निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिए को शूल ।।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि हिंदी भाषा को राष्ट्र के कामकाज की भाषा बनाना है | हिंदी को व्यवहार में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है । वहीं सुमित्रानंदन पंत की नजर में हिंदी अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है। देश के लोग इस भाषा में अपने विचारों को बखूबी व्यक्त कर सकते हैं | “निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल” भारतेन्दु हरिश्चंद की ये पंक्तियां बहुत बड़ा संदेश देती हैं । आज जब उसी हिंदी के व्यावहारिक उपयोग की बात उठी तो राजनीति के पुरोधाओं ने हाय-तौबा मचाना शुरू कर दिया । इस प्रसंग को यहाँ उठाने का मकसद यही है कि हिंदी के विरुद्ध उठने वाली ताकतों का विरोध किया जाए | पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा देने संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए, जिससे हिंदी व गैर-हिंदीभाषी राज्यों के बीच टकराव उत्पन्न हो गया | जब माहौल गरमाया तो मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दिया कि यह निर्देश केवल हिंदीभाषी राज्यों के लिए है और गैर-हिंदीभाषी राज्य इसे मानने के लिए मजबूर नहीं, लेकिन इस पूरी कवायद में हिंदी व गैर-हिंदीवाद की दबी चिनगारी एक बार फिर सुलग उठी। ...किन्तु प्रश्न यह है कि भारत जैसे देश में ये विरोध क्यों ? स्पष्टीकरण की आवश्यकता क्यों ? क्यों धीरे-धीरे हिंदी इनती पीछे क्यों कर दी गई कि कुछ राज्यों तक ही सिमट कर रह गई | जबकि यदि इसका सम्पूर्ण विकास किया जाता तो यह पूरे देश की समृद्ध भाषा बन सकती थी | आज भी दुनिया में केवल मुठ्ठी भर देश ही हैं, जो अंग्रेजी में शिक्षण करते हैं, उनकी राजनयिक व्यवस्था प्रणाली की भाषा अंग्रेजी हैं | अधिकांशतः देशों में उनकी शिक्षण-प्रणाली का माध्यम उनकी अपनी मातृभाषा ही है । राजनयिक कार्यों की भाषा का माध्यम भी उनकी अपनी मातृभाषा ही है । क्या हमे चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देशो से सबक नही लेना चाहिए । उनके यहाँ आधारभूत शिक्षा से लेकर उच्चस्तरीय शिक्षा और शोध उनकी मातृभाषा में ही होते हैं | क्या ये देश विकास की दौड़ में किसी से भी पीछे हैं ?
हमारे देश में यह तर्क दिया जाता है कि यदि विश्व पटल पर उभरना है तो अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है | और यही कारण है कि अंग्रेजियत से सराबोर एक वर्ग तैयार होता जा रहा है | इसी वर्ग को देखकर वह युवा जो बेहद मेहनती और बुद्धिमान है किन्तु अपने अंग्रेजी-ज्ञान के कम होने के कारण कुंठा से ग्रस्त होता जा रहा है | अंग्रेजी सीखना अनिवार्य बनता जा रहा है |....किन्तु मेरा प्रश्न ये है कि अंग्रेजी सीखने के लिए अपनी मातृभाषा से किनारा क्यों किया जाए ? क्या यह उचित है ? किसी एक विषय के ज्ञान को पाने के लिए दूसरे की अवहेलना क्या अनिवार्य है ? चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि देशों में अपनी मातृभाषा में ही सभी कार्य होते हैं | उनके शिक्षण संस्थानों में जब भी कोई वैज्ञानिक कोई शोध पत्र तैयार करता है तो उसका अनुवाद अंग्रेजी में कर के बाकी के देशो में भेजा जाता है या कोई शोध पत्र बाहर से आता है तो उनकी शिक्षण संस्थानों के भाषा विशेषज्ञ उसे मातृभाषा में अनुवाद करके देश की सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में भेज देते हैं । क्या यही पद्धति हमारे देश में नहीं लागू की जा सकती ? माना कि इस कार्य में दोहरी मेहनत है किन्तु अपनी भाषा के विकास और प्रसार के लिए इतना तो किया ही जाना चाहिए | आखिकार यह हमारे लिए राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न है |
