गुरुवार, 30 जून 2016

बुरा जो देखन मैं चला

बुरा जो देखन मैं चलाबुरा ना मिलया कोय !
जो दिल खोजा आपनामुझसा बुरा ना कोय 
!!

        यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह स्वयं को छोड़ संसार के प्रत्येक जीव पर वस्तुओं में बुराई खोजता रहता हैयदि वह खुद के भीतर बुराइयाँ खोजने का प्रयास करे तो यह संसार उसके लिए सुखद बन जाए|बुराई का कोई अंत नहीं हैमानो तो यह कण-कण में विद्यमान है और न मानो तो कहीं भी नहींसिवाए एक भ्रम के|  

        एक संत अपने शिष्यो के साथ जा रहे थेरास्ते मे एक शराबी मिलावह झूमते हुए संत के पास आकर खड़ा हो गया और बोला – “आप सभी को उपदेश देते हैं कि शराब मत पियोये बुरी चीज़ हैलेकिन आप अन्न और फल को बुरा नहीं कहतेअगर ये अच्छे हैं तो इन्हीं से बनने वाली शराब कैसे बुरी हो सकती है?” शिष्य हैरत से देखने लगे की संत इस बात का क्या जवाब देंगेसंत ने मुस्कराकर कहा- अगर कोई तुमपर एक गिलास में पानी भरके फेंक के मारे तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?” शराबी ने कहा- नहींबिलकुल भी नहीं|” संत ने कहा- अगर कोई थोड़ी सी मिट्टी उठाकर तुम्हें मारे तो क्या तुम घायल हो जाओगे?” शराबी ने फिर सर हिलाते हुए कहा- नहींनहीं|” संत ने आगे पूछा –“अब अगर कोई उसी मिट्टी और पानी को मिलाकर तुमपर फेंके तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?” शराबी ने कहा- हाँ! उससे तो मैं घायल हो सकता हूँ|” संत ने समझाते हुए कहा- इसी तरह अंगूर और चावल अपने आप में बुरे नहीं हैं लेकिन यदि इन्हें मिलाकर सड़ा दिया जाए और शराब बनाकर सेवन किया जाए तो ये चीज़ें भी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो बन जातीं हैं|” संत की इस बात का शराबी पर गहरा असर
पड़ा और उस दिन से उसने शराब छोड़ दी|

       इस कहनी से दो बातें सीखने को मिलती हैं- एक तो यह कि शराब बुरी चीज़ है और दूसरी यह कि हम इंसान हर किसी में बुराई ही खोजते रहते हैं और उन्हीं का ढिंढोरा पीटते रहते हैं जबकि उसके बेहतर पक्ष भी हैंहमें दोनों पहलुओं पर विचार करना चाहिए और बुराई को दरकिनार करके उसकी अच्छाइयों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए|
 -रश्मि 

बुधवार, 29 जून 2016

बुराइयों से दूर रहें

बुराइयों से दूर रहें 

इस दुनिया में हर चीज़ अस्थाई हैकुछ भी हमेशा के लिए नहीं हैंये बात जानते हुए भी व्यक्ति इस संसार की भूल-भुलैया में भटकता रहता है वह अपने जीवन में सब पा लेना चाहता है और इन्हीं चेष्टाओं में लगा रहता है जीवन के सुखवैभवभोगविलासलिप्सातृष्णा आदि से कभी भी उसका जी नहीं भरता यदि कभी-कभी उसे अपनी गलतियों का एहसास होता भी है तो वह बहुत ही अल्पकालीन होता है संसार के भोग विलास के चंगुल से आसानी से नहीं निकला जा सकता |

एक वाकया है – एक रईस था वह हमेशा ज्यादा से ज्यादा पैसा कमानेजीवन को ऐश-ओ-आराम से युक्त बनाने तथा विलासिताओं की ओर ही आकर्षित रहता था लेकिन समय के साथ-साथ उसे एहसास हुआ कि मुझे भी अपना परमार्थ सुधारना चाहिए आखिर एक दिन मुझे भी यह सब छोड़ छाड़कर ईश्वर के घर जाना है और मैंने अपने जीवन में इतने छलकपटअपराध किये हैं कि मुझे तो माफ़ी भी आसानी से नहीं मिल पाएगी |’ उसे अपने द्वारा किये गए बुरे कामों का पछतावा हो रहा थावह एक धर्मगुरु के पास गया और बड़ी श्रद्धा से उनसे बोला – “गुरुदेव ! मैंने अपने जीवन में अनेक बुरे काम किये हैं मैं एक व्यवसायी हूँ और मैंने अपने व्यवसाय को और बढाने के लिए अनेक गलत तरीकों का प्रयोग किया मैं मांस-मदिरा से भी खुद को दूर न रख सका सुरा और सुंदरी में ही जीवन का रस तलाशता रहा लेकिन अब मुझे बहुत पछतावा होता है मैं सभी बुराइयाँ छोड़ना चाहता हूँ मेरा बेटा बड़ा हो रहा है और मैं नहीं चाहता कि वह भी मुझे देखकर इन बुराइयों को खुद में उतार ले किन्तु प्रभु मेरी समस्या ये है कि मैं इन कर्मों में इस हद तक लिप्त हो चुका हूँ कि यदि मैं छोड़ना भी चाहता हूँ तो ये मुझे नहीं छोड़तीं आप मेरी सहायता कीजिए |” गुरु मंद-मंद मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति की बातों को ध्यान से सुन रहे थे उन्होंने बड़े प्रेम से कहा- ज़रा अपना हाथ तो दिखाओ |” व्यक्ति ने अपना हाथ गुरु को दिखाने के लिए उनकी ओर बढ़ा दिया गुरु ने अपने चेहरे पर चिंता के भाव लाते हुए कहा- अरे ! तुम्हारी तो उम्र ही बहुत कम बची है तुम अगले चालीसवें दिन इस संसार में विदा होने वाले हो इतने कम समय में मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ! अब तो बेहतर यही होगा कि तुम अपने पुराने कामों को ही निपटाना शुरू कर दो क्योंकि तुम्हारे पास जीने के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं है |” वह व्यक्ति गुरु की बात सुनकर बहुत दुखी हुआ अब वह अपने कारोबार का सभी हिसाब किताब ठीक-ठाक करने लगा उसने जिसका भी धन रोका हुआ था वो सब देना शुरू कर दिया अपने बेटे और पत्नी को भी भरपूर समय और स्नेह देने लगा अपना अधिक से अधिक वक्त दूसरों की भलाई में गुज़ारने लगा उसे बार बार यह अहसास रहता कि उसके पास अब ज्यादा वक्त नहीं है 

जब उनतालीसवां दिन आया तो उसने सोचा- अब मेरे पास एक ही दिन बचा हैतो क्यों न गुरु जी का भी आशीर्वाद ले आऊँ आखिरकार उन्होंने ही मुझे यह बताया है यदि वे मुझे ऐसा न बताते तो मैं अपना इतना वक्त भी यूँ ही बर्बाद कर देता |’ इन उनतालीस दिनों में उसका जीवन पूरी तरह से बदल चुका था अब वह एक नए रूप में अपने गुरु के समक्ष खड़ा था उसने गुरु को प्रणाम किया और कहा- आपकी आज्ञानुसार मैंने अपने सभी बुरे कामों को काफी हद तक सुधार लिया है कल मैं इस जीवन से मुक्त हो जाऊँगा अत: आज आपके दर्शनों के लिए आया हूँ |” गुरु ने उसे प्रेम से अपने नज़दीक बैठाया और समझाया- तुम्हारा पुराना जीवन तो कब का ख़त्म हो चुका है और नया जीवन शुरू भी हो चुका है सच तो ये है कि मुझे तुम्हारी मृत्यु की कोई निश्चित जानकारी नहीं है लेकिन मैं यह सत्य ज़रूर जानता हूँ कि हम सभी को एक न एक दिन इस संसार से जाना ज़रूर है जब हम इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि हम यहाँ हमेशा के लिए नहीं है तो हम अनेक बंधनों और अवगुणों की जंजीरों से खुद को जकड़ लेते हैं जब हमें इस बात का एहसास बना रहता है कि हमें इस संसार से एक न एक दिन चले जाना है तो हम बुराइयों और मिथ्या बंधनों से बचे रहते हैं तुम्हारे भीतर भी इतने बदलाव इसीलिए आए क्योंकि तुमने पिछले उनतालीस दिन यह सोचकर बिताए कि तुम्हें इस दुनिया से चले जाना है तुम अपने सभी अधूरे कामों को पूरा करते रहे और बुराइयों से दूर बने रहे |”

इसी तरह से हमें भी हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए कि हम इस संसार में एक ख़ास मकसद से आए हैं हमारे हैं पास भी थोड़ा ही समय है हम न तो कुछ साथ लाए थे और न ही साथ ले जाएँगे |हमें जल्दी से जल्दी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लेना चाहिए और उस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में काम करना चाहिए जब हम अपने कार्यों को इस सोच के साथ करेंगे तो सभी बुराइयों और बंधनों से दूर बने रहेंगे 


रश्मि 

सोमवार, 27 जून 2016

President House


चिरस्थाई सुख

                                     चिरस्थाई सुख 

भ्रम से छुटकारा पाना बेहद आवश्यक है | और यह ज़रा भी मुश्किल नहीं है, आवश्यकता है तो बस मजबूत इच्छाशक्ति की | जिस दिन हमें इस बात का एहसास हो जाता है कि 'यदि ये पूरी की पूरी दुनिया भी मिल जाए तो भी कुछ नहीं मिलेगा', उसी दिन से सभी भ्रम, सभी चाहतें ...सारी ख्वाहिशें खत्म हो जातीं हैं | विचित्र बात यही तो है कि हम सालों साल जद्दोजहद में लगे रहते हैं, कुछ न कुछ पाने के लिए संघर्ष करते रहते हैं | लेकिन हम जो कुछ भी पाने की चाहत करते हैं वे सभी चीज़ें संसारी हैं, भौतिक हैं, नश्वर हैं | सच तो ये है कि ऐसी दुनियावी चीज़ें प्राप्त करना कठिन भी नहीं होता | लेकिन ये जितनी आसानी से मिल जातीं हैं उतनी ही आसानी से छूटतीं भी जातीं हैं | ये वे चीज़ें हैं जो जो हम इस दुनिया में खोजते हैं, पाना चाहते हैं और फिर एक दिन ये इसी दुनिया में कहीं गुम भी हो जातीं हैं | उसी के बाद हमारी चेतना जागती है और हमें एहसास होने लगता है कि ये चीज़ें मेरा लक्ष्य नहीं हैं | ये जिंतनी भी वस्तुएँ दिख रही हैं, मुझे ये नहीं चाहिए ...और तब हमारे भीतर उनकी चाहत खत्म हो जाती है और हम उनकी ओर से आँख मूँद लेते हैं | 

जैसे ही हम बाहरी वस्तुओं की ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं वैसे ही उनकी इच्छा खत्म हो जाती है | फिर बाहरी आकर्षण छोड़ हम भीतर की ओर देखने लगते हैं और भीतर प्रकाश होना प्रारंभ हो जाता है ...सारा सत्य साफ-साफ नज़र आने लगता है | अब तक स्थूल नेत्र संसार की वस्तुओं को देख रहे थे इसीलिए उनमें ही सुख की तलाश कर रहे थे, उन्हें पाने की मशक्कत में लगे थे लेकिन स्थूल नेत्र ज्यूँ ही बंद हुए सूक्ष्म नेत्र खुल गए | सूक्ष्म नेत्र भीतर की ओर दृष्टि डालते हैं | वे यह देखने की चेष्टा करते हैं कि मैं कौन हूँ ? मेरा अस्तित्व क्या है ? मैं इस संसार में क्या लेने आया हूँ ? मेरी आत्मा को किस वस्तु की तलाश है, उसे किस्में सुख मिलेगा ? ...और इसी के साथ सत्य का बोध प्रारंभ हो जाता है |

