गुरुवार, 15 सितंबर 2016
रविवार, 28 अगस्त 2016
whatsapp ki kahaniyan
मित्रों! व्हाट्सएप आज हम सभी के जीवन का अभिन्न अंग बन गया है| इसी को ध्यान में रखते हुए पिछले वर्ष पहली बार इस थीम पर छोटी-छोटी कहानियाँ लिखीं थीं | वह पुस्तक प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई - "व्हाट्सएप रिश्ते नातों की कहानियाँ" किताब खूब सराही गई और खूब बिकी | मैने इसमें अपने पाठकों को चैटिगों के माध्यम से सकारात्मक सन्देश देने का प्रयास किया था |
इसका लोकार्पण विश्व पुस्तक मेले में 14 जनवरी 2016, दिन गुरूवार को वरिष्ठ कथाकार आदरणीय चित्रा मुद्गल जी, वरिष्ठ कहानीकार श्री तेजेंद्र शर्मा जी और सुप्रसिद्ध कवि एवं प्रोड्यूसर दूरदर्शन डॉ. अमरनाथ अमर जी के हाथों संपन्न हुआ था |
आज भी याद है कि आदरणीय चित्रा जी ने कहा था कि, “छोटी-छोटी कहानियों के रूप में यह नए तरह का प्रयास है | संभव है आगे ऐसी कहानियाँ अन्य लोगों द्वारा भी लिखीं जाएँ |”
श्री तेजेंद्र जी ने कहा था कि, “भविष्य में जब भी इस प्रकार की कहानियों का मूल्यांकन होगा तो उसकी पहली लेखिका ‘रश्मि’ ही मानी जाएगी |”
डॉ. अमरनाथ जी का कथन था कि, “आने वाले समय में ऐसी कहानियाँ बड़ी संख्या में लिखी जाएँगी |”
श्री तेजेंद्र जी ने कहा था कि, “भविष्य में जब भी इस प्रकार की कहानियों का मूल्यांकन होगा तो उसकी पहली लेखिका ‘रश्मि’ ही मानी जाएगी |”
डॉ. अमरनाथ जी का कथन था कि, “आने वाले समय में ऐसी कहानियाँ बड़ी संख्या में लिखी जाएँगी |”
......और सभी महानुभावों के कथन सत्य सिद्ध हुए | व्हाट्सएप की कहानियाँ अन्य लेखकों द्वारा लिखी जाने लगीं हैं और बाज़ार में आ रही हैं |
मेरी यह किताब आप फ्लिपकार्ट, अमेज़न, स्नैपडील, पुस्तकमंडी आदि अनेक जगहों से (पेपरबैक मूल्य मात्र 72 से 80 रुपयों के आसपास और हार्डकवर मूल्य 180 रुपयों के आसपास) में उपलब्ध हैं |
शनिवार, 30 जुलाई 2016
शुक्रवार, 29 जुलाई 2016
शुक्रवार, 15 जुलाई 2016
शुक्रवार, 8 जुलाई 2016
पूरा एक वर्ष बीत गया। अपने बेटे को आईआईटी में एड्मीशन दिलाने से पहले कलाम साहब का आशीर्वाद दिलाने और स्ट्रीम की राय लेने उनके घर गई थी। बेटी भी साथ हो ली थी।
जैसे ही अलख ने कलाम साहब के पैर छुए, वे भी झुक गए और कंधे पकड़कर अलख को अपने पास बैठा लिया। उन्होंने उसकी पीठ को खूब देर तक थपथपाया।
मैंने बताया कि सर आप पर उपन्यास लिखने की कोशिश कर रही हूँ तो खिलखिलाकर हँस दिए।
सर! उपन्यास पूरा हो चुका है। इसी महीने (प्रभात प्रकाशन) से आ रहा है....आप अब भी हम सब के बीच हैं...आप कहीं नहीं गए।
मंगलवार, 5 जुलाई 2016
माँगना नहीं देना सीखो
माँगना नहीं देना सीखो
मनुष्य का स्वभाव भी बड़ा अजीब होता है | वह हमेशा कुछ न कुछ पाने की जद्दोजहद में लगा रहता है | समाज से, राष्ट्र से, रिश्तों से सभी से कुछ न कुछ माँगने की ही चेष्टा में रहता है | सबसे विचित्र बात ये है कि इस माँग का कोई अंत नहीं है |
