गुरुवार, 26 मार्च 2015

एक जिहादी की प्रेम कहानी

एक जिहादी की प्रेम कहानी

प्रकाशन :2/16/2015
रश्मि
“नहीं ! मेरा बेटा आतंकवादी नहीं हो सकता। वह तो खुद ही इतना डरपोक था कि रसोई के चाकू तक को संभाल कर पकड़ता था, वह बम कैसे पकड़ सकता है ! ...ज़रूर आप लोगों को कोई ग़लतफ़हमी हुई है। ”
“अरी अम्मा ! तेरा बेटा क्या डरेगा बम और चाकू से ...वह तो खुद ही एक मानव-बम था। ”
“नहीं ! नहीं ! ऐसा नहीं हो सकता !”
असलम की अम्मी रोती जाती थी और पुलिस के सामने अपने बेटे की पैरवी करती जाती थी।
“ऐसा ही हुआ है अम्मा। कल तुम्हारे बेटे ने शहर में बम लगा रखे थे। शाम को ही सब एक के बाद एक फटने थे, लेकिन भला हो उस लड़की का जिसने सही वक्त पर हमें खबर कर दी और हमने सारे बम खोज-खोजकर डिफ्युज़ कर दिए। ”
“मेरा असलम ...उसे मार डाला सबने ...” और वह बुढ़िया माँ अपने बेटे की तस्वीर को सीने से लगाए दहाड़ मार कर रोने लगी।
“तेरा असलम मानव-बम बनकर घूम रहा था ...खुद को ही उड़ा लिया उसने ...बाकी के चार दूसरे आतंकवादी भी मारे गए। ” पुलिस इंस्पेक्टर बुढ़िया को जानकारी दे रहा था इसी बीच इन्वेस्टीगेशन कर रहे एक अधिकारी ने पीक थूकते हुए हिकारत से कहा – “अच्छा हुआ कि मर गए स्साले। कुछ तो बोझ कम हुआ धरती का। ”
बुढ़िया बेटे की तस्वीर को सीने से लगाए रोए जा रही थी और पुलिस उसके घर की तलाशी ले रही थी। असलम के कमरे से उसे एक एके 47 और कुछ कोकीन मिला।
“कैसी भोली बन रही थी ...कहती थी कि मेरा असलम रसोई के चाक़ू तक से डरता था ...तो क्या इस बंदूक से तू खेलती थी। ” फिर बाकी लोगों की तरफ देखकर बोला – “चलो ओए ! समेटो ये सब ...ले चलो ये सब थाने। इस माई को भी ले चलो। जब तक ये केस नहीं सुलटता तब तक न जाने क्या-क्या पूछना पड़े इससे। ”
असलम अपने अम्मी-अब्बू की पाँचवी और आखिरी औलाद था। वह बचपन से ही पढ़ने-लिखने और बातचीत में निहायत ज़हीन था। जो भी उससे मिलता, उसके व्यवहार पर फ़िदा हो जाता। अपने स्कूल में तो वह सभी का चहीता था। चाहे गाना हो या नाचना, ड्रामा हो या खेलकूद सभी में असलम की डिमाण्ड रहती। उसके बिना मानो हर टीम अधूरी रहती। पढ़ाई में भी उसके और सिमरन के बीच मुक़ाबला बना रहता। कक्षा में कभी असलम अव्वल आता तो कभी सिमरन। इन दोनों के रहते कोई भी पहली और दूसरी पोजीशन पर कब्ज़ा नहीं जमा पाया। स्कूल से बाहरवीं पास करने के बाद असलम ने कम्प्यूटर साइंस ले लिया। वह सॉफ्टवेयर की दुनिया में नए-नए ईजाद करना चाहता था। उसका दिमाग वाकई किसी कम्प्यूटर की तरह ही काम करता था। जल्दी ही असलम अपने कॉलेज का भी हीरो बन गया। हर कोई उससे दोस्ती करना चाहता। लड़कियाँ उसके साथ ही अपने नोट्स शेयर करतीं, बदले में वह भी उनका भरोसेमंद और मददगार था। किसी को भी, कैसी भी ज़रूरत आन पड़े, असलम हमेशा हाज़िर रहता।
वही असलम जिहादी कैसे बन गया ! जो हर इंसान से प्यार करता था ...जो दोस्ती की मिसाल था ...दानव कैसे बन गया ! ऐसा क्या हुआ उसकी ज़िन्दगी में कि अपनी उँगलियों के बीच कलम थामने वाला और कीबोर्ड पर उँगलियाँ नचाने वाला, सबका प्यारा, यारों का यार असलम, अपनी उन्हीं उँगलियों से एके 47 के ट्रिगर दबाने लगा !
इस केस की खासी तहकीकात हुई ...गुप्त छानबीन की गई। फिर जो बात सामने निकल के आई वो कुछ यूँ थी –
