गुलाबी फ्रॉक
“सुरेखा ! यह सब क्या है ?”
“यह कुछ राखियाँ हैं, पूजाघर की अधजली बत्तियां हैं
और दीपावली के दिए हैं | ये सब पूजा का ही बेकार सामान है |”
“...तो तुमने इन्हें यहाँ मेज़ पर क्यों रखा है ! फेंको कूड़े में |” मैंने आदेश सुनाया |”
“नहीं राजीव ! ये सब ऐसे कूड़े में नहीं फेंके जाते, इन्हें
गंगा जी में सिराना चाहिए | मैं यह सब एक लिफाफे में डाल
देती हूँ, तुम ऑफिस जाते वक्त सिराते हुए निकल जाना |”
“और ये गुलाबी फ्रॉक ...इसे भी ......?” मैं
बोलते-बोलते चुप हो गया | सुरेख के चेहरे पर भी उदासी थी |
मेरी बात सुनकर उसकी आँखों में नमी उतर आई | वह
बोली- “हाँ यह भी | अब इसको रखकर क्या
करेंगे | इसे भी सिरा देना ...अब हमें इसकी ज़रूरत नहीं |”
बोलते-बोलते उसकी आँखें पूरी तरह से भर आईं थीं लेकिन वह मेरे सामने
रोना नहीं चाहती थी और न ही कोई हमदर्दी पाना चाहती थी इसीलिए कमरे में चली गई |
मैं
बीते दिनों की यादों में खो गया | यह फ्रॉक सुरेखा ने
खुद अपने हाथों से बनाई थी, अपनी होने वाली संतान के लिए
...अपनी बेटी के लिए | आठ महीने पहले की बात है | जैसे ही सबको पता चला कि सुरेखा माँ बनने वाली है, घर
में खुशियाँ छा गईं | माँ बनने की खबर के साथ ही सुरेख भी
बदलने लगी थी | अब वह और सुन्दर लगने लगी थी ...लेकिन थोड़ी
सुस्त हो गई थी | वह घर भर के काम निपटाकर अपने कमरे में
जाती और अपने पेट पर हाथ रखकर अपने होने वाले बच्चे से घंटों बातें किया करती |
कितना अनूठा होता है न माँ और बच्चे का रिश्ता ! ...एक ऐसा रिश्ता
जो अनदेखी डोर से बंधा होता है | माँ को पता भी नहीं होता कि
उसकी कोख में पलने वाली संतान कौन है, कैसी है ...लड़का है या
लड़की है ...गोरी है या काली है, लेकिन फिर भी वह उसके साथ तन
और मन से बंध जाती है | ऐसा ही कुछ बच्चे के साथ भी होता है |
वह तन मन से अपनी माँ पर ही आश्रित रहता है ...दुनिया भर से बेखबर
अपनी माँ की कोख में बढ़ता जाता है | माँ खुश तो वह भी खुश
...माँ दुखी तो वह भी दुखी | शायद इसीलिए गर्भवती महिलाओं को
खुश और संतुष्ट रहने की सलाह दी जाती है |
मेरी
सुरेख भी अब हर वक्त खुश रहने लगी थी | एक दिन
मैंने खिड़की से देखा कि वह अपने बिस्तर पर लेटी हुई है अपने पेट पर हाथ रखकर बच्चे
से बतिया रही है |
“तुम जो भी हो ...लड़का या लड़की ...तुम मेरा और अपने पिता का अस्तित्व हो |
तुम हमारा मान-सम्मान हो बेटा | तुम इस घर की
खुशियाँ हो | जब तुम इस दुनिया में आ जाओगे तब हम तुम्हें
बहुत अच्छी परवरिश देंगे ...तुम्हें अच्छा इंसान बनाएँगे | तुम्हें
अपने इस परिवार का नाम रौशन करना है |”
मुझसे
नहीं रहा गया और मैं भी कमरे में पहुँच गया | सुरेखा
मुझे देखकर सकुचा गई और उठकर बैठ गई | मैंने उसके कंधे को
पकड़ा और लिटाते हुए कहा- सुरेखा ! तुम हमारे इस बच्चे को बहुत अच्छे संस्कार देना |
यह हमारे सारे अधूरे ख़्वाब पूरे करेगा ...दुनिया में नाम कमाएगा |
हम इसे एक बेहतरीन इंसान बनाएँगे सुरेखा |”
उसने
भी हामी भरी और मेरी बाँहों में सिमट आई |
फिर
अचानक एक दिन मेरी माँ को न जाने क्या हुआ कि उन्होंने सुरेखा के अल्ट्रासाउंड की
जिद्द ठान ली | घर में और कोई नहीं चाहता था कि बच्चे के
लिंग के बारे में जाना जाए लेकिन माँ की जिद्द के आगे हम सब हार गए और जब रिपोर्ट
आई तब एक बार फिर हार माननी पड़ी ...और उस बच्ची को गिरवा दिया गया | सुरेखा रोती रही लेकिन माँ ने अपनी जिद्द के आगे उसकी एक नहीं सुनी