हमारे भीतर की आवाज़ इतनी शक्तिशाली होती है कि यदि एक बार जाग जाए तो मनुष्य फिर कभी संसारी आवाजों में नहीं भटकता | हमें अपने भीतर की आवाज़ को ध्यान लगाकर सुनना चाहिए | ये जो भी माँगे, देना चाहिए | यकीन करिए सुख उसी में मिलेगा ...असीम सुख | ये वो सुख होगा जो संसारी वस्तुओं में कभी भी न मिला होगा | ...चिरस्थाई सुख |  
-----------------------------  रश्मि 

शनिवार, 25 जून 2016


वहम की रस्सी तोड़ फेंकें

वहम की रस्सी तोड़ फेंकें 


        जीवन में मिलने वाली असफलताएं कभी भी स्थाई नहीं होतीं अक्सर हम एक बार असफल हो जाने के बाद पुनः प्रयास करने से डरने लगते हैं कभी-कभी तो यह भी होता है कि हम बेहद अच्छा काम करने के बाद भी असंतुष्ट रहते हैं या किसी अन्य के विचारों द्वारा परिचालित होने लगते हैं हमें अपने काम पर विश्वास नहीं होता और दूसरों से राय मांगने लगते हैं | ऐसे में यदि दूसरे लोग सराहना करते हैं तो हम उत्साहित हो उठते हैं लेकिन यदि वे ज़रा भी कमियां निकाल दें तो हम नेगेटिव में चले जाते हैं हम अपना उत्साह खो बैठते हैं हमें अपने भीतर कमियां ही कमियां नज़र आने लगतीं हैं लेकिन इस तरह के विचार सिर्फ हमारे पैर में पड़ी बेड़ियों का ही काम करते हैं हमें इनसे बाहर निकलना चाहिए

       अपने काम के प्रति पॉजिटिव रवैया रखें और निरंतर आगे बढ़ते रहें कभी ये न सोचें कि कोई क्या कहेगा... क्या मैं ऐसा कर भी पाऊँगा... क्या मेरे काम की तारीफ होगी... आदि हमें अपना बैस्ट करना चाहिएबिना किसी पूर्वाग्रह या आशंका के बाकी की सारी चिंताएं तो बस बेड़ियों के सामान हैं जो हमने खुद अपने पैरों में डाल रखी हैं हम इन बेड़ियों में अपनी मर्ज़ी से ही जकड़े हुए हैं क्योंकि यदि हम एक बार ठान लें तो ये झूठी बेड़ियाँ झट टूट जाएँक्योंकि ये मात्र हमारा वहम हैं ऐसी कोई बेड़ियाँ हैं ही नहीं|

        एक वाकया है – एक धोबी था वह अपने गधे को रोज अपने साथ ले जाता |उससे कम लेताबोझा उठवाता और फिर शाम को अपने दरवाज़े पर बांध देता |वह गधा भी अपने मालिक का आज्ञाकारी था एक दिन वह धोबी कुछ सामन लेने अपने गधे को साथ लेकर शहर गया पूरे दिन दोनों बाज़ार की ख़ाक छानते रहे धोबी थककर चूर हो चुका था उसने एक धर्मशाला में जाकर आराम करने का विचार किया अब समस्या थी गधे की गधे को बाँधने  के लिए जो रस्सी वह लाया थान जाने कहाँ खो गई थी शहर भी अनजना और गधा एक जानवर ! अब इसे कहाँ सुरक्षित रखा जाए ! रात में कहीं इधर उधर चला गया तो मुसीबत हो जाएगी वह इसी उधेड़बुन में था तभी एक बुज़ुर्ग उसके पास आए और उसकी परेशानी का कारण पूछा उसने अपनी समस्या उन बुज़ुर्ग को बताई 

बुज़ुर्ग ने समझाया- यह गधा हैतुम्हारी तरह समझदार नहीं तुम एक काम करो इसके गले में और पैर में रस्सी बाँधने के अभिनय करो | ...फिर देखो यह कहीं भी नहीं जाएगा |” 

व्यक्ति इस युक्ति को सुनकर हैरान हो गया किन्तु इस वक्त इसे ही मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था इसलिए गधे के साथ वैसा ही अभिनय करने लगा जैसा बुज़ुर्ग ने कहा थाबुज़ुर्ग हँसते हुए चले गए धोबी भी सोने चला गया |सुबह बड़े तड़के उसकी आँख खुल गईवह घबराया हुआ बाहर आया उसे चिंता थी कि कहीं उसका गधा रात को चला न गया होआखिर था तो जानवर ही न ! किन्तु उसके आश्चर्य का ठिकाना न था गधा तो आराम से ज़मीन पर बैठा हुआ थासर झुकाए धोबी ने गधे को पुचकारा और आगे की यात्रा के लिए उसे हांकने लगा किन्तु अब वह गधा टस से मस ही न होता था उसने गुस्से में गधे को मारना शुरू कर दिया लेकिन गधा तो अब भी अपनी जगह से न हिला |धोबी उसकी ढिटाई पर क्रोधित हो उठा और वहीँ पर पड़ी एक बेंत से उसकी पिटाई करने लगा गधा पिट रहा थारेंक रहा था लेकिन दो कदम भी आगे को न बढ़ता था गधे की आवाज़ सुनकर वे बुज़ुर्ग भी वहाँ आ पहुँचे 

बोले – “ये क्या कर रहे हो बेटा ! इस नासमझ को क्यों पीट रहे हो ! तुम्हीं ने तो इसे रात में एक अदृश्य रस्सी से बाँधा था और अब जब ये चल नहीं रहा तो तुन इसे इतनी बेरहमी से पीट रहे हो !” 

