि बुखार धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है, वह उठी और बाथरूम में चली गई | उसके तन मन की पीड़ा बढ़ती ही जा रही थी, टांगें दर्द से चूर चूर हो रहीं थीं.... और आत्मा.... आत्मा के चूरे तो वह अपने बिस्तर पर ही छोड़ आई थी | इसी बीच कमरे में मोबाइल की घंटी बज उठी और कुछ देर शोर मचाकर उसके मोबाइल के रिंग की आवाज़ कमरे के कोनों में कहीं खो गई | उधर बाथरूम में भी समीरा के ज़हन में अमी की यादें और कानों में अमी की ही आवाजें गूंजती रहीं | वह हाथ मुँह धोकर बाहर आई ....खुद को आईने में देखा .....वह बहुत थकी-थकी और कमज़ोर लग रही थी | जी किया कि चाय बना कर पीये लेकिन शरीर की ताकत साथ नहीं दे रही थी ......फिर से बिस्तर पर लेट गई | उसे अपना मुँह भी कड़वा-सा लग रहा था |
                 “मम्मी आप हर वक़्त अपन कमरे में ही बंद रहती हैं | कभी बाहर जाया करिए.... कुछ शॉपिंग किया करिए.... अपने दोस्तों से मिला करिए | आपने अपनी लाइफ बस मुझ तक ही समेट कर रख दी है |”
वह चौंक पड़ी | उसे लगा अमी हमेशा की तरह फिर अचानक उसके कमरे में आकर उससे नाराज़ हो रहा है |
         “.....क्या करुँगी बाहर जाकर .....और शॉपिंग !! बाज़ार की चमचमाती दुकानों में मेरी ख्वाहिशों का सामान मिलता ही कहाँ है.... जब भी किसी मॉल में घूमती हूँ तो यही सोचने लगती हूँ कि मैं सामान खरीदने आई हूँ या अपने चैन-सुकून को बेचने आई हूँ !! ......फ्रेंड्स के बीच भी अक्सर बेचैनी महसूस करती हूँ | वे अपने भरे-पूरे घर की भरी-भरी बातें सुनाकर मेरे सूने मन को भरना चाहते हैं लेकिन मैं इस भराव से दरकने लगती हूँ .....और बिखरने लगती हूँ | .....नहीं अमी, मैं यहीं ठीक हूँ |”
वह मन ही मन बुदबुदाई | मोबाइल की घंटी फिर एक बार बजी | समीरा चौंक उठी, अरे ! अमी की मिस कॉल ! ये कब आई ? .....अब फिर झगड़ा करेगा कि कहाँ थीं आप ? फोन क्यों नहीं उठाया ?
        “हैल्लो !”
        “क्या माँ, कहाँ थीं आप ? कितनी देर से आपको फोन ट्राई कर रहा हूँ | रिंग जा रही है लेकिन आप फ़ोन ही नहीं उठा रहीं | .....अपनी उसी अँधेरी कोठरी में पड़ी होंगीं, है न ? .....अच्छा सुनिए, मैं सन्डे को आ रहा हूँ और अपने कुछ दोस्तों को भी साथ ला रहा हूँ | प्लीज कुछ बढ़िया से स्नैक्स वगैरह बना दीजियेगा | .....बाय, ......थैंक यू, .....लव यू |”
