फ़ोन कट चुका
था
समीरा दफ्तर से आते ही सीधे अपने कमरे की ओर गई और अपने हैंड बैग को एक ओर
फेंकती हुई खुद भी बिस्तर पर औंधी गिर पड़ी | न जाने क्यों आजकल उसे अपनी ज़िन्दगी
भी कुछ औंधी-सी महसूस हो रही है | इस वक्त उसके कमरे में लगभग अँधेरा है, चीज़ें
नज़र तो आ रही हैं मगर धुंधली धुंधली-सी | वह उन्हें देखने की कोशिश भी नहीं करना
चाहती | क्या करेगी उन्हें देखकर...वह उन्हें देखेगी...वे उसे देखेंगी...बस यही न ?
‘तस्वीर दीवार पर लटकी है तो लटकी रहे, मैं भी तो ऐसी ही
किसी कील पर गड़ी हुई हूँ | घड़ी अपनी जगह पर चल रही है.... चलती रहे, मैं भी तो चल
ही रही हूँ | वो तो फिर भी एक बार बंद हो जाए तो सेल बदलते ही फिर चल पड़ती है |
लेकिन मैं....मैं दोबारा नहीं चलना चाहती....आखिर कब ख़त्म होंगे मेरे सेल !! अच्छे
भले गुलाबी पर्दे भी मटमैले से नज़र आते हैं बिलकुल रिश्तों की तरह | चुपचाप लटक
रहे हैं लेकिन जैसे ही मेरी भावनाएँ जोर मारतीं हैं, ये भी हिल पड़ते हैं | बड़ा
अजीब-सा रिश्ता बन गया है मेरा इस कमरे की इन निर्जीव चीज़ों से..... पता ही नहीं
चलता है कि ये ज्यादा निर्जीव हैं या मैं ?’
अपने ख्यालों में गुम समीरा के मन में एक बार तो
आया कि उठे और कमरे की लाइट जला ले लेकिन फिर सोचने लगी क्या करेगी इस कमरे का
अँधेरा मिटाकर.... ये कमरा है ही ऐसी जगह पर कि जहाँ जब देखो तब अँधेरा ही रहता है
| यही हाल ज़िन्दगी का भी हो गया है....चौबीसों घंटे धुंधलका-सा.... बिलकुल इस कमरे
के जैसा | कभी-कभी तो वह बड़ी असमंजस में पड़ जाती कि कमरे का धुंधलापन सिमटकर मन
में समा रहा है या मन का धुंधलका विस्तार लेकर कमरे में गहरा रहा है !! अक्सर ऐसी
ही ऊल-जलूल कल्पनाएँ करती हुई अपने इस कमरे में घंटों पड़ी रहती | पड़े-पड़े उसे वक्त
का भी पता नहीं चलता | वह अपनी सोच की लहरों के उतार-चढ़ाव उतरा रही थी कि एकाएक
उसके कानों में बेटे की आवाज़ गूंजी-
“मम्मी! शाम हो गई है, मुझे दूध दे दो |”
समीरा हरकत में आ गई और उठ बैठी लेकिन फिर ठहर
गई और दो मिनट तक यूँ ही बैठी रही...थोड़ी उदास और परेशान....फिर अपनी हथेलियों से
आँखों को रगड़ते हुए पीछे टेक लगाकर बैठ गई | खुद से बुदबुदाई-
‘कहाँ है अमी ? वो तो इस वक्त कॉलेज में होगा...या अपने दोस्तों के साथ...या
फिर हॉस्टल में | उसे गए हुए तो दो महीने हो चुके हैं लेकिन अब भी शाम होते ही
लगता है मानो वो मुझे पुकार रहा है |’
शाम होते ही क्यों, समीरा को तो हर वक्त अपने
बेटे की ही आवाज़ सुनाई देती रहती | अब भी सुबह-सुबह बाथरूम से आवाज़ आती है-
“मम्मी ! प्लीज़ टॉवल दे दो, बाहर ही भूल गया |”
“मम्मी ! जल्दी से नाश्ता दो न, बस आती होगी |”
“मम्मी ! मेरा एक जूता नहीं मिल रहा |”
........और कभी-कभी बड़े करीब आकर गले में हाथ
डाल देता और अपनी आवाज़ में चॉकलेट घोलता हुआ कहता-
“मम्मी ! थोड़े-से पैसे दे दो न |”
......मम्मी! ये दे दो न...वो दे दो न...बचपन से
यही सीखा उसने | वह भी देती रही...चाहे जैसे भी दे पाई हो, लेकिन जितना भी संभव हो
सका उसे देती रही | पिछले इतवार जब घर आया था तब फिर कुछ माँग गया-
“मम्मी, मुझे भी थोड़ी आज़ादी चाहिए | आप तो हर वक्त कॉन्टेक्ट में रहना चाहती
हैं | खाना खाया... पानी पिया.... कॉलेज के लिए निकल गया.... टाइम पर सो गया....?
