गुरुवार, 14 अगस्त 2014

वन्दे मातरम्

                                    वन्दे मातरम्
         आज पंद्रह अगस्त है, आज़ादी का उत्सव मनाने का दिन... उन शहीदों को याद करने का दिन जिनके निःस्वार्थ बलिदान से यह उत्सव संभव हो सका | सदियों में कभी ऐसे युगपुरुष जन्म लेते हैं जो इतिहास रच जाते हैं | बदलाव की लहर बहा देना, युवा तो युवा बच्चों और वृद्धों में भी जोश और जज़्बा जगा देना, ऐसे ही युगपुरुषों का काम है | आज हम सभी को मिलकर उन युगपुरुषों को अंतर्मन से नमन करना चाहिए | कितने जूनून भरे दिन रहे होंगे वे... हम कल्पना मात्र से ही रोमांचित हो उठते हैं | आज़ादी के मतवालों के मतवालेपन और जिद्द के आगे ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भी अपने घुटने टेक दिए थे | परतंत्रता की लम्बी काली रात्रि समाप्त हुई थी और स्वतंत्रता का नवल-प्रभात खिल उठा था | यह दिन सदैव ही भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिन बनकर जगमगाता रहेगा |
        मित्रों ! हमारे पुरखे हमें सिखा गए हैं कि छोटे-छोटे प्रयासों और योगदानों से बड़े-बड़े मुकाम और लक्ष्य पाए जा सकते हैं | अगर एक-एक कर हर इंसान जुड़ता जाए तो मज़बूत कड़ी बन जाती है | एकता में वो शक्ति है जो बड़ी से बड़ी निरंकुशता को भी डिगा सकती है | हमारे स्वाधीनता सेनानी भी कुछ ऐसी ही मजबूत कड़ियों की तरह थे जिन्होंने अपनी शक्ति और आत्मबल के आगे अंग्रेजी हुकूमत को डिगा दिया था | आज हम सब उनका ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं | हम आभार व्यक्त करते हैं उन नौजवानों का जिन्होंने अपने संकल्प को पूरा करने की खातिर अपना भविष्य दांव पर लगा दिया, अपनी जवानी की लालसाओं को भी त्याग दिया और फाँसी के उस फंदे को चूम लिया जो उनके गले की वरमाला बनी | हम उन आज़ादी के मतवालों का आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने अपना घर-परिवार, हर सुकून त्याग दिया | सरकारी प्रलोभनों को ठुकरा दिया और आज़ादी की मशाल को निरंतर जलाए रखा | हम आभार व्यक्त करते हैं उन वृद्धों का जो नवयुवकों के लिए प्रेरणास्रोत बने... आज़ादी के जुनून ने उनकी रगों में भी उबाल पैदा किया | हम कोटि-कोटि नमन करते हैं उन माताओं और बहनों को जिन्होंने अपना हर आराम, अपनी नज़ाकत, अपना जीवन, अपना सुहाग व ममत्व सब देश के लिए न्योछावर कर दिया | आज भी हमारे देश भारत को इसी जज़्बे की आवश्यकता है | हमारा मधुमय देश आज बड़ी ही आस के साथ अपनी संतानों की ओर निहार रहा है | ....कहाँ खो गया वो जज़्बा ....कहाँ मिट गई वो एकता ....कहाँ तिरोहित हो गई आपसी-सद्भावना !! कौन रिश्तों में विष घोल रहा है ....मानवता को शर्मसार कर रहा है !! क्या विकास की कीमत यही है, जो आज हमें चुकानी पड़ रही है !! एक ओर तो हम चाँद पर कदम रख रहे हैं तो दूसरी ओर अपने घर से ही बेघर हो गए हैं ....एक ओर तो हम सुसंस्कृत होते जा रहे हैं तो दूसरी ही ओर अपने बुजुर्गों का सम्मान ही भूलते जा रहे हैं ....एक ओर तो हम संचार-क्रान्ति और ग्लोबल-क्रान्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं तो दूसरी ही ओर सारी नैतिकता से हाथ धोते जा रहे हैं ....एक ओर तो वैश्वीकरण ने अपने आगोश में सारे विश्व को ले लिया है तो दूसरी ही ओर विकट महंगाई के चंगुल में जकड़ते जा रहे हैं | ‘सोने की चिरैया’ का धन काला होकर विदेशी बैंकों में कैसे पहुँच गया ! विरोधाभासों की लिस्ट बहुत लम्बी है |
