शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

दावानल

दावानल

उस गरीब की झोंपड़ी में
नहीं जला है चूल्हा
कई दिनो से
मगर फिर भी....
उसके भीतर
रह रह कर
जो सुलग उठता है
वो क्या है?
पिचके हुए पेटों की आग
बनती जा रही है 
दावानल
काश ! 
! कोई मुरली वाला आता
और हरा देता
इस दावानल को भी

******************** रश्मि 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें