शनिवार, 28 मार्च 2015

प्रेम

प्रेम ...कहाँ है प्रेम!
बहुत खोजा है उसको
क्या पता कहाँ है
पंछियों की चहक में ढूँढा
तितली के रंगो में तो नहीं
...भँवरे की गुंजन में?
नहीं...नहीं...
तो ?
असीम आकाश में
या सागर की गहराई में
नहीं नहीं...फूलों की खुशबू में होगा!
प्रेम ...कहाँ है प्रेम!
बहुत खोजा है उसको
क्या पता कहाँ है
तेरी मुस्कान में ढूंढा
तेरी मीठी बातों में तो नहीं
...छलकते प्यार में?
नहीं ...नहीं ...
तो ?
बाहों के घेरे में
या कि आँखों के गहरे में
नहीं नहीं...तुम्हारे होठों पर होगा !
प्रेम ....कहाँ है प्रेम
बहुत खोजा है उसको
क्या पता कहाँ है
एक शाम तन्हा ...गहरी सी
बैठ गई मैं
उस शाम के आँचल में सिर को छुपा
तेरी सूरत
उतर आई थी आँखों में
तेरे ख्याल से छलक आईं दो बूंदें
तुम ढलक ना जाओ
ये सोचकर थाम लिया
उन्हें अपनी हथेली पर ।
आह ! ...जिसे खोजा था दर दर
न जाने कहाँ कहाँ
वो प्रेम मेरे नयनों में ही था
इन्हीं दो बूँदों में
...तुम्हीं हो वो
बस गए हो अब मुझमें
सदा सदा के लिए ।— रश्मि
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