हम हमेशा असंतुष्ट से माँगते ही रहते हैं | हमें इतना अव्यवस्थित, असंतुष्ट किसने बना रखा है ? हमारी माँग ने, इच्छाओं ने, जो कभी ख़त्म नहीं होतीं |हम अपने पूरे जीवन भर सबसे प्यार माँगते हैं और खुद किसी को न प्यार ही दे पाते हैं और न ही विश्वास | हम हमेशा धन की ख्वाहिश करते हैं लेकिन कभी भी अपनी जेब से किसी ज़रूरतमंद पर खर्च नहीं करना चाहते | अपने अंतिम समय तक ईश्वर से भी कुछ-न-कुछ फ़रियाद ही करते रहते हैं लेकिन उसे अपनी निश्छल-भक्ति और श्रद्धा नहीं दे पाते | इसीलिए वॉटर टोंपिल कहते हैं -“मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो रोता हुआ पैदा होता है और निराशा में मरता है |”
हमारे बुज़ुर्ग एक कहानी कहते हैं-
शुरू-शुरू में ईश्वर ने सभी प्राणियों को बराबर आयु दी थी | सभी को चालीस-चालीस वर्ष आयु मिली | मनुष्य को अपनी उम्र काफी कम लगी और वह लोभ-वश और चाहने लगा| गधे को भी चालीस वर्ष आयु मिली थी लेकिन वह दूसरों का बोझ ढोते-ढोते इतना उकता चुका था कि अपनी आयु घटवाना चाहता था |ईश्वर ने दोनों के मन की बात जान ली और गधे की आयु के बीस वर्ष मनुष्य को दे दिए | इसीलिए हम चालीस वर्ष की उम्र के बाद जिम्मेदारियों के बोझ से दबे होते हैं | घर, परिवार, नौकरी, बच्चे, धन, माँ-प्रतिष्ठा इन्हीं सबको जोड़ने में उलझे रहते हैं | कुछ समय के बाद कुत्ते को भी अपनी चालीस वर्ष की उम्र लम्बी और उबाऊ लगने लगी | पूरे-पूरे दिन भौंकते रहना, इसके अतिरिक्त और कोई काम नहीं | अतः वह भी अपनी फरियाद लेकर ईश्वर के पास पहुँच गया |इधर मनुष्य को अब भी अपनी आयु कम लग रही थी और उसने कुत्ते की उम्र के बीस साल भी स्वीकार कर लिए | इसीलिए साठ वर्ष के बाद मनुष्य को रिटायर समझा जाता है और वह चाहे जितनी भी नसीहत दे, कोई उसकी बात को तवज्जो नहीं देता | आश्चर्य ये कि इतने पर भी मनुष्य की इच्छा का अंत नहीं हुआ, वह अब भी अपने जीवन से असंतुष्ट ही रहा | शायद उसे खुद ही पता नहीं था कि उसे क्या चाहिए| उसे जो भी मिला, वह लेता रहा | आखिरकार उल्लू को भी एहसास हुआ कि उसकी उम्र भी कुछ ज्यादा है | वह दिन-रात औंधा पड़ा करता ही क्या है ? इसीलिए उसने भी ईश्वर से अपनी आयु कम कर देने की विनती की | ईश्वर ने देखा कि मनुष्य का लोभ तो अब भी नहीं मिटा है और उसने उल्लू की आयु भी मनुष्य को ही दे दी | तभी से अस्सी वर्ष के बाद मनुष्य को न नींद आती है, न दिखाई देता है और न ही सुनाई देता है | वह रात-रात भर जागता रहता है |
इसीलिए ज्ञानी समझाते हैं कि ईश्वर से लम्बी आयु मत माँगो बल्कि बड़ी आयु माँगो | कभी भी अथाह धन की लालसा मत करो बल्कि कम-से-कम धन के भी सही उपयोग का ज्ञान माँगो | रिश्तों से प्यार मत माँगो बल्कि उन्हें इतना स्नेह दो कि वे सदा-सदा के लिए आपके हो जाएँ | हमारा देश, हमारा समाज सब हमसे ही है और ये समृद्ध हैं तो हमारा अस्तित्व भी है इसीलिए ये मत सोचो कि देश और समाज ने हमें क्या दिया बल्कि खुद उसे देना सीखो | फिर एक दिन ऐसा होगा कि हम देते-देते भी पूरी तरह से तृप्त हो उठेंगे, प्रेम और संतुष्टि से भर उठेंगे |
-रश्मि
शुक्रवार, 1 जुलाई 2016
मनोबल न खोएं
मनोबल न खोएं
------------------------------------------------ रश्मि