असलम जब कॉलेज में था तब उसकी दोस्ती रेहान से हुई। रेहान बुद्धिमान तो था ही साथ ही बेहद तेज़ तर्रार भी था। वह असलम की तरह बड़े दिल का नहीं था, उसके दिल में हिन्दुओं के प्रति बेइंतिहा कड़वाहट थी और असलम से दोस्ती करने का वह एक ही मकसद बताता था कि – “तू अल्लाह पाक की औलाद है ...मेरा जात-भाई है। ” ...हालांकि असलम जांति-पांति और धर्म-सम्प्रदाय के ओछे आडम्बरों से दूर ही रहता था। वह अपने दोस्तों के साथ हर त्यौहार खुल कर मनाता था और सभी धर्म-जातियों का सम्मान करता था। ...लेकिन रेहान से दोस्ती करने के बाद असलम के व्यवहार में धीरे-धीरे ही सही, बदलाव आना शुरू हो गया। वह असलम जो अपनी अम्मी के लाख कहने के बावज़ूद मस्जिद न जाता था, अब हर जुम्मे के जुम्मे मस्जिद जाने लगा। धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती ने ज़ोर पकड़ लिया। घर आना-जाना भी शुरू हुआ और तभी असलम की ज़िन्दगी में आई रेहान की चचेरी बहन सोहा। सोहा उसी शहर में एक फ्लैट किराए में लेकर रह रही थी। वह नौकरी करती थी और प्राइवेट पढ़ भी रही थी। बेहद खूबसूरत और मिलनसार। वह अक्सर रेहान के घर वालों से मिलने उसके घर आया करती थी। तभी उसकी मुलाक़ात असलम से भी हुई। धीरे-धीरे यह मुलाकत बाहर भी होने लगी ...फिर बढ़ने लगी ...और आखिर में वे दोनों एक दूसरे के सबसे करीब आ गए।
अब अक्सर रेहान, असलम और सोहा साथ-साथ घूमते। रेहान असलम और सोहा की नज़दीकियों से वाकिफ़ हो चुका था। वह उन्हें और करीब आने के मौके देने लगा। यह दोस्ती बेहद गहरी होती चली गई। असलम बदल रहा था ...उसकी एक डोर रेहान के हाथ में थी तो दूसरी सोहा के। वे जैसे चाहते उसे घुमाते। ...और वह किंकर्तव्यविमूढ़-सा वही करता जा रहा था जो वे दोनों चाह रहे थे।
“असलम ! तू भी मस्जिद के पीछे वाले चबूतरे पर चला कर। वहाँ के मौलवी साहब दुनियादारी की बड़ी सलीकेदार बातें सिखाते हैं। ज़िन्दगी में यह सब जानना भी तो ज़रूरी है दोस्त !” असलम अक्सर रेहान के साथ उन चबूतरों पर जाने लगा। मौलवी साहब सबको इकठ्ठा करके हदीसें सुनाया करते ...अल्लाह की नज़र में क्या हलाल है और क्या हराम, बताया करते। यूँ भी असलम बेहद कोमल और तहज़ीबदार स्वभाव का था इसिलए उसे इन बातों में रस आने लगा। धीरे-धीरे वह वहाँ अक्सर जाने लगा। असलम नहीं समझ पा रहा था कि रेहान उसे किस राह पर ले जा रहा है। लेकिन रेहान अब तक असलम के स्वभाव को बखूबी बाँच चुका था। वह उसे धर्म के रास्ते जिहाद की ओर लिए जा रहा था क्योंकि असलम जैसे लड़के को इसी रास्ते से ले जाया जा सकता था। रेहान उसे मस्जिद के पीछे की ओर बने एक आतंकी अड्डे की ओर धकेलना चाहता था। यह अड्डा बेग का था। बेग यहाँ दो कमरों के एक पुराने से घर में रह रहा था और छुप-छुपकर अपनी गतिविधियों को अंजाम देता रहता था। रेहान उसका राइट-हैंड था।
रेहान ने असलम की मुलाक़ात अपने दोस्त बेग से करवाई। बेग ने पहली ही मुलाक़ात में अपनी मीठी-मीठी और लच्छेदार बातों से असलम को अपना बना लिया। ...फिर धीरे-धीरे नशा देकर उसके दिमाग को सुन्न करना शुरू किया। ...और आखिर में जब असलम का दिमाग और सोच सुन्न पड़ने लगे तब बेग ने अपने विचारों को उस पर रोपना शुरू किया। धीरे-धीरे वह असलम के विचारों को अपने सांचे में ढालने लगा। जब कभी बेग को अपने इस काम में रुकावट महसूस होती तो वह सोहा का सहारा लेता। सोहा बड़े प्यार से असलम का हाथ पकड़ती और कहती – “बेग भाई ठीक ही तो कह रहे हैं असलम। ” ...और धीरे-धीरे आलम ये हो गया कि वह असलम जो अब तक पूरे देश के बारे में सोचता था, एक कौम तक ही सिमट कर रह गया ...वह असलम जो इंसानियत को पूजता था, जिहाद को जायज़ मानने लगा।
असलम धीरे-धीरे सबसे कट गया। अब उसका चबूतरे और मौलवी साहब से भी कम ही वास्ता रहता। वह हर वक्त बेग के पास ही पड़ा रहता। सोहा भी अक्सर उसके साथ रहती। असलम ने कॉलेज जाना तो कब का बंद कर दिया था, अब अपने घर भी कम ही जाने लगा। अक्सर रातें भी सोहा के फ्लैट में ही गुज़ारने लगा। जब अम्मी ने घर न आने की वजह पूछी तो बोला - “एक नौकरी मिली है, उसी के सिलसिले में शहर से बाहर जाना पड़ता है। ”
उसे होश ही न था कि उसके दिल और दिमाग में जिहाद का बारूद भरता जा रहा है।


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