लेकिन बाबा मैंने इसे कहाँ बाँधा था ये आगे तो बढ़े खुद-ब-खुद चलने लग जाएगा|” 

बेटा ! यह भोला जीव है हमारी तुम्हारी तरह चतुर नहीं यह अब भी उस अदृश्य रस्सी से बंधा है तुम फिर से रस्सी खोलने का अभिनय करो | ...फिर देखना यह तुरंत चल देगा |” 

धोबी ने बुज़ुर्ग की बात मानकर वैसा ही किया और सच में इस बार वह गधा एक ही हांक में चल दिया |

       मित्रों ! हमारी सोच भी कुछ इसी तरह की होती है हम अदृश्य चिंताओं से जकड़े रहते हैं भूतकाल में की गई गलतियों या नाकामियों की जकड़न से बाहर ही नहीं निकलना चाहते वर्तमान को बोझ-सा बनाए रहते हैं कभी पुरानी गलतियों पर रोते रहते हैं तो कभी भविष्य की चिंता में गले जाते हैं जो बीत गया अब उस पर दुःख मनाने का क्या फायदा बेहतर तो यह हो कि पुरानी गलतियों से सीख लेकर आगे की ओर बढ़ा जाए इसी प्रकार से जो भविष्य में होने वाला है उसके लिए ख्याली पुलाव न पकाएँ बल्कि पूरे आत्मविश्वास से जुटे रहें और यह विश्वास रखें कि सफलता ज़रूर मिलेगी यदि हम अपने वजूद पर पड़ी वहम और आशंका की इस जकड़न को... इस रस्सी रूपी बंधन को तोड़कर फेंक देंगे तो हम भी आगे की ओर बढ़ते चले जाएँगे 

- रश्मि

सुमित्रा महाजन जी


शुक्रवार, 24 जून 2016

मैं और मैं ही

मैं और मैं ही

मैं क्या है ? बस एक छोटा-सा शब्द जिसे हमने विस्तार दे देकर उसे अपना पूरा का पूरा वजूद बना लिया है | मैं एक शब्द के सिवाए कुछ भी नहीं है ...एक ऐसा शब्द जिसे हमने सिर्फ अपनी एक अलग पहचान देने के लिए गढ़ा था | ताकि हम अपने बारे में कह सकें | हमारा नाम मोहन हो या सोहन, हम उसी नाम से पहचाने जाते हैं | लोग मोहन कहकर पुकारते हैं तो हम दौड़े चले जाते हैं कि, ‘हाँ ! मैं ही मोहन हूँ’ लेकिन यदि हमें कोई सफलता मिल जाए या हम कुछ भी करें तो हम ये नहीं कहते कि, ‘मोहन को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तब हम यही कहते हैं कि, ‘मुझे सफलता मिली या मैंने ये किया’ क्योकि यदि हमने ये कहा कि, ‘मोहन को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तो लोग हमें नहीं किसी और को ही मोहन समझेंगे | इसलिए ‘मैं’ शब्द का प्रयोग खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया | किन्तु हमने उसे इतना विस्तार दे दिया कि यह हमारी पहचान पर ही हावी हो गया |

हम इस ‘मैं’ को ज्यों ज्यों अपने इर्दगिर्द लपेटते जाते हैं यह हमारे व्यक्तित्व पर हावी होने लगता है| तब यह उछाल मारने लगता है और उथल-पुथल मचा देता है | ‘मैं’ सिर्फ खुद को बताने के लिए बनाया गया ...खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया लेकिन धीरे-धीरे यह खुद ही अपनी पहचान बनने लगा | इसका काम था यह कहना कि, ‘फलां काम मैंने किया’ लेकिन यह कहने लगा कि, ‘फलां काम मैंने ही किया’ ज्यों ही इस मैं ने खुद पर जोर डालना शुरू कर दिया त्यों ही ये पूरे के पूरे अस्तित्व पर हावी हो बैठा | हमारे व्यक्तित्व के बाकी सब गुण इसके आगे छोटे पड़ने लगे और यही उभरने लगा यह काम ‘मैंने ही’ किया | सारी मुसीबत की जड़ ‘ही’ पर ज़ोर डालने की प्रवृत्ति है | ‘मैं’ जो भी करे करने दीजिये | ‘मैं ही’ पर जोर मत डालिए | क्योंकि ‘मैं करता हूँ’ अच्छा है लेकिन यदि यह सोचें कि ‘मैं ही करता हूँ’ तो बस ! यहीं से परेशानी शुरू | सोचकर देखिये, जो जो काम हमने नहीं किये वे भी किसी ने तो किये ही न ? तो फिर हम अपने ‘मैं’ को इतना पोषित क्यों करें ?

संसार के सभी काम मिलकर होते हैं, कोई काम अकेले नहीं होता | इसलिए ‘मैं’ की कोई आवश्यकता नहीं है, ‘हम’ ही पर्याप्त है | मैं को तो सिर्फ खुद की पहचान बताने के लिए ही बचाए रखिये | इसे भीतर ही रखिये, बाहर विस्तार मत दीजिये | ‘मैं’ हमारा समूचा व्यक्तित्व नहीं है | एक उदाहरण देखिये - ‘यह मेरा घर है’ उचित है ...लेकिन यह कहना कि ‘यह मेरा ही घर है’ सारी मुसीबत की जड़ है | क्योंकि यदि यह हमारा न होता तो किसी और का होता | यहाँ तक कि हमारा रहते हुए भी किसी और का हो सकता है | ...और हमारे जाने के बाद तो यकीनन किसी और का ही हो जाएगा |


मित्रों ! ‘मैं’ को अपनी पहचान बताने तक ही सीमित रखिए | इसे ‘मैं’ से ‘मैं ही’ मत बनने दीजिये|   ______________________________________________________________रश्मि  

whatsapp की कहानियाँ


राष्ट्रपति भवन


नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी जी


लघुकथा

 राजनैतिक पोशाक 


             एक युवक का सिर फिर गया | वह मुन्ना भाई फिल्म देखकर आया और उसने डिसाइड किया कि अब से वह खादी ही पहनेगा | नया-नया गांधीवादी बना वह युवक खादी के कपड़े खरीदने चल दिया | वह एक ऐसी दुकान पर पहुँचा ....ओह ! माफ़ कीजिए...ऐसे शो-रूम में पहुँचा जहाँ खादी के ही कपड़े बिकते थे | वह एक-एक पोशाक देखता और फिर उसमे लगे रेट-टैग को देखता | बड़ी देर की जद्दोजहद के बाद भी वह युवक अपने लिए कुछ भी नहीं खरीद सका |
         क्योंकि...... उसकी जेब में गांधीजी की तस्वीरों वाले इतने ‘हरे पत्ते’ थे ही नहीं कि इस ‘राजनैतिक-पोशाक’ को खरीद पाता |