हम अपने जीवन में अनेक सपने सजाते हैं | अनेक इच्छाएँ पैदा करते हैं और बड़े-बड़े लक्ष्य बनाते हैं | अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अनेकानेक प्रयत्न भी करते हैं | उनके लिए योजनाएँ बनाते हैं और जी जान से जुट जाते हैं किन्तु विडंबना ये है कि अक्सर हम किसी भी काम के पूरा होने में अधिक समय लगता देखकर निराश हो उठते हैं और अपनी उन योजनाओं को बीच में ही छोड़ देते हैं | कहीं न कहीं हम नकारात्मकता से भर उठते हैं और अपने प्रयास बंद कर देते हैं | यह निराशा और नकारात्मक सोच ही हमारी सफलता की राह की सबसे बड़ी बाधा है | काफी साल पहले मैंने एक किस्सा सुना था जो कुछ यूँ था –
एक व्यक्ति था | वह बहुत ही परिश्रमी था | उसने अपने पूरे जीवन के लिए अनेक योजनाएँ बना रखीं थीं और उन्हें पाने के लिए भरसक प्रयास भी करता था लेकिन उसकी एक बड़ी कमजोरी थी कि वह बहुत जल्द ही निराश हो जाता था | इसी निराशा के चलते वह अनेकों कार्यों को आजमाता रहा | किन्तु धैर्य और सकारात्मकता का आभाव होने के कारण वह जल्द ही पुराने काम को बीच में ही छोड़ नए कामों पर हाथ आजमाने लगता और इसी प्रकार दिन गुज़रते गए | एक रोज़ उसकी मृत्यु हो गई और वह अपनी अनेक अधूरी इच्छाओं के साथ दुनिया से विदा हो गया | जब वह स्वर्ग पहुँचा तो देवदूत उसे एक कमरे में ले गए जहाँ वे सभी चीज़ें बड़े ही करीने से सजी रखीं थीं, जिन्हें पाने की इच्छा वह धरती पर किया करता था | उसने देवदूत से पूछा –“क्या ये सब मेरे लिए हैं !” देवदूत ने उत्तर दिया –“जी हाँ ! ये सारी चीज़ें आपकी ही हैं | ये वे ही चीज़ें हैं जिन्हें आप पाना चाहते हैं |” “.....तो ये सब आपने मुझे जीते-जी ही धरती पर ही क्यों नहीं दीं !” “जब आप इच्छा करते थे तो हम बनाना शुरू कर देते थे और फिर हम जैसे ही आपको देने वाले होते थे कि आप उसे पाने का ख्याल छोड़ कुछ और चाहने लगते थे |....फिर हम आपके लिए उस दूसरी चीज़ को बनाने में जुट जाते थे | इस प्रकार कुछ चीज़ें तो हम आपको दे पाए और कुछ नहीं दे पाए, सब यहीं इकट्ठी होतीं गईं | ये सब आपकी ही हैं, आप इनका इस्तेमाल कीजिए |”
मित्रों ! ये एक काल्पनिक कथा है | दूसरी दुनिया का सच हम नहीं जानते | लेकिन इस दुनिया के सच से हम सब बखूबी परिचित हैं | और यह सच है कि जब हम अपने भीतर किसी भी तरह की इच्छा पैदा करते हैं तो हमारी सारी शक्ति, सोच, प्रकृति, गतिविधियाँ उसे प्राप्त करने के लिए उद्यत हो उठतीं हैं | आवश्यकता है तो बस ‘मनोबल’ की | यदि हम पूरे जोश और लगन के साथ किसी काम को करने में जुट जाएँ तो वह काम अवश्य ही पूरा होता है जबकि थककर या निराश होकर उस काम को बीच में ही छोड़ दें तो असफलता ही हाथ लगती है | वैसे ही यदि हम कोई खवाहिश पैदा करें तो उसे पाने के लिए अपनी पूरी निष्ठा और शक्ति लगा दें | हम कभी भी न तो निराश हों और न ही हताश | हमारी लगन और आत्मबल ही हमारे भीतर वो उत्साह और शक्ति पैदा करता है जो कठिन से कठिन काम को भी पूरा करते हैं |
------------------------------------------------ रश्मि
गुरुवार, 30 जून 2016
बुरा जो देखन मैं चला
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलया कोय !
