दरारें
जब से बेटी का फ़ोन आया है, वे बड़ी परेशान हैं |
“ये तो हद्द ही हो गई...विनोद जी ऐसा कैसे कर सकते हैं | माना हमारी नेहा थोड़ी मॉडर्न है पर है तो संस्कारी | उनकी उसे मारने की हिम्मत कैसे हुई...!” नेहा की माँ गुस्से से बोलीं |
पतिदेव ने पत्नी को समझाते हुए कहा – “कोई बात नहीं नेहा की माँ, तुम भी थोड़ा सब्र से काम लो... आखिरकार बेटी और दामाद का मामला है | तुम जा तो रही हो उसके पास | वहीँ जाकर पहले सारा मामला समझना और फिर उन्हें भी समझाना-बुझाना...सही राह दिखाकर आना | अभी दोनों की नई-नई ग्रहस्थी ही तो है |”
माँ जब बेटी के घर पहुंची तब तक सारी कहानी बदल चुकी थी | नव-दम्पति बड़े प्रेम-पूर्वक अपने घर के रंग-रोगन के बारे में बातचीत कर रहे थे | नेहा ने माँ को घर आया देख उनका स्वागत-सत्कार किया | माँ के बार-बार पूछने पर उसने पति के सामने ही बड़े संतुलित लहजे में रात के झगड़े के बारे में माँ को सब सच कह सुनाया | माँ ने भी स्थिति संभली देख बात को और तूल देना ठीक नही समझा और अगले दिन अपने घर लौट जाने का निर्णय ले लिया |
जाने से पहले माँ की नज़र सामने वाली दीवार पर पड़ी | उन्होंने उस दीवार पर कुछ दरारें देखीं | उसी वक्त बेटी और दामाद को बड़े प्यार से पास बुलाया और उस दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा - “बेटा, तुम लोगों का घर बहुत ही खूबसूरत है लेकिन इस दीवार पर कुछ दरारें हैं...रंग-रोगन से पहले इन दरारों को भली प्रकार से भरवा देना | अगर ये दरारें तुम लोगों ने सही समय पर नहीं भरवाईं तो यह दीवार कमज़ोर हो जाएगी | और अगर घर की एक दीवार भी कमज़ोर हो जाए तो, वो हलकी-सी ठोकर से भी ढह जाती है...फिर ऐसे घर के अन्दर किसी भी बाहर वाले के झांकते देर नहीं लगती |”
- रश्मि
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