बस मॉम, बहुत हो गया | अब मैं बच्चा नहीं रहा, संभाल सकता हूँ खुद को |”
समीरा सन्न रह गई | कैसे दे दे उसे वो, जो इस
वक्त वो मांग रहा है | उसी को देख-देखकर ही तो इतने साल गुज़ारे हैं और अब वही खुद
को उससे छीन लेना चाहता है !! रुपयों-पैसों से खरीदी जा सकने वाली चीज़ों की माँग
करने वाला अमी आज माँ की भावनाएँ माँग रहा है, उनसे आज़ादी माँग रहा है |...... काश
! तूने कोई नया मोबाइल मांग लिया होता या लेपटॉप जैसा कुछ और माँग लेता..... तूने
अपनी माँ से खुद को ही माँग लिया | छोटा-सा अमी, जो हर वक्त उसका दुपट्टा पकड़े उसके
पीछे-पीछे घूमता था और पूछता था –
“मम्मी ! पापा मुझे छोड़कर क्यों चले गए? मम्मी आप तो नहीं जाओगी ना मुझे छोड़कर
?”
.......और आज वही अमी इतना बड़ा हो गया है कि
अपनी माँ से ही आज़ादी मांग रहा है | दुपट्टा तो कब का छोड़ चुका है, अब हाथ भी झटक
लेना चाहता है | आज इतना बड़ा हो गया है कि मुझे ही आज़ादी के मायने सिखा रहा है |
एक
समय था जब इसी अमी की खातिर मैंने आज़ादी शब्द को अपनी फीकी पड़ चुकी लाल चूनर में
लपेटकर घर के सबसे पुराने संदूक की तली में डाल दिया था, हमेशा-हमेशा के लिए | सभी
मिलने-जुलने वाले दूसरी शादी कर लेने का सुझाव देते और समझाते-
“अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, दूसरी शादी कर लो | अभी बेटा भी मासूम है, उसे
ढलने में परेशानी नहीं होगी |”
.....लेकिन सिर्फ तुम्हारे लिए अमी... सिर्फ
तुम्हारे लिए..... तुम्हारी मासूम मुस्कान के लिए मुझे ‘ढलने’ शब्द से परेशानी
होने लगी थी | मैं कल्पना मात्र से काँप जाती थी कि एक अनजाने इंसान को तुम अपना
पिता कैसे कह पाओगे.... उसके लिए तुम खुद को कैसे ढाल पाओगे.... अपने बचपन और अपनी
माँ को हिस्सों में कैसे बाँट पाओगे ? उस वक़्त सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी परवरिश की
खातिर मैंने इस आज़ादी शब्द को अपने जीवन से मिटा दिया था ....हमेशा हमेशा के लिए |
सभी नाते रिश्तेदारों को दो टूक जवाब देने के बाद मैं तुम्हारी कंचे जैसी मासूम
आँखों में सिमटने लगी और तुम मेरी बाहों के खुले गगन में निर्बाध और निर्द्वंद्व
उड़ने लगे | तुम बचपन से ही बड़े शरारती और बातूनी थे | तुम्हारी मीठी-मीठी बातें
सबको बताने का मन करता लेकिन किसे बताती.... बहुत छोटी-सी दुनिया थी हमारी |
समीरा ने विचारों में खोए खोए ही अपना हाथ बढ़ाया और कमरे की लाइट जला दी |
पूरा कमरा दूधिया रौशनी से भर उठा और समीरा की पनीली आँखें इस दूधिया रौशनी से चौंधिया
उठीं | धीरे - धीरे उसे अपने भीतर कमजोरी महसूस होने लगी, उसका बदन भी टूट रहा है
| उसे लगा कि जैसे उसे बुखार चढ़ रहा हो | बिस्तर पर ही धीरे-धीरे खिसकते हुए उसने
सिरहाने रखी मेज़ की दराज से थर्मामीटर निकाला और अपने मुँह से लगाया | उसने देखा, वाकई
बुखार है मगर अभी हल्का ही है | कुछ देर यूँ ही बैठी रही, शांत निश्चेष्ट फिर उसने
थर्मामीटर दराज़ में रख दिया और मेज़ पर रखी डायरी उठा ली और उसके पन्ने पलटने लगी |
डायरी के पन्ने पलटते ही समीरा के कानों में फिर से अमी की आवाज़ गूंज उठी –
“मम्मी, आप इस डायरी में क्या लिखती रहती हैं ?”