        “हैल्लो...!!!! सुन अमी....!!! हैल्लो....!!”
समीरा का मुँह खुला का खुला ही रह गया और मोबाइल कब का बंद हो चुका था | कमरे में तेज़ लाइट फैल रही थी .....लेकिन समीरा..... वह तो और भी गहरे अन्धकार में उतर चुकी थी | उसके बेटे ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि माँ, आप ठीक तो हैं न ! आपकी तबियत तो ठीक है न ! काश वो एक बार यही कह देता कि मम्मी, जब आप फ़ोन नहीं उठाती हैं तो मुझे आपकी चिंता हो जाती है | ......नहीं, अब वो ये सब क्यों पूछेगा, अब वो बड़ा हो गया है | अपने सपने पूरे करने के लिए आगे बढ़ चुका है | समीरा की कोरों से टपकते पानी ने कब उसका तकिया भिगो डाला, उसे भी पता नहीं चला|
          अमी बचपन में समीरा के दुपट्टे में लगे सितारे अपने नाखून से नोंच नोंच कर निकाल लिया करता था, वह उन्हें इकट्ठे कर लेता और फिर घंटों उनसे खेला करता | समीरा को इस समय ऐसा लगा, मानों उसके बेटे ने वे सारे सितारे, जो कभी उसकी चुनरी से नोंचकर निकले थे, वे सब सितारे अपने सपनों की दीवार पर चिपका दिए हों | अमी के लिए आज उसका कैरियर ही उसका सपना है इससे बढ़कर और कुछ नहीं है उसके लिए | यूँ तो वह भी हमेशा से यही चाहती रही थी कि उसका अमी अपने जीवन में कामयाबी हासिल करे.... बहुत बड़ा आदमी बने .....लेकिन वह तो माँ की ममता को ही भूल बैठा | समीरा फिर बिस्तर पर लेट गई | उसे महसूस हुआ कि उसका बुखार तेज़ होता जा रहा है, और उसे उठकर दवाई ले लेनी चाहिए ....लेकिन इससे पहले उसे एक और ज़रूरी काम करना है | उसने मोबाइल उठाया और अमी के नंबर पर फ़ोन लगाया |
        “हैल्लो अमी !”
        “यस मम्मा !”
        “अमी, मैं कल सुबह ही तुम्हारे नाना के घर जा रही हूँ (समीरा के हाथ बुखार से काँप रहे थे और होंठ लाल होकर तप रहे थे ) वे कई दिन से बीमार हैं और उन्हें इस वक़्त मेरी ज़रूरत है | मैंने तुम्हें उनकी तबियत के बारे में पहले इसलिए नहीं बताया ताकि तुम्हारी पढ़ाई में डिस्टर्ब न हो | .....खैर, ....होप सो ! .....तुम समझोगे | .....और वैसे भी बेटा, एन्जॉय योर फ्रीडम ! ....लव यू टू ....बाय |”
       “हैल्लो !! मॉम, .....मेरे फ्रेंड्स, हैल्लो....!! हैल्लो....!!”
.........फ़ोन कट चुका था |       