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा ना कोय !!
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा ना कोय !!
यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह स्वयं को छोड़ संसार के प्रत्येक जीव पर वस्तुओं में बुराई खोजता रहता है| यदि वह खुद के भीतर बुराइयाँ खोजने का प्रयास करे तो यह संसार उसके लिए सुखद बन जाए|बुराई का कोई अंत नहीं है, मानो तो यह कण-कण में विद्यमान है और न मानो तो कहीं भी नहीं, सिवाए एक भ्रम के|
एक संत अपने शिष्यो के साथ जा रहे थे| रास्ते मे एक शराबी मिला| वह झूमते हुए संत के पास आकर खड़ा हो गया और बोला – “आप सभी को उपदेश देते हैं कि शराब मत पियो, ये बुरी चीज़ है| लेकिन आप अन्न और फल को बुरा नहीं कहते| अगर ये अच्छे हैं तो इन्हीं से बनने वाली शराब कैसे बुरी हो सकती है?” शिष्य हैरत से देखने लगे की संत इस बात का क्या जवाब देंगे| संत ने मुस्कराकर कहा- “अगर कोई तुमपर एक गिलास में पानी भरके फेंक के मारे तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?” शराबी ने कहा- “नहीं, बिलकुल भी नहीं|” संत ने कहा- “अगर कोई थोड़ी सी मिट्टी उठाकर तुम्हें मारे तो क्या तुम घायल हो जाओगे?” शराबी ने फिर सर हिलाते हुए कहा- नहीं, नहीं|” संत ने आगे पूछा –“अब अगर कोई उसी मिट्टी और पानी को मिलाकर तुमपर फेंके तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?” शराबी ने कहा- “हाँ! उससे तो मैं घायल हो सकता हूँ|” संत ने समझाते हुए कहा- “इसी तरह अंगूर और चावल अपने आप में बुरे नहीं हैं लेकिन यदि इन्हें मिलाकर सड़ा दिया जाए और शराब बनाकर सेवन किया जाए तो ये चीज़ें भी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो बन जातीं हैं|” संत की इस बात का शराबी पर गहरा असर
पड़ा और उस दिन से उसने शराब छोड़ दी|
पड़ा और उस दिन से उसने शराब छोड़ दी|
इस कहनी से दो बातें सीखने को मिलती हैं- एक तो यह कि शराब बुरी चीज़ है और दूसरी यह कि हम इंसान हर किसी में बुराई ही खोजते रहते हैं और उन्हीं का ढिंढोरा पीटते रहते हैं जबकि उसके बेहतर पक्ष भी हैं| हमें दोनों पहलुओं पर विचार करना चाहिए और बुराई को दरकिनार करके उसकी अच्छाइयों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए|
-रश्मि
बुधवार, 29 जून 2016
बुराइयों से दूर रहें
बुराइयों से दूर रहें
इस दुनिया में हर चीज़ अस्थाई है, कुछ भी हमेशा के लिए नहीं हैं, ये बात जानते हुए भी व्यक्ति इस संसार की भूल-भुलैया में भटकता रहता है | वह अपने जीवन में सब पा लेना चाहता है और इन्हीं चेष्टाओं में लगा रहता है | जीवन के सुख, वैभव, भोग, विलास, लिप्सा, तृष्णा आदि से कभी भी उसका जी नहीं भरता | यदि कभी-कभी उसे अपनी गलतियों का एहसास होता भी है तो वह बहुत ही अल्पकालीन होता है | संसार के भोग विलास के चंगुल से आसानी से नहीं निकला जा सकता |