मंगलवार, 21 जून 2016

बुराई छोड़ अच्छाई पर ध्यान दें - रश्मि


कुंअर बेचैन जी


लघुकथा - दरारें

                                                                        दरारें 
          
             जब से बेटी का फ़ोन आया है, वे बड़ी परेशान हैं |  
     “ये तो हद्द ही हो गई...विनोद जी ऐसा कैसे कर सकते हैं | माना हमारी नेहा थोड़ी मॉडर्न है पर है तो संस्कारी | उनकी उसे मारने की हिम्मत कैसे हुई...!” नेहा की माँ गुस्से से बोलीं |
पतिदेव ने पत्नी  को समझाते हुए कहा – “कोई बात नहीं नेहा की माँ, तुम भी थोड़ा सब्र से काम लो... आखिरकार बेटी और दामाद का मामला है | तुम जा तो रही हो उसके पास | वहीँ जाकर पहले सारा मामला समझना और फिर उन्हें भी समझाना-बुझाना...सही राह दिखाकर आना | अभी दोनों की नई-नई ग्रहस्थी ही तो है |” 
      माँ जब बेटी के घर पहुंची तब तक सारी कहानी बदल चुकी थी | नव-दम्पति बड़े प्रेम-पूर्वक अपने घर के रंग-रोगन के बारे में बातचीत कर रहे थे | नेहा ने माँ को घर आया देख उनका स्वागत-सत्कार किया | माँ के बार-बार पूछने पर उसने पति के सामने ही बड़े संतुलित लहजे में रात के झगड़े के बारे में माँ को सब सच कह सुनाया | माँ ने भी स्थिति संभली देख बात को और तूल देना ठीक नही समझा और अगले दिन अपने घर लौट जाने का निर्णय ले लिया | 
      जाने से पहले माँ की नज़र सामने वाली दीवार पर पड़ी | उन्होंने उस दीवार पर कुछ दरारें देखीं | उसी वक्त बेटी और दामाद को बड़े प्यार से पास बुलाया और उस दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा - “बेटा, तुम लोगों का घर बहुत ही खूबसूरत है लेकिन इस दीवार पर कुछ दरारें हैं...रंग-रोगन से पहले इन दरारों को भली प्रकार से भरवा देना | अगर ये दरारें तुम लोगों ने सही समय पर नहीं भरवाईं तो यह दीवार कमज़ोर हो जाएगी | और अगर घर की एक दीवार भी कमज़ोर हो जाए तो, वो हलकी-सी ठोकर से भी ढह जाती है...फिर ऐसे घर के अन्दर किसी भी बाहर वाले के झांकते देर नहीं लगती |”   

- रश्मि        

प्रेरक प्रसंग

आत्मसम्मान    
     
       एक कुम्हार मिट्टी से सामान बना रहा था | पास ही अनेक घड़ेदिएमूर्तियांगुल्लकें बनी रखीं थींसभी आपस में बातें कर रहे थे |
       घड़े ने दीयों से कहा– “तुम सभी कितने सुन्दर हो भिन्न-भिन्न आकृतियों के | एक हम हैं... सब के सब मोटे-मोटे | ज़रा-सा जो ढलक जाएँ तो तुरंत टूट जाएँ |”
      पास बैठे दीये घड़े की बात सुन रहे थे | एक दीया बोला– “अरे ! कहाँ घड़े काका, हमारा आकर तो देखो आपके आगे कितना छोटा है | हम तो इतने छोटे हैं कि किसी कोने या सामान के पीछे कब दब जाएँ, टूट जाएँ.... पता भी न चले | हमारी बजाए तो ये मूर्तियाँ कहीं ज्यादा सुन्दर हैं | काश ! हम भी मूर्ति होते |”
      दीये और घड़े की बातचीत सुनकर मूर्तियाँ भी कुछ उदास हो उठीं | एक मूर्ति बोली– “दीये भैया, ये आप क्या कह रहे हैं ! आपको नहीं पता कि हमें इस आकर को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है | अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं | हमें तो गुल्लक बनना पसंद था | काश ! हम गुल्लक होते तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते |”
      गुल्लकें जो कि काफी देर से सबकी बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं | एक गुल्लक विफर पड़ी और बोली– “आप सभी हमारा दर्द नहीं समझ पाएँगे | हम से बड़ा दुर्भाग्यशाली और कोई नहीं होगा | लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु अपना पैसा संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे किन्तु इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी ही निर्ममता से जमीन पर पटक कर तोड़ देते हैं | अब आप ही बताइए क्या आपको कोई ऐसे निर्ममता से तोड़ता है ? आप में से सभी स्वतः ही टूट जाएँ तो और बात है किन्तु कोई निर्दयतापूर्वक तोड़ता नहीं है | इसीलिए मुझे तो अपने अलावा आप में से सभी की ज़िन्दगी पसंद है |”                  
       इधर कुम्हार की चक्की जल्दी-जल्दी अपना काम भी करती जा रही थी और इन सभी की तकलीफें भी सुनती जा रही थी | जब उसका काम समाप्त हो गया तो उसने सभी के साथ प्रेमपूर्वक बातचीत शुरू कर दी |
      उसने घड़े को समझाया– “तुम बहुत ही उपयोगी हो | क्या तुम्हें पता है कि तुम अपने शीतल जल से लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक संग्रह करते हैं |”
      फिर वह दीये से बोली– “तुम आकार में बेशक बहुत छोटे हो लेकिन तुम्हारे भीतर से अनंत प्रकाश फूटता है | तुम मंदिरों में जगह पाते हो.. तो कभी-कभी घरों और देहरियों को जगमगाते हो |”
      अब उस चक्की ने मूर्तियों की तरफ देखते हुए कहा– “तुम्हारी शोभा इसीलिए तो चौगुनी हो जाती है क्योंकि तुम इतनी तकलीफ सहती हो | और जानती हो ! इसीलिए तुम संसार भर के लोगों के घरों, मंदिरों, दफतरों की शोभा बढाती हो |”
      आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा– “तुम सभी बहुत कीमती हो | तुम बच्चों की ख़ुशी हो... तो गरीब का आसरा हो | तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो |”
      इस प्रकार वह चक्की उन माटी की चीजों के साथ-साथ हम मनुष्यों को भी ये सीख दे गई कि हमें अपने गुणों को पहचान कर खुद का सम्मान करना चाहिए | दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए | अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं, हमें स्वयं अपना मोल पहचानना चाहिए |
                                   
! इस प्रसंग से हमें यह सीख मिलती है कि हमें स्वयं अपना अपना महत्त्व पहचानना चाहिए | हमारा आत्मविश्वास ही सब कुछ है |
 
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रविवार, 19 जून 2016

राजेन्द्र यादव जी


मोय लागे कि कोई पगली है जे.....