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शनिवार, 16 अगस्त 2014

रसिक शिरोमणि नटवर नागर

रसिक शिरोमणि नटवर नागर
         आज हम सोलह कलाकारी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मना रहे हैं| कान्हा को प्रेमपूरित होने के कारण ही रसिक शिरोमणि कहा जाता है| उन्होंने धरती पर प्रेम और धर्म की स्थापना करने के उद्देश्य से ही जन्म लिया था| उनके जीवन का हर प्रसंग हमें प्रेम, धर्म और नैतिकता की प्रेरणा देता है| कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग श्रीकृष्ण पर अनेक व्यंग कसते हैं कि वे गोपियों से छल करते थे और उनके वस्त्र चुराते थे, राधा को प्रेम करने के बाद भी रुक्मीणी से विवाह किया, सोलह हज़ार पटरानियों के स्वामी थे, छल के द्वारा पांडवों को जितवाया....आदि आदि| यदि हम अपनी मानसिक संकीर्णता से ऊपर उठकर सोचें तो पाएंगे कि उनकी हर लीला के पीछे संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा विद्यमान है| विष्णु जी को पुत्र रूप में पाने के लिए माँ यशोदा और माँ देवकी दोनों ने कठिन तप किया था| उनके तप से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने वर मांगने के लिए कहा| तब माँ देवकी ने कहा कि मैं आपको जन्म देना चाहती हूँ और माँ यशोदा के मुँह से निकला कि मैं आपका पुत्र-रूप में पालन करना चाहती हूँ| इस प्रकार उन्होंने दोनों को वात्सल्य-सुख दिया| ये प्रसंग हमें प्रेरणा देता है कि प्रभु हमारी सारी आकांक्षाओं को पूरा करते हैं, फेर हमारी ‘मांग’ में ही होता है| इसी प्रकार कंस, जरासंघ आदि सम्बन्धियों को मारने के पीछे हिंसा का कोई प्रयोजन नहीं था बल्कि वे ये सन्देश देना चाहते थे कि, ‘यदि अपना ख़ास व्यक्ति भी मानवता और अपनत्व को हानि पहुँचाए तो रिश्तों के नाम पर उसके गुनाह को स्वीकार करने की बजाए कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए| कृष्ण ने राधा और समस्त गोपियों के साथ सिर्फ प्रेम ही किया| कुछ तुच्छ मानसिकता वाले मित्रों का विचार है कि कृष्ण गोपियों के वस्त्र चुराते थे, आधी रात को यमुना के किनारे रास करते थे, आदि| मेरा उन मित्रों से प्रश्न है कि क्या बारह वर्ष की आयु का बच्चा ऐसी घृणित मानसिकता रख सकता है? बालक कृष्ण बारह वर्ष की अवस्था में मथुरा चले गए थे| और उस उम्र का बालक दैहिक नहीं बल्कि बाल-सुलभ प्रेम करता है| वो ज़माना ए. सी. या कूलर का ज़माना नहीं था| लोग खुले आकाश के नीचे सोते थे, यमुना किनारे विहार करना पसंद करते थे, गाँव के समस्त परिवारों को अपने परिवार की तरह मानते थे और बालक कृष्ण भी उसी यमुना के किनारे गोपी ग्वालों के साथ खेल ही खेला करते थे| सब मित्रों में राधा के साथ उनका विशेष स्नेह था जो कि मानवीय प्रकृति के अनुसार स्वाभाविक भी है| उनका प्रेम निश्छल-प्रेम था...किसी भी कामना से परे| इसी का परिणाम था कि राधा आजीवन उनकी आत्मीय बनीं रहीं और विवाह रुक्मिणी से हुआ| अपने इसी निश्छल प्रेम को साबित करने के लिए श्रीकृष्ण ने महारास की रात कामदेव तक को पराजित करके दिखा दिया|
          वे कुशल राजनीतिज्ञ थे| महाभारत में उन्होंने कोई छल नहीं किया बल्कि अधर्म को पराजित कर धर्म की स्थापना की| वे सशरीर पांडवों के साथ थे जबकि उनकी विशाल सेना कौरवों के साथ थी| ....फिर छल कैसा!! इस पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगी| कृष्ण का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा के सामान है| यदि हम उनकी एक-एक लीला को गहराई से समझें तो हमें जीने की अदभुत कला मिलती है| आज हम सभी मिलकर उस नटवर नागर प्यारे कान्हा का जन्मोत्सव मना रहे हैं और उसे प्रेम का प्रतीक बनाकर अपने दिलों में बसाए हुए हैं और सदैव बसाए रहेंगे| जय श्रीकृष्ण|   
____________________________________________________________ रश्मि 

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

दावानल

दावानल

उस गरीब की झोंपड़ी में
नहीं जला है चूल्हा
कई दिनो से
मगर फिर भी....
उसके भीतर
रह रह कर
जो सुलग उठता है
वो क्या है?
पिचके हुए पेटों की आग
बनती जा रही है 
दावानल
काश ! 
! कोई मुरली वाला आता
और हरा देता
इस दावानल को भी