“कुछ नहीं बेटा, जो भी मेरे मन में आता है, वो सब इस डायरी में लिख देती
हूँ... तुम्हारी सारी शैतानियाँ और मीठी-मीठी बातें भी इसी के पन्नों में उतार
देती हूँ | बेटा, मैं तुम्हारे बचपन को तो रोक नहीं सकती इसीलिए तुम्हारी हर रंग-बिरंगी
याद को इस डायरी के रीते पन्नों में कैद करने की कोशिश करती रहती हूँ | जब तुम बड़े
हो जाओगे, तो मैं इसे पढ़-पढ़कर तुम्हारा बचपन दोहरा लिया करुँगी, और जब तुम पापा
बनने वाले होओगे, तब यही डायरी अपनी बहू को गिफ्ट कर दूंगी |”
“मम्मी आप भी न ! कैसी-कैसी बातें करती हैं.... अभी तो मैं बच्चा हूँ |”
अब वही मासूम बच्चा कितना बड़ा हो गया है ....दुनियादारी
से भरा हुआ | अपने एकमात्र रिश्ते से भी आज़ादी माँग रहा है | क्या इस कड़वाहट को भी
मैं इस डायरी में उतार दूँ ?...... कैसे करूँ ऐसा.... जिस डायरी में अब तक फूल उगाती
आई थी, अब धीरे-धीरे काँटों को कैसे जगह लेने दूँ ?.... तुम क्यों बदल गए अमी ?......
उसे लगा कि बुखार धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है, वह उठी और बाथरूम में चली गई | उसके
तन मन की पीड़ा बढ़ती ही जा रही थी, टांगें दर्द से चूर चूर हो रहीं थीं.... और
आत्मा.... आत्मा के चूरे तो वह अपने बिस्तर पर ही छोड़ आई थी | इसी बीच कमरे में
मोबाइल की घंटी बज उठी और कुछ देर शोर मचाकर उसके मोबाइल के रिंग की आवाज़ कमरे के
कोनों में कहीं खो गई | उधर बाथरूम में भी समीरा के ज़हन में अमी की यादें और कानों
में अमी की ही आवाजें गूंजती रहीं | वह हाथ मुँह धोकर बाहर आई ....खुद को आईने में
देखा .....वह बहुत थकी-थकी और कमज़ोर लग रही थी | जी किया कि चाय बना कर पीये लेकिन
शरीर की ताकत साथ नहीं दे रही थी ......फिर से बिस्तर पर लेट गई | उसे अपना मुँह
भी कड़वा-सा लग रहा था |
“मम्मी आप हर वक़्त अपन कमरे में ही
बंद रहती हैं | कभी बाहर जाया करिए.... कुछ शॉपिंग किया करिए.... अपने दोस्तों से
मिला करिए | आपने अपनी लाइफ बस मुझ तक ही समेट कर रख दी है |”
वह चौंक पड़ी | उसे लगा अमी हमेशा की तरह फिर
अचानक उसके कमरे में आकर उससे नाराज़ हो रहा है |
“.....क्या करुँगी बाहर जाकर .....और शॉपिंग !! बाज़ार की चमचमाती दुकानों में
मेरी ख्वाहिशों का सामान मिलता ही कहाँ है.... जब भी किसी मॉल में घूमती हूँ तो
यही सोचने लगती हूँ कि मैं सामान खरीदने आई हूँ या अपने चैन-सुकून को बेचने आई हूँ
!! ......फ्रेंड्स के बीच भी अक्सर बेचैनी महसूस करती हूँ | वे अपने भरे-पूरे घर
की भरी-भरी बातें सुनाकर मेरे सूने मन को भरना चाहते हैं लेकिन मैं इस भराव से
दरकने लगती हूँ .....और बिखरने लगती हूँ | .....नहीं अमी, मैं यहीं ठीक हूँ |”
वह मन ही मन बुदबुदाई | मोबाइल की घंटी फिर एक
बार बजी | समीरा चौंक उठी, अरे ! अमी की मिस कॉल ! ये कब आई ? .....अब फिर झगड़ा
करेगा कि कहाँ थीं आप ? फोन क्यों नहीं उठाया ?
