शनिवार, 27 सितंबर 2014

मनोबल न खोएँ


मनोबल न खोएँ
         हम अपने जीवन में अनेक सपने सजाते हैं | अनेक इच्छाएँ पैदा करते हैं और बड़े-बड़े लक्ष्य बनाते हैं | अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अनेकानेक प्रयत्न भी करते हैं | उनके लिए योजनाएँ बनाते हैं और जी जान से जुट जाते हैं किन्तु विडंबना ये है कि अक्सर हम किसी भी काम के पूरा होने में अधिक समय लगता देखकर निराश हो उठते हैं और अपनी उन योजनाओं को बीच में ही छोड़ देते हैं | कहीं न कहीं हम नकारात्मकता से भर उठते हैं और अपने प्रयास बंद कर देते हैं | यह निराशा और नकारात्मक सोच ही हमारी सफलता की राह की सबसे बड़ी बाधा है | काफी साल पहले मैंने एक किस्सा सुना था जो कुछ यूँ था –
        एक व्यक्ति था | वह बहुत ही परिश्रमी था | उसने अपने पूरे जीवन के लिए अनेक योजनाएँ बना रखीं थीं और उन्हें पाने के लिए भरसक प्रयास भी करता था लेकिन उसकी एक बड़ी कमजोरी थी कि वह बहुत जल्द ही निराश हो जाता था | इसी निराशा के चलते वह अनेकों कार्यों को आजमाता रहा | किन्तु धैर्य और सकारात्मकता का आभाव होने के कारण वह जल्द ही पुराने काम को बीच में ही छोड़ नए कामों पर हाथ आजमाने लगता और इसी प्रकार दिन गुज़रते गए | एक रोज़ उसकी मृत्यु हो गई और वह अपनी अनेक अधूरी इच्छाओं के साथ दुनिया से विदा हो गया | जब वह स्वर्ग पहुँचा तो देवदूत उसे एक कमरे में ले गए जहाँ वे सभी चीज़ें बड़े ही करीने से सजी रखीं थीं, जिन्हें पाने की इच्छा वह धरती पर किया करता था | उसने देवदूत से पूछा –“क्या ये सब मेरे लिए हैं !” देवदूत ने उत्तर दिया –“जी हाँ ! ये सारी चीज़ें आपकी ही हैं | ये वे ही चीज़ें हैं जिन्हें आप पाना चाहते हैं |” “.....तो ये सब आपने मुझे जीते-जी ही धरती पर ही क्यों नहीं दीं !” “जब आप इच्छा करते थे तो हम बनाना शुरू कर देते थे और फिर हम जैसे ही आपको देने वाले होते थे कि आप उसे पाने का ख्याल छोड़ कुछ और चाहने लगते थे |....फिर हम आपके लिए उस दूसरी चीज़ को बनाने में जुट जाते थे | इस प्रकार कुछ चीज़ें तो हम आपको दे पाए और कुछ नहीं दे पाए, सब यहीं इकट्ठी होतीं गईं | ये सब आपकी ही हैं, आप इनका इस्तेमाल कीजिए |”
        मित्रों ! ये एक काल्पनिक कथा है | दूसरी दुनिया का सच हम नहीं जानते | लेकिन इस दुनिया के सच से हम सब बखूबी परिचित हैं | और यह सच है कि जब हम अपने भीतर किसी भी तरह की इच्छा पैदा करते हैं तो हमारी सारी शक्ति, सोच, प्रकृति, गतिविधियाँ उसे प्राप्त करने के लिए उद्यत हो उठतीं हैं | आवश्यकता है तो बस ‘मनोबल’ की | यदि हम पूरे जोश और लगन के साथ किसी काम को करने में जुट जाएँ तो वह काम अवश्य ही पूरा होता है जबकि थककर या निराश होकर उस काम को बीच में ही छोड़ दें तो असफलता ही हाथ लगती है | वैसे ही यदि हम कोई खवाहिश पैदा करें तो उसे पाने के लिए अपनी पूरी निष्ठा और शक्ति लगा दें | हम कभी भी न तो निराश हों और न ही हताश | हमारी लगन और आत्मबल ही हमारे भीतर वो उत्साह और शक्ति पैदा करता है जो कठिन से कठिन काम को भी पूरा करते हैं |
-------------------------------------------------------------------------------------------------- रश्मि 

