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“घणी फुतरी टोकरीं बनावे है तू ...थारे हाथों में तो हुनर है छोरी |”
कजरी ने अपनी पोती के हाथ की बनी एक टोकरी को उठाया और प्यार से
उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली | लेकिन फुलवा ने अपनी दादी की
बात का कोई जवाब नहीं दिया | पहले की तरह ही तीलियों में उँगलियाँ फँसाए उन्हें
आपस में गूंथती रही |
दस साल
की बच्ची फुलवा रंग-बिरंगी तीलियों से जितनी सुंदर-सुंदर टोकरियाँ बनाती है उतनी
ही सुंदर और रंगीन उसकी हँसी भी है लेकिन इन दिनों उसकी हँसी इन तीलियों-सी बिखर
कर रह गई है | आजकल वह न तो हँसती है और न ही किसी की बात
का कोई जवाब देती है ...बस इन तीलियों में ही अपना सारा का सारा दर्द बंटती रहती
है, पिरोती रहती है | अब तो ये हाल है
कि तीलियाँ बंटते-बंटते अगर उसकी उँगली के पोर छिल भी जाएँ तो उसे दर्द का एहसास
नहीं होता क्योंकि यह मासूम अपनी कच्ची उम्र में ही तन और मन के रेशे-रेशे की छिलन
झेल चुकी है |
कजरी वहीं
बरामदे के बीचो-बीच पड़ी खटिया पर जाकर बैठ गई | वह बुझे मन से अपनी पोती को
निहारने लगी और सोचने लगी - ‘म्हारी फुलवा, इसके चेहरे पर हर वक्त एक चमक रहती थी ...इब कैसी मुरझा गई है म्हारी छोरी
| कल-कल बहते पाणी-सी ये सीधी-सरल बच्ची बर्फ जैसी सर्द और
सख्त होकर रह गई है |’
कजरी
ने एक बार फिर हिम्मत बटोरी | अपने घुटनों पर हाथ रखते हुए उठी और फुलवा के पास
बैठते हुए प्यार से बोली- “चल छोरी ! मंदिर चल म्हारे साथ | थारा जी बहल जावेगा |”
“मन्ने नइ जाना |”
कजरी
जानती थी कि उसकी पोती जिस हादसे से गुज़री है, उसके
ज़ख्म इतनी आसानी से नहीं भर पाएँगे | बहुत बरस पहले वह खुद
भी तो इस ज़ख्म से अपने तन-मन को छलनी कर चुकी थी इसलिए अपनी पोती के दर्द को बखूबी
समझ सकती थी | वह तो फिर भी सोलह-सत्रह बरस की थी लेकिन उसकी
फुलवा तो अभी दस ही बरस की है ...और इतना बड़ा वज्र सह गई |
कजरी
को अपना लड़कपन याद हो आया | उसे बचपने में ही ब्याह दिया गया था | अभी वह ठीक से बोलना ही नही सीखी थी, ऐसे में उस रिश्ते को क्या नाम देती,
जिसमे वो जबरन बांध दी गई थी | मायके वालों ने उसे ब्याह तो
दिया लेकिन अभी गौना नहीं किया था | शायद उन्हें भी उसकी
कच्ची उम्र का अहसास था | फिर जब वह चौदह बरस की हुई तब गौना
होकर अपने सासरे लौटी थी | उस वक्त वह यह कहाँ जानती थी कि
जिस गाँव की बहू बनकर आई है, एक दिन उसी गाँव के मुखिया की
बदनियती का शिकार बन जाएगी |
उसकी
मुँह दिखाई के दिन की बात है, गाँव में बड़ा बुलावा
लगा था | पूरे गाँव की लुगाइयाँ उसके आँगन में जुड़ आईं थीं |
सब की सब उसके रूप की तारीफ़ करती नहीं थक रहीं थीं और उसकी सास भी
उस पर वारी-वारी जा रही थी | सास ने सबके सामने उससे कहा –
“बीनणी ! पूरे गाँव ने अपना ही घर मानिजो | यहाँ
सब तेरे अपने ही रिश्ते-नातेदार हैं | कोई तेरी माँ समान है,
तो कोई तेरी भाभी समान ...कोई तेरी बहन सरीखी है, तो कोई तेरी सहेली-सी | तू सबने अपना पिता और भाई ही मानिजो |”
उसने भी
हामी में अपना सिर हिलाया था ...और सच भी तो था, ऐसा ही
हुआ भी ...उसे पूरे गाँव का अपनापन मिला, खूब प्यार मिला ; इतना
प्यार कि अपने पीहर की भी सुध बिसर गई | जो जो रिश्ते वहाँ
पीहर में बिछुड़ गए थे, वो सब यहाँ सासरे में मिल गए |
इन्हीं सब अच्छे लोगों के बीच एक इंसान, उसकी
नियत न जाने कब बदल गई ...कि राम जाने वह पहले से ही ऐसा ही था बदनीयत, पता ही न चला | वह इंसान इसी गाँव का मुखिया था |
कजरी उसके आगे लाख गिड़गिड़ाई, हाथ जोड़ के मिन्नतें कीं, अपने पेट से
होने की दुहाई दी, लानतें भीं दीं, तड़पी, मचली और फिर सिसकती ही रह गई | वह अपने बलात्कार के दर्द को जिस्म में लिए आत्मा के भीतर दबा गई |
मुखिया की धमकी और लोकलाज के भय से किसी के भी आगे उसने अपना मुँह
नहीं खोला और साल दर साल बीतते गए | वह निगोड़ा मुखिया भी
दूसरे ही बरस बीमारी के चलते राम जी को प्यारा हो गया | कजरी
बड़े जतन करके उस काली याद को किसी अँधेरे कुएँ में दफना आई और अपनी आगे की ज़िन्दगी
सँवारने लगी |
धीरे-धीरे
समय बीता | सात बच्चे जने... फिर अपने बच्चों में ही रम गई | अपनी घर-गृहस्थी और अपने बच्चों को ही उसने अपनी ज़िन्दगी बना लिया |
माँ बनी... फिर दादी बनी | अब जब वही सब उसकी
पोती के साथ दोहराया गया तो सालों बाद दर्द की सारी परतें फिर उघड़ गईं, ज़खम फिर से हरहरा उठे | उसी मुखिया के सबसे छोटे और बिगड़ैल
पूत ने उसकी फूल-सी पोती को मसल डाला था |
आगे की कहानी इस लिंक द्वारा पढ़िए - :. http://www.srijangatha.com/Kahani7Jan2015
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