...बल्कि उन्होंने तो उस बेचारी को लड़की की पैदाइश फिर उसकी परवरिश और फिर उसकी
शादी तक उठाए जाने वाले तमाम कष्टों को गिना डाला | पहले तो
मैंने भी इसका विरोध किया लेकिन फिर आज्ञाकारी बेटे की तरह माँ की हर बात मानने
लगा ...मानने लगा कि बेटी की परवरिश बहुत मुश्किल होती है ...बेटियाँ माँ-बाप पर
बोझ होतीं हैं ...हमारा समाज बेटियों का भक्षक होता है ...उनके पग-पग पर कांटे
बिछे होते हैं | सुरेखा हम सबके आगे रोती रही बिलखती रही
...और एक दिन वह भरी-पूरी अस्पताल गई और शाम को खाली होकर लौट आई | उसे देखकर लगता था कि मानो वह अपने वज़ूद का अबॉर्शन करवाकर आई हो ...अपने
शरीर के किसी आवश्यक अंग को कटवा आई हो |
अब वह
हर वक्त उदास और थकी-थकी रहने लगी | मैं खुद
उसका गुनहगार था इसलिए उसके इस दुःख में चाहकर भी साथ नहीं दे पा रहा था | माँ कहतीं कि कोई चिंता की बात नहीं है, थोड़े ही
दिनों में ठीक हो जाएगी | हम सबने भी माँ की बात मान ली और
उन थोड़े दिनों के गुज़रने का इंतज़ार करने लगे ...और वाकई वे थोड़े दिन गुज़र गए |
सुरेखा फिर से पहले की तरह घर के सभी काम करने लगी | ...लेकिन उसके भीतर फैले खालीपन को मैंने देखा था | मैने
देखा था कि कैसे उसके भीतर का वो खालीपन रात को उसकी आँखों में उतर आता और वह
चुपचाप मुझसे नज़रें चुराकर इस गुलाबी फ्रॉक को उठा लेती ...अपने सीने से लगाती
...पुचकाती ...और बिलख-बिलख कर रोती ...फिर न जाने कब सो जाती | अगली सुबह वह नॉर्मल दिखती, अपने काम निपटाती नज़र
आती ...यंत्रवत | मैं भी अपराध-बोध से घिरता जा रहा था
क्योंकि मैं ही उसका गुनहगार था | अब मुझे भी लगने लगा था कि
यदि मैं अड़ जाता तो यह अबॉर्शन न होता ...आज सुरेखा की गोद भरी होती ...उसकी गोद
में एक नन्ही-सी परी खेल रही होती ...वह मुझे ‘पापा’ पुकार रही होती ...लेकिन अब तो जो होना था वो हो चुका था |
मैं वह
सारा सामान लेकर दफ्तर के लिए निकल पड़ा और रास्ते में मिलने वाली गंगा जी के पुल के
पास अपनी मोटर-साइकिल रोक दी | उस पैकेट को हाथ में
लिया और थोड़ा नीचे की ओर उतरकर गंगा के किनारे पहुँच गया | मैंने
लिफाफे की गांठ खोली और सारा सामान विसर्जित कर दिया | कुछ
देर तक मौन खड़े रहकर गंगा की लहरों को देखता रहा ...बहते कलावे, धागे, फुल-पत्ते, झाड-झंखाड़ को
देखता रहा और देखता रहा वह गुलाबी फ्रॉक, जो गंगा की लहरों
में भी अठखेलियाँ कर रही थी | फिर पलट कर चल दिया | मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे अपने गुनाहों का विसर्जन करके आ रहा हूँ या
अपनी कायरता को पानी में बहाकर आ रहा हूँ | सहसा मेरे पैर
कहीं उलझ गए और मैं वहीँ ठिठक गया | नीचे पैरों की ओर देखा
तो पाया कि वही गुलाबी फ्रॉक मेरे पैरों में उलझी हुई है |
“यह तो वही गुलाबी फ्रॉक है ! इसे तो मैं गंगाजी में बहा आया था ...यह यहाँ
कैसे ! ज़रूर उड़कर आ गई होगी |” मैं अपना उलझा पैर निकालने
लगा, तभी किसी बच्ची के खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई दी |
मैं भयभीत हो गया ! घूम-घूमकर इधर-उधर देखने लगा | वही खिलखिलाहट फिर गूंज उठी | मैंने ध्यान दिया कि
ये आवाज़ तो उस गुलाबी फ्रॉक में से आ रही है जो इस वक्त मेरे पैरों से लिपटी हुई
है | मैंने झुककर वह फ्रॉक अपने हाथों में उठा ली | वह फिर खिलखिला दी |
“तुम कौन हो ?”