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

सुख और दुःख

सुख और दुःख
सुख और दुःख मानव मन की अनुभूतियाँ हैं | जो व्यक्ति हर हाल में प्रसन्न रहता है, वो विकट से विकट परिस्तिथियों में भी अपना बर्ताव नहीं बदलता और सुखी रहता है जबकि जो व्यक्ति सदैव दुखी और नाखुश रहता है वो हर जगह दुःख का ही अनुभव करता है | सुखी मनुष्य अपने इर्द गिर्द अपने स्वभावानुसार वातावरण का निर्माण कर लेता है और इसी के विपरीत मनुष्य हँसते खेलते वातावरण में भी प्रसन्न नहीं रह पाता |
हमारी दादी एक पुरानी कथा सुनाया कतरी थीं – एक बार दो दोस्त थे | दोनों ही बड़े मेहनती थे और दोनों की मित्रता भी खूब गहरी थी | दोनों का स्वभाव बिल्कुल विपरीत था | पहला मित्र जितना हँसमुख और सकारात्मक सोच का धनी था दूसरा उतना ही दुखी और नकारात्मक सोच वाला | ...किन्तु यह मित्रता दोनों के जीवन में तालमेल बनाए रखती | सकारात्मक सोच वाला अपने मित्र को हर काम के लिए प्रोत्साहित करता रहता और नकारात्मक सोच वाला अपने मित्र को किसी भी काम को शुरू करने से पहले खतरों से अवगत कराकर सावधान किये रहता | किन्तु वे अपने-अपने स्वाभाव को बदल नहीं सके | एक का हँसमुख स्वाभाव उसे हर हाल में खुश रखता तो दूसरे का दुखी स्वाभाव उसे गंभीर और दुखी ही बनाए रहता | समय के साथ-साथ दोनों ने अपना परिवार बसाया | लेकिन अब भी सुखी मित्र संतुष्ट नज़र आता जबकि दुखी प्रवृत्ति वाला उदास ही रहता | इस प्रकार साल दर साल गुज़रते गए | दोनों को पत्नी और बच्चों के सुख मिला | दोनों में अपने-अपने व्यवसाय में तरक्की की, सफल जीवन बिताया | ...और जब जीवन की संध्या आई तब भी उनका स्वभाव उसी प्रकार ही रहा और नतीजा यही हुआ कि एक मित्र तो हर हाल में जीवन को खुलकर और भरपूर जीता रहा जबकि दूसरा मित्र अब तक अपने जीवन से असंतुष्ट ही रहा और हर बात पर मीन मेख करता रहा |
इसी प्रकार से हम सभी भी अपने-अपने जीवन की खुशियों और दुःख के लिए खुद ही उत्तरदाई होते हैं | ऐसा कभी नहीं होता कि किसी एक व्यक्ति को सुख ही सुख मिल जाएँ और दूसरे को दुःख के सिवाए कुछ न मिले |...लेकिन हम अपने स्वभाव के अनुसार अपने सुख-दुःख को कम या ज्यादा करके अनुभव करते हैं | खुशहाल जीवन जीने का सबसे बेहतरीन तरीका यही है कि अपने दृष्टिकोण को ही बदल डाला जाए | जो चीज़ें दुखदाई हों उन्हें कम करके आँका जाए और जो चीज़ें सुख देती हों उन्हें और विस्तार दे दिया जाए |
- रश्मि

