मंगलवार, 23 सितंबर 2014

सुख और दुःख

सुख और दुःख
सुख और दुःख मानव मन की अनुभूतियाँ हैं | जो व्यक्ति हर हाल में प्रसन्न रहता है, वो विकट से विकट परिस्तिथियों में भी अपना बर्ताव नहीं बदलता और सुखी रहता है जबकि जो व्यक्ति सदैव दुखी और नाखुश रहता है वो हर जगह दुःख का ही अनुभव करता है | सुखी मनुष्य अपने इर्द गिर्द अपने स्वभावानुसार वातावरण का निर्माण कर लेता है और इसी के विपरीत मनुष्य हँसते खेलते वातावरण में भी प्रसन्न नहीं रह पाता |
हमारी दादी एक पुरानी कथा सुनाया कतरी थीं – एक बार दो दोस्त थे | दोनों ही बड़े मेहनती थे और दोनों की मित्रता भी खूब गहरी थी | दोनों का स्वभाव बिल्कुल विपरीत था | पहला मित्र जितना हँसमुख और सकारात्मक सोच का धनी था दूसरा उतना ही दुखी और नकारात्मक सोच वाला | ...किन्तु यह मित्रता दोनों के जीवन में तालमेल बनाए रखती | सकारात्मक सोच वाला अपने मित्र को हर काम के लिए प्रोत्साहित करता रहता और नकारात्मक सोच वाला अपने मित्र को किसी भी काम को शुरू करने से पहले खतरों से अवगत कराकर सावधान किये रहता | किन्तु वे अपने-अपने स्वाभाव को बदल नहीं सके | एक का हँसमुख स्वाभाव उसे हर हाल में खुश रखता तो दूसरे का दुखी स्वाभाव उसे गंभीर और दुखी ही बनाए रहता | समय के साथ-साथ दोनों ने अपना परिवार बसाया | लेकिन अब भी सुखी मित्र संतुष्ट नज़र आता जबकि दुखी प्रवृत्ति वाला उदास ही रहता | इस प्रकार साल दर साल गुज़रते गए | दोनों को पत्नी और बच्चों के सुख मिला | दोनों में अपने-अपने व्यवसाय में तरक्की की, सफल जीवन बिताया | ...और जब जीवन की संध्या आई तब भी उनका स्वभाव उसी प्रकार ही रहा और नतीजा यही हुआ कि एक मित्र तो हर हाल में जीवन को खुलकर और भरपूर जीता रहा जबकि दूसरा मित्र अब तक अपने जीवन से असंतुष्ट ही रहा और हर बात पर मीन मेख करता रहा |
इसी प्रकार से हम सभी भी अपने-अपने जीवन की खुशियों और दुःख के लिए खुद ही उत्तरदाई होते हैं | ऐसा कभी नहीं होता कि किसी एक व्यक्ति को सुख ही सुख मिल जाएँ और दूसरे को दुःख के सिवाए कुछ न मिले |...लेकिन हम अपने स्वभाव के अनुसार अपने सुख-दुःख को कम या ज्यादा करके अनुभव करते हैं | खुशहाल जीवन जीने का सबसे बेहतरीन तरीका यही है कि अपने दृष्टिकोण को ही बदल डाला जाए | जो चीज़ें दुखदाई हों उन्हें कम करके आँका जाए और जो चीज़ें सुख देती हों उन्हें और विस्तार दे दिया जाए |
- रश्मि

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