एक वाकया है – एक रईस था | वह हमेशा ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने, जीवन को ऐश-ओ-आराम से युक्त बनाने तथा विलासिताओं की ओर ही आकर्षित रहता था | लेकिन समय के साथ-साथ उसे एहसास हुआ कि ‘मुझे भी अपना परमार्थ सुधारना चाहिए | आखिर एक दिन मुझे भी यह सब छोड़ छाड़कर ईश्वर के घर जाना है और मैंने अपने जीवन में इतने छल, कपट, अपराध किये हैं कि मुझे तो माफ़ी भी आसानी से नहीं मिल पाएगी |’ उसे अपने द्वारा किये गए बुरे कामों का पछतावा हो रहा था| वह एक धर्मगुरु के पास गया और बड़ी श्रद्धा से उनसे बोला – “गुरुदेव ! मैंने अपने जीवन में अनेक बुरे काम किये हैं | मैं एक व्यवसायी हूँ और मैंने अपने व्यवसाय को और बढाने के लिए अनेक गलत तरीकों का प्रयोग किया | मैं मांस-मदिरा से भी खुद को दूर न रख सका | सुरा और सुंदरी में ही जीवन का रस तलाशता रहा | लेकिन अब मुझे बहुत पछतावा होता है | मैं सभी बुराइयाँ छोड़ना चाहता हूँ | मेरा बेटा बड़ा हो रहा है और मैं नहीं चाहता कि वह भी मुझे देखकर इन बुराइयों को खुद में उतार ले | किन्तु प्रभु मेरी समस्या ये है कि मैं इन कर्मों में इस हद तक लिप्त हो चुका हूँ कि यदि मैं छोड़ना भी चाहता हूँ तो ये मुझे नहीं छोड़तीं | आप मेरी सहायता कीजिए |” गुरु मंद-मंद मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति की बातों को ध्यान से सुन रहे थे | उन्होंने बड़े प्रेम से कहा- “ज़रा अपना हाथ तो दिखाओ |” व्यक्ति ने अपना हाथ गुरु को दिखाने के लिए उनकी ओर बढ़ा दिया | गुरु ने अपने चेहरे पर चिंता के भाव लाते हुए कहा- “अरे ! तुम्हारी तो उम्र ही बहुत कम बची है | तुम अगले चालीसवें दिन इस संसार में विदा होने वाले हो | इतने कम समय में मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ! अब तो बेहतर यही होगा कि तुम अपने पुराने कामों को ही निपटाना शुरू कर दो क्योंकि तुम्हारे पास जीने के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं है |” वह व्यक्ति गुरु की बात सुनकर बहुत दुखी हुआ | अब वह अपने कारोबार का सभी हिसाब किताब ठीक-ठाक करने लगा | उसने जिसका भी धन रोका हुआ था वो सब देना शुरू कर दिया | अपने बेटे और पत्नी को भी भरपूर समय और स्नेह देने लगा | अपना अधिक से अधिक वक्त दूसरों की भलाई में गुज़ारने लगा | उसे बार बार यह अहसास रहता कि उसके पास अब ज्यादा वक्त नहीं है |
जब उनतालीसवां दिन आया तो उसने सोचा- ‘अब मेरे पास एक ही दिन बचा है, तो क्यों न गुरु जी का भी आशीर्वाद ले आऊँ | आखिरकार उन्होंने ही मुझे यह बताया है | यदि वे मुझे ऐसा न बताते तो मैं अपना इतना वक्त भी यूँ ही बर्बाद कर देता |’ इन उनतालीस दिनों में उसका जीवन पूरी तरह से बदल चुका था | अब वह एक नए रूप में अपने गुरु के समक्ष खड़ा था | उसने गुरु को प्रणाम किया और कहा- “आपकी आज्ञानुसार मैंने अपने सभी बुरे कामों को काफी हद तक सुधार लिया है | कल मैं इस जीवन से मुक्त हो जाऊँगा अत: आज आपके दर्शनों के लिए आया हूँ |” गुरु ने उसे प्रेम से अपने नज़दीक बैठाया और समझाया- “तुम्हारा पुराना जीवन तो कब का ख़त्म हो चुका है और नया जीवन शुरू भी हो चुका है | सच तो ये है कि मुझे तुम्हारी मृत्यु की कोई निश्चित जानकारी नहीं है लेकिन मैं यह