दावानल
उस गरीब की झोंपड़ी में
नहीं जला है चूल्हा
कई दिनो से
मगर फिर भी....
उसके भीतर
रह रह कर
जो सुलग उठता है
वो क्या है?
पिचके हुए पेटों की आग
बनती जा रही है
नहीं जला है चूल्हा
कई दिनो से
मगर फिर भी....
उसके भीतर
रह रह कर
जो सुलग उठता है
वो क्या है?
पिचके हुए पेटों की आग
बनती जा रही है
दावानल
काश !
काश !
! कोई मुरली वाला आता
और हरा देता
इस दावानल को भी
और हरा देता
इस दावानल को भी
******************** रश्मि
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