******************** रश्मि 

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

वन्दे मातरम्

                                    वन्दे मातरम्
         आज पंद्रह अगस्त है, आज़ादी का उत्सव मनाने का दिन... उन शहीदों को याद करने का दिन जिनके निःस्वार्थ बलिदान से यह उत्सव संभव हो सका | सदियों में कभी ऐसे युगपुरुष जन्म लेते हैं जो इतिहास रच जाते हैं | बदलाव की लहर बहा देना, युवा तो युवा बच्चों और वृद्धों में भी जोश और जज़्बा जगा देना, ऐसे ही युगपुरुषों का काम है | आज हम सभी को मिलकर उन युगपुरुषों को अंतर्मन से नमन करना चाहिए | कितने जूनून भरे दिन रहे होंगे वे... हम कल्पना मात्र से ही रोमांचित हो उठते हैं | आज़ादी के मतवालों के मतवालेपन और जिद्द के आगे ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भी अपने घुटने टेक दिए थे | परतंत्रता की लम्बी काली रात्रि समाप्त हुई थी और स्वतंत्रता का नवल-प्रभात खिल उठा था | यह दिन सदैव ही भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिन बनकर जगमगाता रहेगा |
        मित्रों ! हमारे पुरखे हमें सिखा गए हैं कि छोटे-छोटे प्रयासों और योगदानों से बड़े-बड़े मुकाम और लक्ष्य पाए जा सकते हैं | अगर एक-एक कर हर इंसान जुड़ता जाए तो मज़बूत कड़ी बन जाती है | एकता में वो शक्ति है जो बड़ी से बड़ी निरंकुशता को भी डिगा सकती है | हमारे स्वाधीनता सेनानी भी कुछ ऐसी ही मजबूत कड़ियों की तरह थे जिन्होंने अपनी शक्ति और आत्मबल के आगे अंग्रेजी हुकूमत को डिगा दिया था | आज हम सब उनका ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं | हम आभार व्यक्त करते हैं उन नौजवानों का जिन्होंने अपने संकल्प को पूरा करने की खातिर अपना भविष्य दांव पर लगा दिया, अपनी जवानी की लालसाओं को भी त्याग दिया और फाँसी के उस फंदे को चूम लिया जो उनके गले की वरमाला बनी | हम उन आज़ादी के मतवालों का आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने अपना घर-परिवार, हर सुकून त्याग दिया | सरकारी प्रलोभनों को ठुकरा दिया और आज़ादी की मशाल को निरंतर जलाए रखा | हम आभार व्यक्त करते हैं उन वृद्धों का जो नवयुवकों के लिए प्रेरणास्रोत बने... आज़ादी के जुनून ने उनकी रगों में भी उबाल पैदा किया | हम कोटि-कोटि नमन करते हैं उन माताओं और बहनों को जिन्होंने अपना हर आराम, अपनी नज़ाकत, अपना जीवन, अपना सुहाग व ममत्व सब देश के लिए न्योछावर कर दिया | आज भी हमारे देश भारत को इसी जज़्बे की आवश्यकता है | हमारा मधुमय देश आज बड़ी ही आस के साथ अपनी संतानों की ओर निहार रहा है | ....कहाँ खो गया वो जज़्बा ....कहाँ मिट गई वो एकता ....कहाँ तिरोहित हो गई आपसी-सद्भावना !! कौन रिश्तों में विष घोल रहा है ....मानवता को शर्मसार कर रहा है !! क्या विकास की कीमत यही है, जो आज हमें चुकानी पड़ रही है !! एक ओर तो हम चाँद पर कदम रख रहे हैं तो दूसरी ओर अपने घर से ही बेघर हो गए हैं ....एक ओर तो हम सुसंस्कृत होते जा रहे हैं तो दूसरी ही ओर अपने बुजुर्गों का सम्मान ही भूलते जा रहे हैं ....एक ओर तो हम संचार-क्रान्ति और ग्लोबल-क्रान्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं तो दूसरी ही ओर सारी नैतिकता से हाथ धोते जा रहे हैं ....एक ओर तो वैश्वीकरण ने अपने आगोश में सारे विश्व को ले लिया है तो दूसरी ही ओर विकट महंगाई के चंगुल में जकड़ते जा रहे हैं | ‘सोने की चिरैया’ का धन काला होकर विदेशी बैंकों में कैसे पहुँच गया ! विरोधाभासों की लिस्ट बहुत लम्बी है |