सोमवार, 15 सितंबर 2014

निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल ।

निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिए को शूल ।।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि हिंदी भाषा को राष्ट्र के कामकाज की भाषा बनाना है | हिंदी को व्यवहार में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है । वहीं सुमित्रानंदन पंत की नजर में हिंदी अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है। देश के लोग इस भाषा में अपने विचारों को बखूबी व्यक्त कर सकते हैं | “निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल” भारतेन्दु हरिश्चंद की ये पंक्तियां बहुत बड़ा संदेश देती हैं । आज जब उसी हिंदी के व्यावहारिक उपयोग की बात उठी तो राजनीति के पुरोधाओं ने हाय-तौबा मचाना शुरू कर दिया । इस प्रसंग को यहाँ उठाने का मकसद यही है कि हिंदी के विरुद्ध उठने वाली ताकतों का विरोध किया जाए | पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा देने संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए, जिससे हिंदी व गैर-हिंदीभाषी राज्यों के बीच टकराव उत्पन्न हो गया | जब माहौल गरमाया तो मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दिया कि यह निर्देश केवल हिंदीभाषी राज्यों के लिए है और गैर-हिंदीभाषी राज्य इसे मानने के लिए मजबूर नहीं, लेकिन इस पूरी कवायद में हिंदी व गैर-हिंदीवाद की दबी चिनगारी एक बार फिर सुलग उठी। ...किन्तु प्रश्न यह है कि भारत जैसे देश में ये विरोध क्यों ? स्पष्टीकरण की आवश्यकता क्यों ? क्यों धीरे-धीरे हिंदी इनती पीछे क्यों कर दी गई कि कुछ राज्यों तक ही सिमट कर रह गई | जबकि यदि इसका सम्पूर्ण विकास किया जाता तो यह पूरे देश की समृद्ध भाषा बन सकती थी | आज भी दुनिया में केवल मुठ्ठी भर देश ही हैं, जो अंग्रेजी में शिक्षण करते हैं, उनकी राजनयिक व्यवस्था प्रणाली की भाषा अंग्रेजी हैं | अधिकांशतः देशों में उनकी शिक्षण-प्रणाली का माध्यम उनकी अपनी मातृभाषा ही है । राजनयिक कार्यों की भाषा का माध्यम भी उनकी अपनी मातृभाषा ही है । क्या हमे चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देशो से सबक नही लेना चाहिए । उनके यहाँ आधारभूत शिक्षा से लेकर उच्चस्तरीय शिक्षा और शोध उनकी मातृभाषा में ही होते हैं | क्या ये देश विकास की दौड़ में किसी से भी पीछे हैं ?
हमारे देश में यह तर्क दिया जाता है कि यदि विश्व पटल पर उभरना है तो अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है | और यही कारण है कि अंग्रेजियत से सराबोर एक वर्ग तैयार होता जा रहा है | इसी वर्ग को देखकर वह युवा जो बेहद मेहनती और बुद्धिमान है किन्तु अपने अंग्रेजी-ज्ञान के कम होने के कारण कुंठा से ग्रस्त होता जा रहा है | अंग्रेजी सीखना अनिवार्य बनता जा रहा है |....किन्तु मेरा प्रश्न ये है कि अंग्रेजी सीखने के लिए अपनी मातृभाषा से किनारा क्यों किया जाए ? क्या यह उचित है ? किसी एक विषय के ज्ञान को पाने के लिए दूसरे की अवहेलना क्या अनिवार्य है ? चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देशों में अपनी मातृभाषा में ही सभी कार्य होते हैं | उनके शिक्षण संस्थानों में जब भी कोई वैज्ञानिक कोई शोध पत्र तैयार करता है तो उसका अनुवाद अंग्रेजी में कर के बाकी के देशो में भेजा जाता है या कोई शोध पत्र बाहर से आता है तो उनकी शिक्षण संस्थानों के भाषा विशेषज्ञ उसे मातृभाषा में अनुवाद करके देश की सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में भेज देते हैं । क्या यही पद्धति हमारे देश में नहीं लागू की जा सकती ? माना कि इस कार्य में दोहरी मेहनत है किन्तु अपनी भाषा के विकास और प्रसार के लिए इतना तो किया ही जाना चाहिए | आखिकार यह हमारे लिए राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न है |