  मोय लागे कि कोई पगली है जे.....

          
          मित्रों, आज घूमने निकली खुद के साथ..निकली अकेली थी लेकिन जब लौटी, तब कई अनुभव साथ थे | सोचा ...आज उनसे बात करुँगी, जिनसे शायद ही कोई करता हो| अपनी कार एक पार्किंग पर खड़ी की और देखा कि वहां एक बुज़ुर्ग कंपकंपाते हाथों से सड़क पर झाड़ू लगा रहा है| मैंने पास जाकर पूछा-“बाबा, आप इतनी बड़ी उम्र के होकर झाड़ू क्यों मारते हो...घर में कोई और नहीं है?” “है न बिटिया एक जुआरी बेटुवा है....जे मान लेओ कि कोई कमाऊ होतहू तबहूँ तो अपनों पेट तो खुदही पालनो परतो है|” मैं हामी भरकर खिसियानी सी हंसी के साथ आगे चल दी|
            अपने गंतव्य पर पहुँचकर मैंने रिक्शा किया और उससे बातचीत शुरू कर दी-“भैया,कहाँ के हो?” “दूर गाँव के हैं मैडम” “कब से हो यहाँ?” “अरे मैडम, छुटपने में आ गए रहे...बाबू हमका बहुत पीटत रहे, एक संजा खेलन निकले और भज आए दिल्ली(और हँस दिया...आज़ाद हँसी) “यहाँ खुश हो?...मन नहीं करता उन्हें देखने का?” वह मेरे पहले प्रश्न पर खिलखिलाके हंसने वाला था लेकिन दूसरे प्रश्न ने उदास कर दिया उसे|
            तीसरा अनुभव उसने दिया जिसने मुझे चाय और मैगी खिलाई| मैं बड़े इत्मीनान से धीरे-धीरे खा रही थी और आस-पास की सुन्दर प्रकृति को मोबाइल के कैमरे में कैद कर रही थी| वह ऊब कर दुकान के पीछे जाकर बैठ गया....कोई और कस्टमर था नहीं सो उसे ये डर होगा कि कहीं मैं खा-पीके खिसक न जाऊं इसलिए वह बार-बार झाँककर मुझे देखकर तसल्ली कर लेता था और उसकी ये बेचैनी देख मैं मुस्कुरा दी| मैंने उसे बुलाकर पैसे दिए और पूछा कि,”तुम्हे डर लग रहा था कि मैं बिना पैसे दिए न चली जाऊं?” वह मुस्कुरा दिया-“नहीं...नहीं...सब अपने-अपने भाग्य का खाते हैं जी,..हम तो इस दुकान के नौकर हैं...हमारा खाकर कहाँ जाओगी जी ....सब यहीं चुकता करना पड़ता है.......” एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई उसकी आवाज़ में|
           अब मैं एक दफ्तर में थी और चौथा अनुभव दिया एक महिला ने जो वहां के शौचालय की सफाई के लिए नियुक्त थी| वह सफाई करने में व्यस्त थी| मैंने उससे पूछा-“चाय पियोगी?” पहले वह सहम गई...लेकिन फिर न जाने क्या सोचकर राज़ी हो गई| मैंने चाय पीते-पीते उसका दर्द जाना कि सभी उसे अछूत जानकर उससे दूरी बनाए रखते हैं बल्कि वह तो मेरी ही तरह बनिया है| वह बचपन में एक किसान परिवार की बेटी थी लेकिन आज वक्त की मारी यहाँ आ पड़ी है| उससे बात करते-करते मेरी निगाह पास के पेड़ के नीचे बैठे एक भिखारी और भिखारिन(शायद उसकी पत्नी हो या कोई और)पर पड़ी| आँख मिलते ही वो पैसे मांगने लगे| मैंने मना कर दिया कहा-“पैसे एक नहीं दूंगी....चाय पीनी हो तो बोलो” वे राज़ी हो गए| कुछ देर बाद जब मैं वहां से उठकर चल दी तो पीछे से उस भिखारिन की आवाज़ सुनाई दी...वो मेरे लिए कह रही थी कि, “मोये लागे के कोई पगली है जे.....”(वो आवाज़ अब तक मेरे साथ मेरे घर तक चली आई है.....क्यूँ मैं उसे आज पगली लगी...क्या हमें कभी-कभी यूँ ही पागल नहीं बन जाना चाहिए?
         -आज जाना कि पेट पालना बुढ़ापे को भी जिलाए रखता है|
         -आज जाना कि बचपन और यादें कभी पीछा नहीं छोड़तीं|
         -आज जाना कि हम अपने हाथों से कितने अभागों को उनके भाग्य का खिला सकते हैं|
         -आज जाना कि धर्म या कर्म नहीं बल्कि मज़बूरी इंसान से छोटा काम करवाती है|

         -......और अंत में यह जाना कि ये सभी बातें हम सभी जानते हैं, लेकिन जब-जब दोबारा जानने निकलते हैं तो लोग “पागल” समझ बैठते हैं | 

