गुरुवार, 19 मार्च 2015

ईर्ष्या

एक बूढ़ा किसान अपने चबूतरे पर उदास बैठा था। किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई-" काका! तुम्हारा पूरा खेत बरसात में चौपट हो गया ।"
बुढ़े किसान ने पूछा- "हरिया का? "
"काका! उसका भी बर्बाद हो गया।"
"...और रामू का, लखने का?"
"काका! इस बरसात में हम सबके खेत चौपट हो गए।"
बूढ़े ने ठंडी साँस भरी और मन ही मन कहा 'फिर ठीक है'
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यही स्थिति है हमारे भीतर मौज़ूद "ईर्ष्या" की। हम जले जा रहे हैं, मिट रहे हैं समाप्त हो रहे हैं। उस पर भी इस बात से संतुष्ट हैं कि चलो अच्छा है कि अपनी बिगड़ी तो बिगड़ी लेकिन पड़ोसी की भी न बची। इस ईर्ष्या के चलते हम अपने तन-मन-आत्मा सबका बिगाड़ कर लेते हैं।

जीवन काँटे-सा चुभने के लिए नहीं है मित्रों । ...फूल-सा खिलने के लिए है; महकने और महकाने के लिए है।— आपकी रश्मि

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