शनिवार, 16 अगस्त 2014

रसिक शिरोमणि नटवर नागर

रसिक शिरोमणि नटवर नागर
         आज हम सोलह कलाकारी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मना रहे हैं| कान्हा को प्रेमपूरित होने के कारण ही रसिक शिरोमणि कहा जाता है| उन्होंने धरती पर प्रेम और धर्म की स्थापना करने के उद्देश्य से ही जन्म लिया था| उनके जीवन का हर प्रसंग हमें प्रेम, धर्म और नैतिकता की प्रेरणा देता है| कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग श्रीकृष्ण पर अनेक व्यंग कसते हैं कि वे गोपियों से छल करते थे और उनके वस्त्र चुराते थे, राधा को प्रेम करने के बाद भी रुक्मीणी से विवाह किया, सोलह हज़ार पटरानियों के स्वामी थे, छल के द्वारा पांडवों को जितवाया....आदि आदि| यदि हम अपनी मानसिक संकीर्णता से ऊपर उठकर सोचें तो पाएंगे कि उनकी हर लीला के पीछे संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा विद्यमान है| विष्णु जी को पुत्र रूप में पाने के लिए माँ यशोदा और माँ देवकी दोनों ने कठिन तप किया था| उनके तप से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने वर मांगने के लिए कहा| तब माँ देवकी ने कहा कि मैं आपको जन्म देना चाहती हूँ और माँ यशोदा के मुँह से निकला कि मैं आपका पुत्र-रूप में पालन करना चाहती हूँ| इस प्रकार उन्होंने दोनों को वात्सल्य-सुख दिया| ये प्रसंग हमें प्रेरणा देता है कि प्रभु हमारी सारी आकांक्षाओं को पूरा करते हैं, फेर हमारी ‘मांग’ में ही होता है| इसी प्रकार कंस, जरासंघ आदि सम्बन्धियों को मारने के पीछे हिंसा का कोई प्रयोजन नहीं था बल्कि वे ये सन्देश देना चाहते थे कि, ‘यदि अपना ख़ास व्यक्ति भी मानवता और अपनत्व को हानि पहुँचाए तो रिश्तों के नाम पर उसके गुनाह को स्वीकार करने की बजाए कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए| कृष्ण ने राधा और समस्त गोपियों के साथ सिर्फ प्रेम ही किया| कुछ तुच्छ मानसिकता वाले मित्रों का विचार है कि कृष्ण गोपियों के वस्त्र चुराते थे, आधी रात को यमुना के किनारे रास करते थे, आदि| मेरा उन मित्रों से प्रश्न है कि क्या बारह वर्ष की आयु का बच्चा ऐसी घृणित मानसिकता रख सकता है? बालक कृष्ण बारह वर्ष की अवस्था में मथुरा चले गए थे| और उस उम्र का बालक दैहिक नहीं बल्कि बाल-सुलभ प्रेम करता है| वो ज़माना ए. सी. या कूलर का ज़माना नहीं था| लोग खुले आकाश के नीचे सोते थे, यमुना किनारे विहार करना पसंद करते थे, गाँव के समस्त परिवारों को अपने परिवार की तरह मानते थे और बालक कृष्ण भी उसी यमुना के किनारे गोपी ग्वालों के साथ खेल ही खेला करते थे| सब मित्रों में राधा के साथ उनका विशेष स्नेह था जो कि मानवीय प्रकृति के अनुसार स्वाभाविक भी है| उनका प्रेम निश्छल-प्रेम था...किसी भी कामना से परे| इसी का परिणाम था कि राधा आजीवन उनकी आत्मीय बनीं रहीं और विवाह रुक्मिणी से हुआ| अपने इसी निश्छल प्रेम को साबित करने के लिए श्रीकृष्ण ने महारास की रात कामदेव तक को पराजित करके दिखा दिया|
          वे कुशल राजनीतिज्ञ थे| महाभारत में उन्होंने कोई छल नहीं किया बल्कि अधर्म को पराजित कर धर्म की स्थापना की| वे सशरीर पांडवों के साथ थे जबकि उनकी विशाल सेना कौरवों के साथ थी| ....फिर छल कैसा!! इस पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगी| कृष्ण का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा के सामान है| यदि हम उनकी एक-एक लीला को गहराई से समझें तो हमें जीने की अदभुत कला मिलती है| आज हम सभी मिलकर उस नटवर नागर प्यारे कान्हा का जन्मोत्सव मना रहे हैं और उसे प्रेम का प्रतीक बनाकर अपने दिलों में बसाए हुए हैं और सदैव बसाए रहेंगे| जय श्रीकृष्ण|   
____________________________________________________________ रश्मि 

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