सोमवार, 23 दिसंबर 2013

मोय लागे कि कोई पगली है जे.....

                    मोय लागे कि कोई पगली है जे.....
          मित्रों, आज घूमने निकली खुद के साथ..निकली अकेली थी लेकिन जब लौटी, तब कई अनुभव साथ थे | सोचा ...आज उनसे बात करुँगी, जिनसे शायद ही कोई करता हो| अपनी कार एक पार्किंग पर खड़ी की और देखा कि वहां एक बुज़ुर्ग कंपकंपाते हाथों से सड़क पर झाड़ू लगा रहा है| मैंने पास जाकर पूछा-“बाबा, आप इतनी बड़ी उम्र के होकर झाड़ू क्यों मारते हो...घर में कोई और नहीं है?” “है न बिटिया एक जुआरी बेटुवा है....जे मान लेओ कि कोई कमाऊ होतहू तबहूँ तो अपनों पेट तो खुदही पालनो परतो है|” मैं हामी भरकर खिसियानी सी हंसी के साथ आगे चल दी|
            अपने गंतव्य पर पहुँचकर मैंने रिक्शा किया और उससे बातचीत शुरू कर दी-“भैया,कहाँ के हो?” “दूर गाँव के हैं मैडम” “कब से हो यहाँ?” “अरे मैडम, छुटपने में आ गए रहे...बाबू हमका बहुत पीटत रहे, एक संजा खेलन निकले और भज आए दिल्ली(और हँस दिया...आज़ाद हँसी) “यहाँ खुश हो?...मन नहीं करता उन्हें देखने का?” वह मेरे पहले प्रश्न पर खिलखिलाके हंसने वाला था लेकिन दूसरे प्रश्न ने उदास कर दिया उसे|
            तीसरा अनुभव उसने दिया जिसने मुझे चाय और मैगी खिलाई| मैं बड़े इत्मीनान से धीरे-धीरे खा रही थी और आस-पास की सुन्दर प्रकृति को मोबाइल के कैमरे में कैद कर रही थी| वह ऊब कर दुकान के पीछे जाकर बैठ गया....कोई और कस्टमर था नहीं सो उसे ये डर होगा कि कहीं मैं खा-पीके खिसक न जाऊं इसलिए वह बार-बार झाँककर मुझे देखकर तसल्ली कर लेता था और उसकी ये बेचैनी देख मैं मुस्कुरा दी| मैंने उसे बुलाकर पैसे दिए और पूछा कि,”तुम्हे डर लग रहा था कि मैं बिना पैसे दिए न चली जाऊं?” वह मुस्कुरा दिया-“नहीं...नहीं...सब अपने-अपने भाग्य का खाते हैं जी,..हम तो इस दुकान के नौकर हैं...हमारा खाकर कहाँ जाओगी जी ....सब यहीं चुकता करना पड़ता है.......” एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई उसकी आवाज़ में|
           अब मैं एक दफ्तर में थी और चौथा अनुभव दिया एक महिला ने जो वहां के शौचालय की सफाई के लिए नियुक्त थी| वह सफाई करने में व्यस्त थी| मैंने उससे पूछा-“चाय पियोगी?” पहले वह सहम गई...लेकिन फिर न जाने क्या सोचकर राज़ी हो गई| मैंने चाय पीते-पीते उसका दर्द जाना कि सभी उसे अछूत जानकर उससे दूरी बनाए रखते हैं बल्कि वह तो मेरी ही तरह बनिया है| वह बचपन में एक किसान परिवार की बेटी थी लेकिन आज वक्त की मारी यहाँ आ पड़ी है| उससे बात करते-करते मेरी निगाह पास के पेड़ के नीचे बैठे एक भिखारी और भिखारिन(शायद उसकी पत्नी हो या कोई और)पर पड़ी| आँख मिलते ही वो पैसे मांगने लगे| मैंने मना कर दिया कहा-“पैसे एक नहीं दूंगी....चाय पीनी हो तो बोलो” वे राज़ी हो गए| कुछ देर बाद जब मैं वहां से उठकर चल दी तो पीछे से उस भिखारिन की आवाज़ सुनाई दी...वो मेरे लिए कह रही थी कि, “मोये लागे के कोई पगली है जे.....”(वो आवाज़ अब तक मेरे साथ मेरे घर तक चली आई है.....क्यूँ मैं उसे आज पगली लगी...क्या हमें कभी-कभी यूँ ही पागल नहीं बन जाना चाहिए?
         -आज जाना कि पेट पालना बुढ़ापे को भी जिलाए रखता है|
         -आज जाना कि बचपन और यादें कभी पीछा नहीं छोड़तीं|
         -आज जाना कि हम अपने हाथों से कितने अभागों को उनके भाग्य का खिला सकते हैं|
         -आज जाना कि धर्म या कर्म नहीं बल्कि मज़बूरी इंसान से छोटा काम करवाती है|