शनिवार, 18 जून 2016

आदरणीय डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम


happy father's day


गुलाबी फ्रॉक
सुरेखा ! यह सब क्या है ?”
यह कुछ राखियाँ हैं, पूजाघर की अधजली बत्तियां हैं और दीपावली के दिए हैं | ये सब पूजा का ही बेकार सामान है |”
“...तो तुमने इन्हें यहाँ मेज़ पर क्यों रखा है ! फेंको कूड़े में |” मैंने आदेश सुनाया |”
नहीं राजीव ! ये सब ऐसे कूड़े में नहीं फेंके जाते, इन्हें गंगा जी में सिराना चाहिए | मैं यह सब एक लिफाफे में डाल देती हूँ, तुम ऑफिस जाते वक्त सिराते हुए निकल जाना |”
और ये गुलाबी फ्रॉक ...इसे भी ......?” मैं बोलते-बोलते चुप हो गया | सुरेख के चेहरे पर भी उदासी थी | मेरी बात सुनकर उसकी आँखों में नमी उतर आई | वह बोली- हाँ यह भी | अब इसको रखकर क्या करेंगे | इसे भी सिरा देना ...अब हमें इसकी ज़रूरत नहीं |” बोलते-बोलते उसकी आँखें पूरी तरह से भर आईं थीं लेकिन वह मेरे सामने रोना नहीं चाहती थी और न ही कोई हमदर्दी पाना चाहती थी इसीलिए कमरे में चली गई |
मैं बीते दिनों की यादों में खो गया | यह फ्रॉक सुरेखा ने खुद अपने हाथों से बनाई थी, अपनी होने वाली संतान के लिए ...अपनी बेटी के लिए | आठ महीने पहले की बात है | जैसे ही सबको पता चला कि सुरेखा माँ बनने वाली है, घर में खुशियाँ छा गईं | माँ बनने की खबर के साथ ही सुरेख भी बदलने लगी थी | अब वह और सुन्दर लगने लगी थी ...लेकिन थोड़ी सुस्त हो गई थी | वह घर भर के काम निपटाकर अपने कमरे में जाती और अपने पेट पर हाथ रखकर अपने होने वाले बच्चे से घंटों बातें किया करती | कितना अनूठा होता है न माँ और बच्चे का रिश्ता ! ...एक ऐसा रिश्ता जो अनदेखी डोर से बंधा होता है | माँ को पता भी नहीं होता कि उसकी कोख में पलने वाली संतान कौन है, कैसी है ...लड़का है या लड़की है ...गोरी है या काली है, लेकिन फिर भी वह उसके साथ तन और मन से बंध जाती है | ऐसा ही कुछ बच्चे के साथ भी होता है | वह तन मन से अपनी माँ पर ही आश्रित रहता है ...दुनिया भर से बेखबर अपनी माँ की कोख में बढ़ता जाता है | माँ खुश तो वह भी खुश ...माँ दुखी तो वह भी दुखी | शायद इसीलिए गर्भवती महिलाओं को खुश और संतुष्ट रहने की सलाह दी जाती है |
मेरी सुरेख भी अब हर वक्त खुश रहने लगी थी | एक दिन मैंने खिड़की से देखा कि वह अपने बिस्तर पर लेटी हुई है अपने पेट पर हाथ रखकर बच्चे से बतिया रही है |
तुम जो भी हो ...लड़का या लड़की ...तुम मेरा और अपने पिता का अस्तित्व हो | तुम हमारा मान-सम्मान हो बेटा | तुम इस घर की खुशियाँ हो | जब तुम इस दुनिया में आ जाओगे तब हम तुम्हें बहुत अच्छी परवरिश देंगे ...तुम्हें अच्छा इंसान बनाएँगे | तुम्हें अपने इस परिवार का नाम रौशन करना है |”
मुझसे नहीं रहा गया और मैं भी कमरे में पहुँच गया | सुरेखा मुझे देखकर सकुचा गई और उठकर बैठ गई | मैंने उसके कंधे को पकड़ा और लिटाते हुए कहा- सुरेखा ! तुम हमारे इस बच्चे को बहुत अच्छे संस्कार देना | यह हमारे सारे अधूरे ख़्वाब पूरे करेगा ...दुनिया में नाम कमाएगा | हम इसे एक बेहतरीन इंसान बनाएँगे सुरेखा |”
उसने भी हामी भरी और मेरी बाँहों में सिमट आई |
फिर अचानक एक दिन मेरी माँ को न जाने क्या हुआ कि उन्होंने सुरेखा के अल्ट्रासाउंड की जिद्द ठान ली | घर में और कोई नहीं चाहता था कि बच्चे के लिंग के बारे में जाना जाए लेकिन माँ की जिद्द के आगे हम सब हार गए और जब रिपोर्ट आई तब एक बार फिर हार माननी पड़ी ...और उस बच्ची को गिरवा दिया गया | सुरेखा रोती रही लेकिन माँ ने अपनी जिद्द के आगे उसकी एक नहीं सुनी ...बल्कि उन्होंने तो उस बेचारी को लड़की की पैदाइश फिर उसकी परवरिश और फिर उसकी शादी तक उठाए जाने वाले तमाम कष्टों को गिना डाला | पहले तो मैंने भी इसका विरोध किया लेकिन फिर आज्ञाकारी बेटे की तरह माँ की हर बात मानने लगा ...मानने लगा कि बेटी की परवरिश बहुत मुश्किल होती है ...बेटियाँ माँ-बाप पर बोझ होतीं हैं ...हमारा समाज बेटियों का भक्षक होता है ...उनके पग-पग पर कांटे बिछे होते हैं | सुरेखा हम सबके आगे रोती रही बिलखती रही ...और एक दिन वह भरी-पूरी अस्पताल गई और शाम को खाली होकर लौट आई | उसे देखकर लगता था कि मानो वह अपने वज़ूद का अबॉर्शन करवाकर आई हो ...अपने शरीर के किसी आवश्यक अंग को कटवा आई हो |