हमारी हिंदी भाषा के व्याकरण को सबसे वैज्ञानिक माना गया है | दिमाग के शोध के बाद पाया गया कि हिंदी बोलते या लिखते समय मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ दोनों भाग सक्रिय हो जाता है जिससे दिमाग और अधिक चुस्त होता है | हिंदी भाषा की जिस तरह की वर्णमाला है उसमे ऊपर नीचे दायें बाएं लगी मात्राओं के कारण दिमाग को अधिक मेहनत करनी पड़ती है जबकि अंग्रेजी एक लाइन में पढ़ी जाने वाली भाषा है इसलिए उसमे मस्तिष्क का सिर्फ बायाँ हिस्सा ही इस्तेमाल होता है | अतः हिन्दीभाषी लोगों के लिए मस्तिष्क को चुस्त-दुरुस्त रखने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि वे अपनी बातचीत और कामकाज में अधिक से अधिक हिंदी भाषा का प्रयोग करें | सब कहते हैं कि, “भारतीय टेलेंट पूरी दुनिया पर छाया हुआ है | यदि इंडियंस को मौका मिले तो नासा तक जाकर छा जाता है |” इसका कारण ही यह वैज्ञानिक भाषा है | क्योंकि हम बचपन से ही अपनी भाषा के उपयोग के साथ-साथ अपने मस्तिष्क का भी विकास करते जाते हैं | आज हमारे शिक्षण संस्थानों ने अंग्रेजी को अनिवार्य विषय बना दिया है और हिंदी पीछे धकेली जा रही है | क्या यही विकास है ? आजकल सबसे लोकप्रिय तर्क यह दिया जाता है कि अंग्रेजी हमें दुनिया से, बाजार से, प्रौद्योगिकी से और उच्च शिक्षा से जोड़ रही है। ऐसे में हिंदी या भारतीय भाषाओं की बात करना पिछड़ेपन की बात होगी । क्योंकि आइआइएम और आइआइटी की चकाचौंध-भरी दुनिया के मुकाबले हिंदी की बात करना किसी देहाती संसार की कल्पना करने जैसा ही है, जबकि सच्चाई यह है कि अंग्रेजी ने भारत को दो हिस्सों में बांट दिया है । एक मुठ्ठी भर लोगों का वह खाया-पीया-अघाया तबका है, जो इक्कीसवीं सदी में जीवन-आनंद के हिचकोले ले रहा है और दूसरे ओर वह ग्रामीण और पिछड़ा भारत है, जो गंदा है, जिसकी आंखें अभी भी कुछ मिचमिचा रही हैं और वह इक्कीसवीं सदी के सपनों को देख पाने में असमर्थ है। ये वे लोग हैं जो निरीह हैं, जो हिंदी, तमिल, तेलुगू, कन्नड, मलयालम, असमिया, मराठी, गुजराती आदि क्षेत्रीय भाषाएँ बोलते हैं। क्या उनके लिए कुछ नहीं होना चाहिए ? जब तक हमारी भाषाएं रोजगार की भाषा नहीं बनेंगी, हम यूं ही निरीह भारतीयों की कतार में खड़े होने को विवश होते रहेंगे, जिसे मुठ्ठी भर अंग्रेजीदां लोग अपने हंटर से आज भी हांक रहे हैं।
अंग्रेजी के जानने या न जानने से विकास पर फर्क नहीं आएगा | मैं एक और उदाहरण देती हूँ – आज़ादी के समय की हमारे देश की जनसंख्या और गरीबों तथा बेरोजगारों की संख्या का अनुपात आज की जनसंख्या और गरीबों तथा बेरोजगारों की संख्या के अनुपात के बराबर भी नहीं बल्कि काफी मात्रा में बढ़ गया है | जबकि आज हमारे युवा और बच्चे अधिक अच्छी अंग्रेजी सीख चुके हैं | इसलिए मित्रों ! अंग्रेजी से कुछ ही परिवारों को लाभ हुआ है | इसके कारण हानि ज्यादा हुई है | वो युवा जो अंग्रेजी नहीं जानता या बेरोजगार है, अवसादग्रस्त होता जा रहा है | यहाँ बात किसी भी भाषा को अपनाने से कहीं ज्यादा अपनी भाषा के सम्मान और गौरव की है | अपनी भाषा रूपी संपदा के होते हुए भी अंग्रेजी को नकारें नहीं किन्तु उसका इस्तेमाल ज़रूरत भर ही करें | मौलिक विचारों का प्रस्फुटन मातृभाषा में ही संभव है । यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर है कि वह उसकी अभिव्यक्ति किस भाषा में करता है ।
हिंदी को यदि उसकी खोई हुई गरिमा फिर से प्राप्त करनी है, तो निस्संदेह हिंदी भाषा-भाषियों को इस दिशा में सर्वप्रथम अपने ही घर से शुरुआत करनी होगी । हमें अपने बच्चों को अंग्रेजी के साथ हिंदी और अपनी प्रांतीय भाषा का ज्ञान नहीं बल्कि अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेजी का ज्ञान दिलवाना होगा | हमें अपनी भाषा और संस्कृति को प्राथमिकता देनी होगी | हमें अपने परिवार और समाज में अपनी मातृभाषा में बात करनी चाहिए | अपनी भाषा का प्रयोग हेय नहीं बल्कि दूसरे की भाषा उधार लेकर बोलना हेय है | मुझे गर्व है कि मेरे देश का प्रधानमंत्री आज विश्वमंच पर हिंदी में अपनी बात रख रहा है और पूरा विश्व उस बात को ध्यानपूर्वक सुन भी रहा है | ....और रही बात समझने की तो उसके लिए दुभाषिये हैं न ! आज इसी महान व्यक्ति के कारण एक बार फिर भारत आत्मसम्मान और आत्मगौरव से भर उठा है, ये क्या कम है ?
मित्रों ! हिंदी दिवस को एक दिन की तरह ही न मनाएं बल्कि यह प्रण लें कि हम हिंदी को सम्मान सहित अपनाएंगे और उसको प्रचारित और प्रसारित करेंगे | कोई भी दूसरी भाषा सीखना जानना अच्छी बात है परन्तु अपनी मातृभाषा का अपमान करना बहुत ही निंदनीय है |
------------------------------------------------------------------------------- रश्मि

