बुधवार, 10 सितंबर 2014

अपना दृष्टिकोण बदलें

अपना दृष्टिकोण बदलें
        हमारा जीवन हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है | जैसा हमारा दृष्टिकोण होता है वैसा ही हमारा जीवन भी बन जाता है | अक्सर देखा जाता है कि जो लोग खुशमिजाज़ होते हैं, हर वक्त मुस्कुराते रहते हैं और सकारात्मक सोच रखते हैं वे विकट से विकट परस्थिति में भी अपना संयम नहीं खोते और बड़ी ही सूझ-बूझ के साथ हर स्थिति का सामना करते हैं | ऐसे लोग किसी भी घड़ी में हार नहीं मानते और संकटों से जूझने का माद्दा भी इनके भीतर ज्यादा होता है | जबकि इसी के विपरीत जो लोग हर वक्त नकारात्मक सोच रखते हैं, वे हर घडी अपनी परिस्थितियों को ही कोसते रहते हैं | उनके मुताबिक़ ‘जीवन में सब बुरा ही बुरा होता है | ....और सर्वाधिक बुरा उन्हीं के साथ ही होता है |’ ऐसे लोग बड़ी ही कुशलता से हर काम के पीछे की बुराइयाँ और उनके कारण भी खोज निकालते हैं | सच तो ये है कि ऐसे लोग कभी भी किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति से संतुष्ट नहीं होते, ये कभी भी अधिक समय तक प्रसन्न नहीं रह पाते | इनके अनुसार ‘हम दुनिया के सबसे निरीह जीव होते हैं और हर ज्यादती हमारे साथ ही होती है |’ इस तरह के लोग सब को खुश देखकर भी दुखी होते हैं | इन्हें अपना दुःख सबसे बड़ा प्रतीत होता है | उनकी नकारात्मक प्रवृत्ति इन्हें हर स्थिति में बुराइयाँ ही खोजने पर मजबूर किए रहती है |
         एक वाक्य है – दो मित्र थे और दोनों ही एकदम विपरीत स्वभाव के | एक बार वे दोनों खेतों के रास्ते से कहीं जा रहे थे | उन्होंने देखा कि दूर बेलों पर अंगूर लटके हुए हैं | अंगूर बेहद रसीले नज़र आ रहे थे | दोनों दोस्तों के मुँह में पानी आ गया | एक ने आस-पास नज़र दौड़ाई और उन्हें तोड़ने की जुगत भिड़ाने लगा | दूसरा ललचाई नज़रों से अंगूरों की ओर देख रहा था | उससे रहा नहीं गया और अपने स्वाभाव के अनुसार बड़बड़ाने लगा – “देखो ! इस प्रकृति को भी !! कितनी निर्दयी है | इतने रसीले अंगूर और वो भी इतनी दूर लगा दिए | क्या विडम्बना है, खरबूज इतने बड़े-बड़े होते हैं तब भी वे बेलों पर नीचे ही लटकते रहते हैं जबकि ये अंगूर एकदम छोटे-छोटे हैं और इन्हें हमारी पहुँच से इतनी दूर लटका दिया |” वह लगातार बड़बड़ाए जा रहा था जबकि पहला मित्र उसकी नकारात्मक बातें सुनकर भी मुस्कुरा रहा था और अंगूरों को पाने की कोशिश में लगा हुआ था | वह फिर बड़बड़ाया – “अगर ये नीचे लगे होते तो क्या फर्क पड़ता !!” तभी अंगूरों का एक गुच्छा उसके सर पर आकर गिरा | दूसरा मित्र जोर से हँसा और फिर उससे बोला – “देखा ! इसीलिए प्रकृति ने खरबूजे को अकेला और नीचे लटकाया, जबकि अंगूरों को झुण्ड में और ऊपर लटकाया | अगर अभी तुम्हारे सर पर इन अंगूरों की जगह तरबूजों का गुच्छा आ गिरता तो ....?”
        इसी प्रकार से हमारा स्वाभाव होता है | हम हर वक्त दोषारोपण में अपना समय नष्ट करते रहते हैं जबकि जीवन में समय ही तो सबसे कीमती है | यदि हम सकारात्मक सोच रखें तो हमारा आधा कार्य तो यूँ ही पूरा हो जाता है | हमारी निगेटिव सोच हमारे दिमाग को सुप्त कर देती है | इसके बाद हम कुछ और सोच ही नहीं पाते ; बस बुराइयों में ही उलझ कर रह जाते हैं | अतः कुछ भी बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा | प्रकृति ने हर चीज़, हर नियम हमारे भले के लिए ही बनाए हैं किन्तु लाभ तभी मिल पाएगा जब हम अपना दृष्टिकोण बदलेंगे |   
-------------------------------------------------------------------------------------------- - रश्मि

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