“मैं आपकी और मम्मा की बेटी हूँ, लेकिन आप लोगों ने
तो मुझे मार डाला |”
मैं
अपराध-बोध से भर उठा ...बोला कुछ नहीं बस चुपचाप उस फ्रॉक पर प्यार से अपना हाथ
फिराने लगा |
“आपको पता है ! मैं आप लोगों से कितना प्यार करने लगी थी | मैं मम्मा के पेट में बैठी-बैठी आप सभी से बातें भी करती थी | मुझे मालूम है कि दादी को छोड़कर घर के बाकी सब लोग भी मुझे प्यार करते थे |
पापा ! अगर आप मुझे दुनिया में ले आते तो मैं दादी का दिल भी जीत
लेती, सच्ची |”
उसके
मुँह से “पापा” सुनकर मैं खुद
को संभाल नहीं पाया और रो पड़ा | वह फूल-सी कोमल बच्ची मेरे
गुनाह पर भी मुझसे नाराज़ नहीं थी ...मुझसे बातिया रही थी ...पापा कह रही थी |
“मुझे माफ़ कर दे मेरी लाडो ...मैं तेरा गुनहगार हूँ |”
“मुझे माँ के पास ले चलिए | मुझे यहाँ छोड़कर मत जाइये
| आप लोगों के बिना मुझे डर लगता है | ...और वैसे भी माँ मुझसे बहुत प्यार करतीं हैं | वे
मेरे बगैर कैसे रह पाएँगीं | हर वक्त मुझे ही याद करके रोतीं
रहेंगीं | वे आधी-आधी रातों में उठकर मुझसे बातें करतीं हैं
...मुझसे लाड़ लड़ातीं हैं | मैं उनके बिना फिर से मर जाऊँगी
पापा |”
मैंने
उस गुलाबी फ्रॉक को चूमा ...फिर अपने सीने से लगाया और साथ लेकर चल दिया | उस दिन मैं दफ्तर नहीं गया | न जाने क्यों दिल ही
नहीं किया | वापिस घर आ गया | सबने
पूछा कि क्या हुआ तो कह दिया कि तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही ...बस |
अपने
कमरे में पहुँचकर मैने अपना बैग खोला और वह गुलाबी फ्रॉक बाहर निकाल ली | उसे फिर से सीने से लगा लिया | वह मुस्कुरा रही थी |
तभी सुरेखा मेरे लिए चाय लेकर कमरे में दाखिल हुई | मेरे हाथों में वही गुलाबी फ्रॉक देखकर कुछ पूछने को हुई लेकिन मैने उसके
होठों पर अपनी हथेली रख दी |
“सॉरी सुरेखा ...मैं तुम दोनों का गुनहगार हूँ |”
वह रो
दी और मेरी ही बाँहों में सिमट आई | हम दो
जिस्म एक हो गए ...एकदम एक ...एक दूजे में समा गए |
...वह
फ्रॉक खिलखिला उठी |
आज इस
बात को एक महीना पूरा हो चुका है | सुरेखा
पर फिर से सुस्ती छाने लगी है | उसे फिर खट्टा खाने का जी
करने लगा है ...और माँ को अल्ट्रासाउंड करवाने का | ...लेकिन
इस बार मैं पापा होने का फ़र्ज़ निभा रहा हूँ | वह गुलाबी
फ्रॉक हर वक्त मेरे साथ है ...हँसती हुई ...खिखिलाती हुई ...मेरी बेटी बनकर |
इस बार मैं उसे तार-तार नहीं होने दूंगा |
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