          भारत के युगपुरुषों ने इस धरती पर रामराज्य का स्वप्न देखा था किन्तु आज हर मोड़ पर रावणों का साम्राज्य है | सीता शर्मसार है और असुरक्षित भी | ज़ख्म जटायु को नहीं बल्कि सीता के ही जिस्म को मिल रहे हैं क्योंकि अब कोई जटायु सीता की रक्षा करने को आगे नहीं आता ....यहाँ तक कि हरण का दृश्य भी कैमरे में कैद कर संचार-माध्यम (टी.आर.पी. की खातिर) के हवाले कर दिया जाता है | अब मेरे देश के खेतों में वृक्षों पर केवल मीठे-मीठे आम ही नहीं लटकते बल्कि जिस्म भी लटके पाए जाते हैं ....काश ! कोई उस ठूँठ जैसे पेड़ की शर्मिंदगी को ही देखकर शर्मिंदा हो पाता | जिस बीज को रोपकर किसान पेड़ की शक्ल देता है, गरीबी से लाचार हो वो बेचारा उसी की डालियों पर खुद ही झूल जाता है ! जिसकी टहनियों पर बचपन झूलता था आज उन्हीं पर किशोरावस्था लटका दी जाती है ! जिसे राजकाज की बागडोर दी जाती है वही अपनी आस्तीनों में जहरीले साँप पाल रहा है | सत्ता के रक्षक अपनी जुबान की ही रक्षा नहीं कर पा रहे हैं कदाचित इसीलिए आज दरिन्दे ‘नादान’ कहे जा रहे हैं | आज़ादी के मतवालों को विद्यार्थियों के स्लेबस में ‘आतंकी’ विशेषण से नवाज़ा जा रहा है | जमाखोर बाज़ारवाद के साथ षड्यंत्र रच रहा है | विकट महँगाई और भ्रष्टाचार की ताड़का ताड़ को भी शर्मिंदा कर रही है | न जाने कौन चैन-ओ-सुकून के साथ खिलवाड़ कर, पूरी इंसानियत को शर्मसार कर रहा है | शान्ति की जगह हाहाकार है ...चीत्कार है | प्रेम वीभत्स हो चुका है ...श्रृंगार जुगुप्सा जगा रहा है | वीरता स्वार्थपरता बनती जा रही है | वात्सल्य लाचार है | हर दिल में रौद्र पैठ बनाता जा रहा है | करुणा रौद्र बनती जा रही है | हर भाव की अतिश्योक्ति होती जा रही है | .....क्या हमने इसी आज़ादी का स्वप्न देखा था | एक बार फिर जगने और जगाने का समय आ चुका है | अब स्त्रियों को अपने सम्मान के लिए स्वयं कमर कसनी होगी | आम जनता को भी अपनी शक्ति पहचाननी होगी | बदलाव की लहर एक बार फिर तूफ़ान का इंतज़ार कर रही है | इस बार हम सभी को तूफ़ान बनना पड़ेगा | हाथ पर हाथ धरके या अलग-अलग झुण्ड बनाकर समस्याओं की चर्चा करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला | सत्तासीनों ने बड़ी ही चतुराई से अपना रक्षा-कवच गढ़ा है | आम जनता को अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति और महंगाई के चक्रव्यूह में ऐसा उलझा दिया गया है कि वह अपनी ज़रूरतों के आगे और कुछ न तो देख पा रहा है और न ही सोच पा रहा है | कोई भी दुर्घटना देखकर आगे बढ़ जाता है और अगले दिन नई घटनाओं के साथ पुरानी भूलता जाता है |
         उठो मित्रों ! आज फिर अपनी आवाज़ बुलंद करो | फिर एकता का परिचय दो | देश को एक बार फिर आज़ादी की आवश्कता है....बुराइयों से....भ्रष्टाचार से....जमाखोरी से....महंगाई से....चारित्रिक और नैतिक पतन से....बढ़ते आतंकवाद से....गहराते भीतरी संकटों से | देश हमारा है और इसके विकास का उत्तरदायित्व भी हम सब पर ही है | हमें एक दूसरे पर उँगली दिखाने की बजाए एक दूसरे का हाथ थामना होगा | डगर लम्बी है, कठिन है किन्तु हमारी मंजिलें जरा भी असंभव नहीं हैं .... एक बार हौसला जगा कर तो देखें | वन्दे मातरम् |

________________________________________________________________  रश्मि    

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