         -......और अंत में यह जाना कि ये सभी बातें हम सभी जानते हैं, लेकिन जब-जब दोबारा जानने निकलते हैं तो लोग “पागल” समझ बैठते हैं | 

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

विवशता

विवशता

विवशता ....
किसे कहा जाए 
कर्महीनता को
या
कर्म-प्रवृत्ति होने पर भी
घिर आई विषम विडंबना को ।
कर्महीनता विवशता नहीं 
निष्क्रियता है ।
विवशता है
सामर्थ्यवान की कर्महीनता ।
रुदन ..नहीं विवशता
किसी के अश्रुओं से
अस्पृश्य रहना विवशता है ।
विवशता है
निकट से ताज को देखना
और स्व-अतित्व
जकड़ा हो जंजीरों में ।
--------------------------------------------

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

जिन्दगी ....तू इतनी पैनी क्यूँ है

जिन्दगी
तू इतनी पैनी क्यूँ है
इतनी नुकीली
कि
दिल ही चिर जाए
चीरना ही था
तो
घुटन चीर देती
रुदन चीर देती
तपन चीर देती
जिन्दगी तू इतनी पैनी क्यूँ है
इतनी तीखी
कि
हौसला ही चिर जाए (रश्मि)

हमेशा हमेशा के लिए ....

बड़ा भयावह है
इन अंधेरों और उजालों का चक्कर
मूँद लेती हूँ पलकें
तो
अंधेरा टीसने लगता है
आँख खोल लूँ जो जरा
तो
 उजाला भी चुभने लगता है
दोनों ही
 गहराते जा रहे हैं
मेरी रूह में
और
चिपट से गए हैं
मेरे वजूद से
काश ...!
नोंच कर फेंक सकती इन्हें
 या ...
रौंद कर मिटा ही देती
 फिर न अँधेरा खौफ देता
न उजाला डरा पाता
उतर जाती किसी शून्य में
गहरे .....खूब गहरे
गुम-सी हो जाती
उसी शून्य में
हमेशा हमेशा के लिए .....(रश्मि)


अपाहिज से सवाल

  * अपाहिज से सवाल *

मेरे जिन सवालों के जवाब
तुमने नहीं दिए
वे अपाहिज बनकर
घूम रहे हैं
...भटक रहे हैं
दर-ब-दर
बेसहारा
और तलाश रहे हैं
ऊसर जमीं
जहाँ मुँह छुपा लें अपना
और दफन हो जाएँ
सदा सदा के लिए ......(रश्मि) 

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

हमेशा के लिए

                              हमेशा के लिए

           
             इंसान दौड़ रहा है, बेतहाशा दौड़ रहा है...भाग रहा...कोई ज्ञान के पीछे भाग रहा है तो कोई प्यार के पीछे भाग रहा है...कोई पद के पीछे तो कोई मान-सम्मान के पीछे भाग रहा है...जितना ज्यादा रूतबा; उतना ही और मांग रहा है....जितना ज्यादा ज्ञान; उतना ही और खोज रहा है....जितना बड़ा धनवान;उतना ही ज्यादा माँग रहा है |......क्या ये इंसान कभी थकता नहीं !! कभी तो थकता होगा ?