बुधवार, 10 सितंबर 2014

अपना दृष्टिकोण बदलें

अपना दृष्टिकोण बदलें
        हमारा जीवन हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है | जैसा हमारा दृष्टिकोण होता है वैसा ही हमारा जीवन भी बन जाता है | अक्सर देखा जाता है कि जो लोग खुशमिजाज़ होते हैं, हर वक्त मुस्कुराते रहते हैं और सकारात्मक सोच रखते हैं वे विकट से विकट परस्थिति में भी अपना संयम नहीं खोते और बड़ी ही सूझ-बूझ के साथ हर स्थिति का सामना करते हैं | ऐसे लोग किसी भी घड़ी में हार नहीं मानते और संकटों से जूझने का माद्दा भी इनके भीतर ज्यादा होता है | जबकि इसी के विपरीत जो लोग हर वक्त नकारात्मक सोच रखते हैं, वे हर घडी अपनी परिस्थितियों को ही कोसते रहते हैं | उनके मुताबिक़ ‘जीवन में सब बुरा ही बुरा होता है | ....और सर्वाधिक बुरा उन्हीं के साथ ही होता है |’ ऐसे लोग बड़ी ही कुशलता से हर काम के पीछे की बुराइयाँ और उनके कारण भी खोज निकालते हैं | सच तो ये है कि ऐसे लोग कभी भी किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति से संतुष्ट नहीं होते, ये कभी भी अधिक समय तक प्रसन्न नहीं रह पाते | इनके अनुसार ‘हम दुनिया के सबसे निरीह जीव होते हैं और हर ज्यादती हमारे साथ ही होती है |’ इस तरह के लोग सब को खुश देखकर भी दुखी होते हैं | इन्हें अपना दुःख सबसे बड़ा प्रतीत होता है | उनकी नकारात्मक प्रवृत्ति इन्हें हर स्थिति में बुराइयाँ ही खोजने पर मजबूर किए रहती है |
         एक वाक्य है – दो मित्र थे और दोनों ही एकदम विपरीत स्वभाव के | एक बार वे दोनों खेतों के रास्ते से कहीं जा रहे थे | उन्होंने देखा कि दूर बेलों पर अंगूर लटके हुए हैं | अंगूर बेहद रसीले नज़र आ रहे थे | दोनों दोस्तों के मुँह में पानी आ गया | एक ने आस-पास नज़र दौड़ाई और उन्हें तोड़ने की जुगत भिड़ाने लगा | दूसरा ललचाई नज़रों से अंगूरों की ओर देख रहा था | उससे रहा नहीं गया और अपने स्वाभाव के अनुसार बड़बड़ाने लगा – “देखो ! इस प्रकृति को भी !! कितनी निर्दयी है | इतने रसीले अंगूर और वो भी इतनी दूर लगा दिए | क्या विडम्बना है, खरबूज इतने बड़े-बड़े होते हैं तब भी वे बेलों पर नीचे ही लटकते रहते हैं जबकि ये अंगूर एकदम छोटे-छोटे हैं और इन्हें हमारी पहुँच से इतनी दूर लटका दिया |” वह लगातार बड़बड़ाए जा रहा था जबकि पहला मित्र उसकी नकारात्मक बातें सुनकर भी मुस्कुरा रहा था और अंगूरों को पाने की कोशिश में लगा हुआ था | वह फिर बड़बड़ाया – “अगर ये नीचे लगे होते तो क्या फर्क पड़ता !!” तभी अंगूरों का एक गुच्छा उसके सर पर आकर गिरा | दूसरा मित्र जोर से हँसा और फिर उससे बोला – “देखा ! इसीलिए प्रकृति ने खरबूजे को अकेला और नीचे लटकाया, जबकि अंगूरों को झुण्ड में और ऊपर लटकाया | अगर अभी तुम्हारे सर पर इन अंगूरों की जगह तरबूजों का गुच्छा आ गिरता तो ....?”
        इसी प्रकार से हमारा स्वाभाव होता है | हम हर वक्त दोषारोपण में अपना समय नष्ट करते रहते हैं जबकि जीवन में समय ही तो सबसे कीमती है | यदि हम सकारात्मक सोच रखें तो हमारा आधा कार्य तो यूँ ही पूरा हो जाता है | हमारी निगेटिव सोच हमारे दिमाग को सुप्त कर देती है | इसके बाद हम कुछ और सोच ही नहीं पाते ; बस बुराइयों में ही उलझ कर रह जाते हैं | अतः कुछ भी बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा | प्रकृति ने हर चीज़, हर नियम हमारे भले के लिए ही बनाए हैं किन्तु लाभ तभी मिल पाएगा जब हम अपना दृष्टिकोण बदलेंगे |   
-------------------------------------------------------------------------------------------- - रश्मि