अब वह हर वक्त उदास और थकी-थकी रहने लगी | मैं खुद उसका गुनहगार था इसलिए उसके इस दुःख में चाहकर भी साथ नहीं दे पा रहा था | माँ कहतीं कि कोई चिंता की बात नहीं है, थोड़े ही दिनों में ठीक हो जाएगी | हम सबने भी माँ की बात मान ली और उन थोड़े दिनों के गुज़रने का इंतज़ार करने लगे ...और वाकई वे थोड़े दिन गुज़र गए | सुरेखा फिर से पहले की तरह घर के सभी काम करने लगी | ...लेकिन उसके भीतर फैले खालीपन को मैंने देखा था | मैने देखा था कि कैसे उसके भीतर का वो खालीपन रात को उसकी आँखों में उतर आता और वह चुपचाप मुझसे नज़रें चुराकर इस गुलाबी फ्रॉक को उठा लेती ...अपने सीने से लगाती ...पुचकाती ...और बिलख-बिलख कर रोती ...फिर न जाने कब सो जाती | अगली सुबह वह नॉर्मल दिखती, अपने काम निपटाती नज़र आती ...यंत्रवत | मैं भी अपराध-बोध से घिरता जा रहा था क्योंकि मैं ही उसका गुनहगार था | अब मुझे भी लगने लगा था कि यदि मैं अड़ जाता तो यह अबॉर्शन न होता ...आज सुरेखा की गोद भरी होती ...उसकी गोद में एक नन्ही-सी परी खेल रही होती ...वह मुझे पापापुकार रही होती ...लेकिन अब तो जो होना था वो हो चुका था |
मैं वह सारा सामान लेकर दफ्तर के लिए निकल पड़ा और रास्ते में मिलने वाली गंगा जी के पुल के पास अपनी मोटर-साइकिल रोक दी | उस पैकेट को हाथ में लिया और थोड़ा नीचे की ओर उतरकर गंगा के किनारे पहुँच गया | मैंने लिफाफे की गांठ खोली और सारा सामान विसर्जित कर दिया | कुछ देर तक मौन खड़े रहकर गंगा की लहरों को देखता रहा ...बहते कलावे, धागे, फुल-पत्ते, झाड-झंखाड़ को देखता रहा और देखता रहा वह गुलाबी फ्रॉक, जो गंगा की लहरों में भी अठखेलियाँ कर रही थी | फिर पलट कर चल दिया | मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे अपने गुनाहों का विसर्जन करके आ रहा हूँ या अपनी कायरता को पानी में बहाकर आ रहा हूँ | सहसा मेरे पैर कहीं उलझ गए और मैं वहीँ ठिठक गया | नीचे पैरों की ओर देखा तो पाया कि वही गुलाबी फ्रॉक मेरे पैरों में उलझी हुई है |
यह तो वही गुलाबी फ्रॉक है ! इसे तो मैं गंगाजी में बहा आया था ...यह यहाँ कैसे ! ज़रूर उड़कर आ गई होगी |” मैं अपना उलझा पैर निकालने लगा, तभी किसी बच्ची के खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई दी | मैं भयभीत हो गया ! घूम-घूमकर इधर-उधर देखने लगा | वही खिलखिलाहट फिर गूंज उठी | मैंने ध्यान दिया कि ये आवाज़ तो उस गुलाबी फ्रॉक में से आ रही है जो इस वक्त मेरे पैरों से लिपटी हुई है | मैंने झुककर वह फ्रॉक अपने हाथों में उठा ली | वह फिर खिलखिला दी |
तुम कौन हो ?”
मैं आपकी और मम्मा की बेटी हूँ, लेकिन आप लोगों ने तो मुझे मार डाला |”
मैं अपराध-बोध से भर उठा ...बोला कुछ नहीं बस चुपचाप उस फ्रॉक पर प्यार से अपना हाथ फिराने लगा
आपको पता है ! मैं आप लोगों से कितना प्यार करने लगी थी | मैं मम्मा के पेट में बैठी-बैठी आप सभी से बातें भी करती थी | मुझे मालूम है कि दादी को छोड़कर घर के बाकी सब लोग भी मुझे प्यार करते थे | पापा ! अगर आप मुझे दुनिया में ले आते तो मैं दादी का दिल भी जीत लेती, सच्ची |”
उसके मुँह से पापासुनकर मैं खुद को संभाल नहीं पाया और रो पड़ा | वह फूल-सी कोमल बच्ची मेरे गुनाह पर भी मुझसे नाराज़ नहीं थी ...मुझसे बातिया रही थी ...पापा कह रही थी |
मुझे माफ़ कर दे मेरी लाडो ...मैं तेरा गुनहगार हूँ |”
मुझे माँ के पास ले चलिए | मुझे यहाँ छोड़कर मत जाइये | आप लोगों के बिना मुझे डर लगता है | ...और वैसे भी माँ मुझसे बहुत प्यार करतीं हैं | वे मेरे बगैर कैसे रह पाएँगीं | हर वक्त मुझे ही याद करके रोतीं रहेंगीं | वे आधी-आधी रातों में उठकर मुझसे बातें करतीं हैं ...मुझसे लाड़ लड़ातीं हैं | मैं उनके बिना फिर से मर जाऊँगी पापा |”
मैंने उस गुलाबी फ्रॉक को चूमा ...फिर अपने सीने से लगाया और साथ लेकर चल दिया | उस दिन मैं दफ्तर नहीं गया | न जाने क्यों दिल ही नहीं किया | वापिस घर आ गया | सबने पूछा कि क्या हुआ तो कह दिया कि तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही ...बस |
अपने कमरे में पहुँचकर मैने अपना बैग खोला और वह गुलाबी फ्रॉक बाहर निकाल ली | उसे फिर से सीने से लगा लिया | वह मुस्कुरा रही थी | तभी सुरेखा मेरे लिए चाय लेकर कमरे में दाखिल हुई | मेरे हाथों में वही गुलाबी फ्रॉक देखकर कुछ पूछने को हुई लेकिन मैने उसके होठों पर अपनी हथेली रख दी |
सॉरी सुरेखा ...मैं तुम दोनों का गुनहगार हूँ |”
वह रो दी और मेरी ही बाँहों में सिमट आई | हम दो जिस्म एक हो गए ...एकदम एक ...एक दूजे में समा गए |
...वह फ्रॉक खिलखिला उठी |
आज इस बात को एक महीना पूरा हो चुका है | सुरेखा पर फिर से सुस्ती छाने लगी है | उसे फिर खट्टा खाने का जी करने लगा है ...और माँ को अल्ट्रासाउंड करवाने का | ...लेकिन इस बार मैं पापा होने का फ़र्ज़ निभा रहा हूँ | वह गुलाबी फ्रॉक हर वक्त मेरे साथ है ...हँसती हुई ...खिखिलाती हुई ...मेरी बेटी बनकर | इस बार मैं उसे तार-तार नहीं होने दूंगा



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