     ....हाँ ! थकता है न ...लेकिन तब तक, बैठने का सुस्ताने का वक्त ही कहाँ बचता है .....और एक दिन वह लड़खड़ाकर गिर जाता है...लेट जाता है...हमेशा के लिए |
                                       _____

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

कमाल है न बरसात

कमाल है न बरसात 

बरसात कहाँ-कहाँ बरसती है...
कभी-कभी गरीब की छत से बरसती है तो कभी-कभी अमीर की तिजोरी में बरसती है |
कभी-कभी बादलों से बरसती है तो कभी-कभी माँ की आँखों से बरस जाती है |
कभी-कभी प्यार भरी नज़रों से बरसती है तो कभी-कभी नफरत की बारूदों से बरसती है |
कभी-कभी इंसानियत की एक आह! से बरसती है तो कभी-कभी धर्म के चौराहों पर बरसती है |
कभी-कभी बुज़ुर्ग के टूटे छातों पर बरसती है तो कभी-कभी युवाओं के अरमानों पर बरसती है |
.........कमाल है न बरसात.....सैकड़ों बूंदों-सी ......अलग-अलग रूपों में बरसती है |

सोमवार, 9 सितंबर 2013

सलाह

                                   सलाह    
         
           मोबाइल की घंटी बजते ही उन्होंने अपना चश्मा नाक़ पर चढ़ा कर पढ़ना चाहा लेकिन अब तो आँखें भी इतनी कमज़ोर हो गईं हैं कि वक्त-बेवक्त साथ ही नहीं देतीं |
        “पता नहीं किसका फ़ोन है....उठा ही लेती हूँ, वर्ना नाम पढ़ने के चक्कर में रही तो फ़ोन कट ही जाएगा |”
        फोन उनकी बहन के बेटे का था | कह रहा था कि, “मौसी जी, आपसे कुछ सलाह करनी है | कुछ उलझन आ गई है और आपकी मदद चाहता हूँ |”
        भांजे से घर चले आने का कहकर उन्होंने फ़ोन काट दिया और सोच में डूब गईं | खुद से ही बतियाने लगीं - कैसी विडंबना है यह...अपने तीस साल के टीचिंग पीरियड में मैंने हजारों बच्चों की काउंसलिंग की....आज भी आस-पड़ोस, मित्र, रिश्तेदार सभी मुझसे सलाह मांगते हैं | लेकिन इसी सलाहने मेरे अपने ही बेटे को मुझसे दूर कर दिया | मैं सभी की उलझनें दूर करती रही और अपने ही रिश्तों की उलझने न सुलझा सकी | मेरा अपना बेटा सिर्फ इसीलिए मेरे पास नहीं रहना चाहता क्योंकि उसे मेरी सलाह..........|”

बुधवार, 4 सितंबर 2013

फेसबुक

                                                                        फेसबुक 
        
         “सुनिए ! बाहर आइये, आपके बचपन के मित्र अशोक जी आए हैं |पत्नी ने ड्राइंग रूम से पति को को आवाज़ लगाई |
         “हाँ ! हाँ ! उसे बैठाओ, मैं अभी कंप्यूटर बंद करके आया |” भीतर वाले कमरे से पतिदेव ने जवाब दिया |
         पत्नी ने आगंतुक को शिष्टाचार पूर्वक बैठाया और उन्हें अकेलापन न महसूस हो, ऐसा सोचकर उन्हीं के सामने बैठ गईं और उनके परिवार इत्यादि के कुशल-क्षेम पूछने लगीं |
         जब काफी देर तक पतिदेव बाहर नहीं आए तो मित्र महोदय उनकी पत्नी से विदा लेकर चले गए |

         भीतर कमरे में जाकर पत्नी ने देखा तो पाया कि 'वे' तो अब तक अपने फेसबुक-मित्रों के साथ चेटिंग में व्यस्त हैं जबकि बचपन का मित्र इंतज़ार करते-करते जा चुका था |

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

कपड़े

                                   कपड़े 
      
            भोर होने में थोड़ा ही समय बाकी है | आज जन्माष्टमी है इसीलिए नौ बरस की मुनिया शाम से ही राधा बनाकर मंदिर के सामने वाले चौक पर बैठा दी गई थी | मुनिया की उम्र अमीरी-गरीबी का भेद तो समझने लगी थी लेकिन दुनियादारी से अभी अनजान थी | जिसके घर पर उसकी माँ रोज़ बर्तन घिसती है, उसी हलवाई का बेटा रघु, कृष्ण बनकर उसकी बगल में बैठा था | जन्माष्टमी होने के कारण मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी हुई थी | लोग-बाग़ भगवान की मूर्ति के आगे दंडवत करते और फिर राधा-कृष्ण बने दोनों बच्चों के भी पैर छू रहे थे | 
     “रात के तीन बज गए हैं, अब कहीं जाकर भक्तों का ताँता ख़त्म होने आया है| पुजारी जी खुद से बुदबुदाए फिर दोनों बच्चों की तरफ़ देखकर तेज़ आवाज़ में बोले, चलो-चलो जाओ, अपने-अपने कपड़े बदल लो और ठाकुर जी के वस्त्र पुजारिन को धोने के लिए दे दो |" 
कपड़े बदल कर आई मुनिया ने पुजारी जी के आगे हाथ फैलाते हुए कहा, पुजारी जी, थोड़ा-सा खाना दे दो न, बहुत भूख लगी है|
    “चल भाग यहाँ से, ऐसा क्या किया है तूने जो तुझे खाना दूँ | बैठी ही तो रही है, बड़ा कोई पहाड़ तोड़ा है | पुजारी झिडकते हुए सारा चढ़ावा और प्रसाद मंदिर के भीतर ले गए | 
     मुनिया खड़ी-खड़ी अपने कपड़ों को देखती रही | कपड़े बदलते ही वह भी बदल दी गई थी |