शनिवार, 6 सितंबर 2014

जीवन पर्यंत कुछ-न-कुछ सीखते रहना चाहिए

                                 जीवन पर्यंत कुछ-न-कुछ सीखते रहना चाहिए 

                 जीवन में ‘सीख’ का अंत कभी नहीं होता | ‘सीखने’ का सिलसिला जीवन-पर्यंत चलता रहता है | जिस घडी से सीखना बंद हो जाता है, उसी घड़ी से विकास भी थम जाता है | दरअसल हमारा जीवन एक पुस्तक की तरह है और हर रोज़ सीखे गए अनुभव उस जीवन रूपी पुस्तक के एक-एक अध्याय की तरह है | जीवन में सीखने का कोई अंत नहीं है | हम पूरी ज़िन्दगी सीखते रहें तब भी ज्ञान के स्रोत ख़त्म न होंगें | हमारे जीवन की किताब में बचपन से लेकर अंतिम सांस तक हर रोज़ एक नया पाठ जुड़ता जाता है और चेतना को जगाता जाता है |
                  यह तब की बात है जब ग्रीक दार्शनिक सुकरात कारावास में थे | सुकरात के लिए यह प्रसिद्ध था कि वे अपने आस-पास के वातावरण और लोगों से कुछ न कुछ सीखते रहते थे | एक बार उन्होंने ध्यान दिया कि उनका एक साथी कैदी बहुत ही कठिन धुन को बड़ी ही सरलता से अपनी मीठी आवाज़ में गा रहा है | वे उसके इस हुनर को अक्सर देखते रहते | एक दिन ऐलान कर दिया गया कि कल सुकरात को फाँसी दे दी जाएगी | अपनी फाँसी की खबर से उन्हें ज़रा भी शिकन न हुई बल्कि वे उस साथी कैदी के गीत को ध्यानपूर्वक सुनते रहे | फिर उसके करीब जाकर बोले – “मुझे भी ये संगीत सिखा दो | तुम कितनी आसानी से इतने कठिन सुर को गा लेते हो ! मैं भी ये सुर सीखना चाहता हूँ |” उस कैदी व्यक्ति ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा – “अब आप क्या करेंगे इस सुर को सीखकर, कल तो आपको सज़ा दे दी जाएगी !” इस पर सुकरात ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया – “....लेकिन मैं फिर भी सीखना चाहता हूँ | मैं चाहता हूँ कि मुझे इस बात की तसल्ली हो कि मैंने अपने जीवन के एक भी दिन को जाया नहीं किया बल्कि अपनी अंतिम साँसों तक अच्छी चीज़ें सीखता रहा |”
               सदैव कुछ न कुछ सीखते रहना और अपने व्यक्तित्व को निखारते रहना भी एक आदत की तरह है | हर व्यक्ति इस आदत को नहीं अपना सकता | सच तो यह है कि लोग थोडा-बहुत सीख जाने के बाद अहंकार से इस कदर भर उठते हैं कि अपने से छोटों से कुछ भी सीखने में अपना अपमान समझते हैं | समझदार मनुष्य इस तुच्छ मानसिकता से ऊपर उठ चुके होते हैं | उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ सीखना ही होता है अतः वे हर छोटे-बड़े से ज्ञान लेते चलते हैं | ‘सीखने’ की दिशा में अभिमान सबसे बड़ा रोड़ा है | अभिमानी व्यक्ति अपने अहम् के कारण कुछ भी नहीं सीख पाता और उसके व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध | अतः अपनी लगन को जगाकर निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहने वाला व्यक्ति सदैव हीरे के समान दमकता रहता है | 
___________________________ रश्मि