हमारी हिंदी भाषा के व्याकरण को सबसे वैज्ञानिक माना गया है | दिमाग के शोध के बाद पाया गया कि हिंदी बोलते या लिखते समय मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ दोनों भाग सक्रिय हो जाता है जिससे दिमाग और अधिक चुस्त होता है | हिंदी भाषा की जिस तरह की वर्णमाला है उसमे ऊपर नीचे दायें बाएं लगी मात्राओं के कारण दिमाग को अधिक मेहनत करनी पड़ती है जबकि अंग्रेजी एक लाइन में पढ़ी जाने वाली भाषा है इसलिए उसमे मस्तिष्क का सिर्फ बायाँ हिस्सा ही इस्तेमाल होता है | अतः हिन्दीभाषी लोगों के लिए मस्तिष्क को चुस्त-दुरुस्त रखने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि वे अपनी बातचीत और कामकाज में अधिक से अधिक हिंदी भाषा का प्रयोग करें | सब कहते हैं कि, “भारतीय टेलेंट पूरी दुनिया पर छाया हुआ है | यदि इंडियंस को मौका मिले तो नासा तक जाकर छा जाता है |” इसका कारण ही यह वैज्ञानिक भाषा है | क्योंकि हम बचपन से ही अपनी भाषा के उपयोग के साथ-साथ अपने मस्तिष्क का भी विकास करते जाते हैं | आज हमारे शिक्षण संस्थानों ने अंग्रेजी को अनिवार्य विषय बना दिया है और हिंदी पीछे धकेली जा रही है | क्या यही विकास है ? आजकल सबसे लोकप्रिय तर्क यह दिया जाता है कि अंग्रेजी हमें दुनिया से, बाजार से, प्रौद्योगिकी से और उच्च शिक्षा से जोड़ रही है। ऐसे में हिंदी या भारतीय भाषाओं की बात करना पिछड़ेपन की बात होगी । क्योंकि आइआइएम और आइआइटी की चकाचौंध-भरी दुनिया के मुकाबले हिंदी की बात करना किसी देहाती संसार की कल्पना करने जैसा ही है, जबकि सच्चाई यह है कि अंग्रेजी ने भारत को दो हिस्सों में बांट दिया है । एक मुठ्ठी भर लोगों का वह खाया-पीया-अघाया तबका है, जो इक्कीसवीं सदी में जीवन-आनंद के हिचकोले ले रहा है और दूसरे ओर वह ग्रामीण और पिछड़ा भारत है, जो गंदा है, जिसकी आंखें अभी भी कुछ मिचमिचा रही हैं और वह इक्कीसवीं सदी के सपनों को देख पाने में असमर्थ है। ये वे लोग हैं जो निरीह हैं, जो हिंदी, तमिल, तेलुगू, कन्नड, मलयालम, असमिया, मराठी, गुजराती आदि क्षेत्रीय भाषाएँ बोलते हैं। क्या उनके लिए कुछ नहीं होना चाहिए ? जब तक हमारी भाषाएं रोजगार की भाषा नहीं बनेंगी, हम यूं ही निरीह भारतीयों की कतार में खड़े होने को विवश होते रहेंगे, जिसे मुठ्ठी भर अंग्रेजीदां लोग अपने हंटर से आज भी हांक रहे हैं।
अंग्रेजी के जानने या न जानने से विकास पर फर्क नहीं आएगा | मैं एक और उदाहरण देती हूँ – आज़ादी के समय की हमारे देश की जनसंख्या और गरीबों तथा बेरोजगारों की संख्या का अनुपात आज की जनसंख्या और गरीबों तथा बेरोजगारों की संख्या के अनुपात के बराबर भी नहीं बल्कि काफी मात्रा में बढ़ गया है | जबकि आज हमारे युवा और बच्चे अधिक अच्छी अंग्रेजी सीख चुके हैं | इसलिए मित्रों ! अंग्रेजी से कुछ ही परिवारों को लाभ हुआ है | इसके कारण हानि ज्यादा हुई है | वो युवा जो अंग्रेजी नहीं जानता या बेरोजगार है, अवसादग्रस्त होता जा रहा है | यहाँ बात किसी भी भाषा को अपनाने से कहीं ज्यादा अपनी भाषा के सम्मान और गौरव की है | अपनी भाषा रूपी संपदा के होते हुए भी अंग्रेजी को नकारें नहीं किन्तु उसका इस्तेमाल ज़रूरत भर ही करें | मौलिक विचारों का प्रस्फुटन मातृभाषा में ही संभव है । यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर है कि वह उसकी अभिव्यक्ति किस भाषा में करता है ।
हिंदी को यदि उसकी खोई हुई गरिमा फिर से प्राप्त करनी है, तो निस्संदेह हिंदी भाषा-भाषियों को इस दिशा में सर्वप्रथम अपने ही घर से शुरुआत करनी होगी । हमें अपने बच्चों को अंग्रेजी के साथ हिंदी और अपनी प्रांतीय भाषा का ज्ञान नहीं बल्कि अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेजी का ज्ञान दिलवाना होगा | हमें अपनी भाषा और संस्कृति को प्राथमिकता देनी होगी | हमें अपने परिवार और समाज में अपनी मातृभाषा में बात करनी चाहिए | अपनी भाषा का प्रयोग हेय नहीं बल्कि दूसरे की भाषा उधार लेकर बोलना हेय है | मुझे गर्व है कि मेरे देश का प्रधानमंत्री आज विश्वमंच पर हिंदी में अपनी बात रख रहा है और पूरा विश्व उस बात को ध्यानपूर्वक सुन भी रहा है | ....और रही बात समझने की तो उसके लिए दुभाषिये हैं न ! आज इसी महान व्यक्ति के कारण एक बार फिर भारत आत्मसम्मान और आत्मगौरव से भर उठा है, ये क्या कम है ?
मित्रों ! हिंदी दिवस को एक दिन की तरह ही न मनाएं बल्कि यह प्रण लें कि हम हिंदी को सम्मान सहित अपनाएंगे और उसको प्रचारित और प्रसारित करेंगे | कोई भी दूसरी भाषा सीखना जानना अच्छी बात है परन्तु अपनी मातृभाषा का अपमान करना बहुत ही निंदनीय है |
------------------------------------------------------------------------------- रश्मि