“हैल्लो
!”
“क्या
माँ, कहाँ थीं आप ? कितनी देर से आपको फोन ट्राई कर रहा हूँ | रिंग जा रही है
लेकिन आप फ़ोन ही नहीं उठा रहीं | .....अपनी उसी अँधेरी कोठरी में पड़ी होंगीं, है न
? .....अच्छा सुनिए, मैं सन्डे को आ रहा हूँ और अपने कुछ दोस्तों को भी साथ ला रहा
हूँ | प्लीज कुछ बढ़िया से स्नैक्स वगैरह बना दीजियेगा | .....बाय, ......थैंक यू, .....लव
यू |”
“हैल्लो...!!!!
सुन अमी....!!! हैल्लो....!!”
समीरा का मुँह खुला का खुला ही रह गया और मोबाइल
कब का बंद हो चुका था | कमरे में तेज़ लाइट फैल रही थी .....लेकिन समीरा..... वह तो
और भी गहरे अन्धकार में उतर चुकी थी | उसके बेटे ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि
माँ, आप ठीक तो हैं न ! आपकी तबियत तो ठीक है न ! काश वो एक बार यही कह देता कि
मम्मी, जब आप फ़ोन नहीं उठाती हैं तो मुझे आपकी चिंता हो जाती है | ......नहीं, अब
वो ये सब क्यों पूछेगा, अब वो बड़ा हो गया है | अपने सपने पूरे करने के लिए आगे बढ़
चुका है | समीरा की कोरों से टपकते पानी ने कब उसका तकिया भिगो डाला, उसे भी पता
नहीं चला|
अमी बचपन में समीरा के दुपट्टे में लगे सितारे अपने नाखून से नोंच नोंच कर
निकाल लिया करता था, वह उन्हें इकट्ठे कर लेता और फिर घंटों उनसे खेला करता | समीरा
को इस समय ऐसा लगा, मानों उसके बेटे ने वे सारे सितारे, जो कभी उसकी चुनरी से
नोंचकर निकले थे, वे सब सितारे अपने सपनों की दीवार पर चिपका दिए हों | अमी के लिए
आज उसका कैरियर ही उसका सपना है इससे बढ़कर और कुछ नहीं है उसके लिए | यूँ तो वह भी
हमेशा से यही चाहती रही थी कि उसका अमी अपने जीवन में कामयाबी हासिल करे.... बहुत
बड़ा आदमी बने .....लेकिन वह तो माँ की ममता को ही भूल बैठा | समीरा फिर बिस्तर पर
लेट गई | उसे महसूस हुआ कि उसका बुखार तेज़ होता जा रहा है, और उसे उठकर दवाई ले
लेनी चाहिए ....लेकिन इससे पहले उसे एक और ज़रूरी काम करना है | उसने मोबाइल उठाया
और अमी के नंबर पर फ़ोन लगाया |
“हैल्लो
अमी !”
“यस
मम्मा !”
“अमी,
मैं कल सुबह ही तुम्हारे नाना के घर जा रही हूँ (समीरा के हाथ बुखार से काँप रहे
थे और होंठ लाल होकर तप रहे थे ) वे कई दिन से बीमार हैं और उन्हें इस वक़्त मेरी
ज़रूरत है | मैंने तुम्हें उनकी तबियत के बारे में पहले इसलिए नहीं बताया ताकि
तुम्हारी पढ़ाई में डिस्टर्ब न हो | .....खैर, ....होप सो ! .....तुम समझोगे | .....और
वैसे भी बेटा, एन्जॉय योर फ्रीडम ! ....लव यू टू ....बाय |”
“हैल्लो
!! मॉम, .....मेरे फ्रेंड्स, हैल्लो....!! हैल्लो....!!”
.........फ़ोन कट चुका था |
********************************************** -रश्मि