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

दरारें

                                                                        दरारें 
          
                जब से बेटी का फ़ोन आया है, वे बड़ी परेशान हैं |  
     “ये तो हद्द ही हो गई...विनोद जी ऐसा कैसे कर सकते हैं | माना हमारी नेहा थोड़ी मॉडर्न है पर है तो संस्कारी.....उनकी उसे मारने की हिम्मत कैसे हुई....!”
पतिदेव ने पत्नी  को समझाते हुए कहा – “कोई बात नहीं नेहा की माँ, तुम भी थोड़ा सब्र से काम लो.... आखिरकार बेटी और दामाद का मामला है | तुम जा तो रही हो उसके पास....वहीँ जाकर पहले सारा मामला समझना और फिर उन्हें भी समझाना-बुझाना...सही राह दिखाकर आना | अभी दोनों की नई-नई ग्रहस्थी है |” 
      माँ जब बेटी के घर पहुंची तब तक सारी कहानी बदल चुकी थी | नव-दम्पति बड़े प्रेम-पूर्वक अपने घर के रंग-रोगन के बारे में बातचीत कर रहे थे | नेहा ने माँ को घर आया देख उनका स्वागत-सत्कार किया | माँ के बार-बार पूछने पर उसने पति के सामने ही बड़े ही संतुलित लहजे में रात के झगड़े के बारे में माँ को सब सच कह सुनाया | माँ ने भी स्थिति संभली देख बात को और तूल देना ठीक न समझा और शाम को ही अपने घर लौट जाना उचित समझा | 
      जाने से पहले माँ की नज़र सामने वाली दीवार पर पड़ी | उन्होंने उस दीवार पर कुछ दरारें देखीं | उसी वक्त उन्होंने बेटी और दामाद को बड़े प्यार से पास बुलाया और उस दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा कि - “बेटा, तुम लोगों का घर बहुत ही खूबसूरत है लेकिन इस दीवार पर कुछ दरारें हैं.....रंग-रोगन से पहले इन दरारों को भली प्रकार भरवा देना | अगर ये दरारें तुम लोगों ने सही समय पर नहीं भरवाईं तो यह दीवार ही कमज़ोर हो जाएगी | और अगर घर की एक दीवार भी कमज़ोर हो जाए तो, वो हलकी-सी ठोकर से भी ढह जाती है......फिर ऐसे घर के अन्दर किसी भी बाहर वाले के झांकते देर नहीं लगती |”          

बुधवार, 21 अगस्त 2013

राजनैतिक पोशाक

                    राजनैतिक पोशाक 


             एक युवक का सिर फिर गया | वह मुन्ना भाई फिल्म देखकर आया और उसने डिसाइड किया कि अब से वह खादी ही पहनेगा | नया-नया गांधीवादी बना वह युवक खादी के कपड़े खरीदने चल दिया | वह एक ऐसी दुकान पर पहुँचा ....ओह ! माफ़ कीजिए...ऐसे शो-रूम में पहुँचा जहाँ खादी के ही कपड़े बिकते थे | वह एक-एक पोशाक देखता और फिर उसमे लगे रेट-टैग को देखता |......वह बड़ी देर की जद्दोजहद के बाद भी अपने लिए कुछ नहीं खरीद सका |
         क्योंकि...... उसकी जेब में गांधीजी की तस्वीरों वाले इतने ‘हरे पत्ते’ थे ही नहीं कि इस ‘राजनैतिक-पोशाक’ को खरीद पाता |