शनिवार, 18 जून 2016

स्टेटमेंट

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घणी फुतरी टोकरीं बनावे है तू ...थारे हाथों में तो हुनर है छोरी |” कजरी ने अपनी पोती के हाथ की बनी एक टोकरी को उठाया और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली | लेकिन फुलवा ने अपनी दादी की बात का कोई जवाब नहीं दिया | पहले की तरह ही तीलियों में उँगलियाँ फँसाए उन्हें आपस में गूंथती रही |
दस साल की बच्ची फुलवा रंग-बिरंगी तीलियों से जितनी सुंदर-सुंदर टोकरियाँ बनाती है उतनी ही सुंदर और रंगीन उसकी हँसी भी है लेकिन इन दिनों उसकी हँसी इन तीलियों-सी बिखर कर रह गई है | आजकल वह न तो हँसती है और न ही किसी की बात का कोई जवाब देती है ...बस इन तीलियों में ही अपना सारा का सारा दर्द बंटती रहती है, पिरोती रहती है | अब तो ये हाल है कि तीलियाँ बंटते-बंटते अगर उसकी उँगली के पोर छिल भी जाएँ तो उसे दर्द का एहसास नहीं होता क्योंकि यह मासूम अपनी कच्ची उम्र में ही तन और मन के रेशे-रेशे की छिलन झेल चुकी है |  
कजरी वहीं बरामदे के बीचो-बीच पड़ी खटिया पर जाकर बैठ गई | वह बुझे मन से अपनी पोती को निहारने लगी और सोचने लगी - म्हारी फुलवा, इसके चेहरे पर हर वक्त एक चमक रहती थी ...इब कैसी मुरझा गई है म्हारी छोरी | कल-कल बहते पाणी-सी ये सीधी-सरल बच्ची बर्फ जैसी सर्द और सख्त होकर रह गई है |’
कजरी ने एक बार फिर हिम्मत बटोरी | अपने घुटनों पर हाथ रखते हुए उठी और फुलवा के पास बैठते हुए प्यार से बोली- चल छोरी ! मंदिर चल म्हारे साथ | थारा जी बहल जावेगा |”
मन्ने नइ जाना |”
कजरी जानती थी कि उसकी पोती जिस हादसे से गुज़री है, उसके ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भर पाएँगे | बहुत बरस पहले वह खुद भी तो इस ज़ख्म से अपने तन-मन को छलनी कर चुकी थी इसलिए अपनी पोती के दर्द को बखूबी समझ सकती थी | वह तो फिर भी सोलह-सत्रह बरस की थी लेकिन उसकी फुलवा तो अभी दस ही बरस की है ...और इतना बड़ा वज्र सह गई |
कजरी को अपना लड़कपन याद हो आया | उसे बचपने में ही ब्याह दिया गया था | अभी वह ठीक से बोलना ही नही सीखी थी, ऐसे में उस रिश्ते को क्या नाम देती, जिसमे वो जबरन बांध दी गई थी | मायके वालों ने उसे ब्याह तो दिया लेकिन अभी गौना नहीं किया था | शायद उन्हें भी उसकी कच्ची उम्र का अहसास था | फिर जब वह चौदह बरस की हुई तब गौना होकर अपने सासरे लौटी थी | उस वक्त वह यह कहाँ जानती थी कि जिस गाँव की बहू बनकर आई है, एक दिन उसी गाँव के मुखिया की बदनियती का शिकार बन जाएगी |
उसकी मुँह दिखाई के दिन की बात है, गाँव में बड़ा बुलावा लगा था | पूरे गाँव की लुगाइयाँ उसके आँगन में जुड़ आईं थीं | सब की सब उसके रूप की तारीफ़ करती नहीं थक रहीं थीं और उसकी सास भी उस पर वारी-वारी जा रही थी | सास ने सबके सामने उससे कहा – “बीनणी ! पूरे गाँव ने अपना ही घर मानिजो | यहाँ सब तेरे अपने ही रिश्ते-नातेदार हैं | कोई तेरी माँ समान है, तो कोई तेरी भाभी समान ...कोई तेरी बहन सरीखी है, तो कोई तेरी सहेली-सी | तू सबने अपना पिता और भाई ही मानिजो |”
उसने भी हामी में अपना सिर हिलाया था ...और सच भी तो था, ऐसा ही हुआ भी ...उसे पूरे गाँव का अपनापन मिला, खूब प्यार मिला ; इतना प्यार कि अपने पीहर की भी सुध बिसर गई | जो जो रिश्ते वहाँ पीहर में बिछुड़ गए थे, वो सब यहाँ सासरे में मिल गए | इन्हीं सब अच्छे लोगों के बीच एक इंसान, उसकी नियत न जाने कब बदल गई ...कि राम जाने वह पहले से ही ऐसा ही था बदनीयत, पता ही न चला | वह इंसान इसी गाँव का मुखिया था | कजरी उसके आगे लाख गिड़गिड़ाई, हाथ जोड़ के मिन्नतें कीं, अपने पेट से होने की दुहाई दी, लानतें भीं दीं, तड़पी, मचली और फिर सिसकती ही रह गई | वह अपने बलात्कार के दर्द को जिस्म में लिए आत्मा के भीतर दबा गई | मुखिया की धमकी और लोकलाज के भय से किसी के भी आगे उसने अपना मुँह नहीं खोला और साल दर साल बीतते गए | वह निगोड़ा मुखिया भी दूसरे ही बरस बीमारी के चलते राम जी को प्यारा हो गया | कजरी बड़े जतन करके उस काली याद को किसी अँधेरे कुएँ में दफना आई और अपनी आगे की ज़िन्दगी सँवारने लगी |

धीरे-धीरे समय बीता | सात बच्चे जने... फिर अपने बच्चों में ही रम गई | अपनी घर-गृहस्थी और अपने बच्चों को ही उसने अपनी ज़िन्दगी बना लिया | माँ बनी... फिर दादी बनी | अब जब वही सब उसकी पोती के साथ दोहराया गया तो सालों बाद दर्द की सारी परतें फिर उघड़ गईं, ज़खम फिर से हरहरा उठे | उसी मुखिया के सबसे छोटे और बिगड़ैल पूत ने उसकी फूल-सी पोती को मसल डाला था |

आगे की कहानी इस लिंक द्वारा पढ़िए -  :. http://www.srijangatha.com/Kahani7Jan2015

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