          भारत के युगपुरुषों ने इस धरती पर रामराज्य का स्वप्न देखा था किन्तु आज हर मोड़ पर रावणों का साम्राज्य है | सीता शर्मसार है और असुरक्षित भी | ज़ख्म जटायु को नहीं बल्कि सीता के ही जिस्म को मिल रहे हैं क्योंकि अब कोई जटायु सीता की रक्षा करने को आगे नहीं आता ....यहाँ तक कि हरण का दृश्य भी कैमरे में कैद कर संचार-माध्यम (टी.आर.पी. की खातिर) के हवाले कर दिया जाता है | अब मेरे देश के खेतों में वृक्षों पर केवल मीठे-मीठे आम ही नहीं लटकते बल्कि जिस्म भी लटके पाए जाते हैं ....काश ! कोई उस ठूँठ जैसे पेड़ की शर्मिंदगी को ही देखकर शर्मिंदा हो पाता | जिस बीज को रोपकर किसान पेड़ की शक्ल देता है, गरीबी से लाचार हो वो बेचारा उसी की डालियों पर खुद ही झूल जाता है ! जिसकी टहनियों पर बचपन झूलता था आज उन्हीं पर किशोरावस्था लटका दी जाती है ! जिसे राजकाज की बागडोर दी जाती है वही अपनी आस्तीनों में जहरीले साँप पाल रहा है | सत्ता के रक्षक अपनी जुबान की ही रक्षा नहीं कर पा रहे हैं कदाचित इसीलिए आज दरिन्दे ‘नादान’ कहे जा रहे हैं | आज़ादी के मतवालों को विद्यार्थियों के स्लेबस में ‘आतंकी’ विशेषण से नवाज़ा जा रहा है | जमाखोर बाज़ारवाद के साथ षड्यंत्र रच रहा है | विकट महँगाई और भ्रष्टाचार की ताड़का ताड़ को भी शर्मिंदा कर रही है | न जाने कौन चैन-ओ-सुकून के साथ खिलवाड़ कर, पूरी इंसानियत को शर्मसार कर रहा है | शान्ति की जगह हाहाकार है ...चीत्कार है | प्रेम वीभत्स हो चुका है ...श्रृंगार जुगुप्सा जगा रहा है | वीरता स्वार्थपरता बनती जा रही है | वात्सल्य लाचार है | हर दिल में रौद्र पैठ बनाता जा रहा है | करुणा रौद्र बनती जा रही है | हर भाव की अतिश्योक्ति होती जा रही है | .....क्या हमने इसी आज़ादी का स्वप्न देखा था | एक बार फिर जगने और जगाने का समय आ चुका है | अब स्त्रियों को अपने सम्मान के लिए स्वयं कमर कसनी होगी | आम जनता को भी अपनी शक्ति पहचाननी होगी | बदलाव की लहर एक बार फिर तूफ़ान का इंतज़ार कर रही है | इस बार हम सभी को तूफ़ान बनना पड़ेगा | हाथ पर हाथ धरके या अलग-अलग झुण्ड बनाकर समस्याओं की चर्चा करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला | सत्तासीनों ने बड़ी ही चतुराई से अपना रक्षा-कवच गढ़ा है | आम जनता को अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति और महंगाई के चक्रव्यूह में ऐसा उलझा दिया गया है कि वह अपनी ज़रूरतों के आगे और कुछ न तो देख पा रहा है और न ही सोच पा रहा है | कोई भी दुर्घटना देखकर आगे बढ़ जाता है और अगले दिन नई घटनाओं के साथ पुरानी भूलता जाता है |
         उठो मित्रों ! आज फिर अपनी आवाज़ बुलंद करो | फिर एकता का परिचय दो | देश को एक बार फिर आज़ादी की आवश्कता है....बुराइयों से....भ्रष्टाचार से....जमाखोरी से....महंगाई से....चारित्रिक और नैतिक पतन से....बढ़ते आतंकवाद से....गहराते भीतरी संकटों से | देश हमारा है और इसके विकास का उत्तरदायित्व भी हम सब पर ही है | हमें एक दूसरे पर उँगली दिखाने की बजाए एक दूसरे का हाथ थामना होगा | डगर लम्बी है, कठिन है किन्तु हमारी मंजिलें जरा भी असंभव नहीं हैं .... एक बार हौसला जगा कर तो देखें | वन्दे मातरम् |

________________________________________________________________  रश्मि