सत्य ज़रूर जानता हूँ कि हम सभी को एक न एक दिन इस संसार से जाना ज़रूर है | जब हम इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि हम यहाँ हमेशा के लिए नहीं है तो हम अनेक बंधनों और अवगुणों की जंजीरों से खुद को जकड़ लेते हैं | जब हमें इस बात का एहसास बना रहता है कि हमें इस संसार से एक न एक दिन चले जाना है तो हम बुराइयों और मिथ्या बंधनों से बचे रहते हैं | तुम्हारे भीतर भी इतने बदलाव इसीलिए आए क्योंकि तुमने पिछले उनतालीस दिन यह सोचकर बिताए कि तुम्हें इस दुनिया से चले जाना है | तुम अपने सभी अधूरे कामों को पूरा करते रहे और बुराइयों से दूर बने रहे |”
इसी तरह से हमें भी हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए कि हम इस संसार में एक ख़ास मकसद से आए हैं हमारे हैं पास भी थोड़ा ही समय है | हम न तो कुछ साथ लाए थे और न ही साथ ले जाएँगे |हमें जल्दी से जल्दी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लेना चाहिए और उस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में काम करना चाहिए | जब हम अपने कार्यों को इस सोच के साथ करेंगे तो सभी बुराइयों और बंधनों से दूर बने रहेंगे |
- रश्मि
सोमवार, 27 जून 2016
चिरस्थाई सुख
चिरस्थाई सुख
भ्रम से छुटकारा पाना बेहद आवश्यक है | और यह ज़रा भी मुश्किल नहीं है, आवश्यकता है तो बस मजबूत इच्छाशक्ति की | जिस दिन हमें इस बात का एहसास हो जाता है कि 'यदि ये पूरी की पूरी दुनिया भी मिल जाए तो भी कुछ नहीं मिलेगा', उसी दिन से सभी भ्रम, सभी चाहतें ...सारी ख्वाहिशें खत्म हो जातीं हैं | विचित्र बात यही तो है कि हम सालों साल जद्दोजहद में लगे रहते हैं, कुछ न कुछ पाने के लिए संघर्ष करते रहते हैं | लेकिन हम जो कुछ भी पाने की चाहत करते हैं वे सभी चीज़ें संसारी हैं, भौतिक हैं, नश्वर हैं | सच तो ये है कि ऐसी दुनियावी चीज़ें प्राप्त करना कठिन भी नहीं होता | लेकिन ये जितनी आसानी से मिल जातीं हैं उतनी ही आसानी से छूटतीं भी जातीं हैं | ये वे चीज़ें हैं जो जो हम इस दुनिया में खोजते हैं, पाना चाहते हैं और फिर एक दिन ये इसी दुनिया में कहीं गुम भी हो जातीं हैं | उसी के बाद हमारी चेतना जागती है और हमें एहसास होने लगता है कि ये चीज़ें मेरा लक्ष्य नहीं हैं | ये जिंतनी भी वस्तुएँ दिख रही हैं, मुझे ये नहीं चाहिए ...और तब हमारे भीतर उनकी चाहत खत्म हो जाती है और हम उनकी ओर से आँख मूँद लेते हैं |
जैसे ही हम बाहरी वस्तुओं की ओर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं वैसे ही उनकी इच्छा खत्म हो जाती है | फिर बाहरी आकर्षण छोड़ हम भीतर की ओर देखने लगते हैं और भीतर प्रकाश होना प्रारंभ हो जाता है ...सारा सत्य साफ-साफ नज़र आने लगता है | अब तक स्थूल नेत्र संसार की वस्तुओं को देख रहे थे इसीलिए उनमें ही सुख की तलाश कर रहे थे, उन्हें पाने की मशक्कत में लगे थे लेकिन स्थूल नेत्र ज्यूँ ही बंद हुए सूक्ष्म नेत्र खुल गए | सूक्ष्म नेत्र भीतर की ओर दृष्टि डालते हैं | वे यह देखने की चेष्टा करते हैं कि मैं कौन हूँ ? मेरा अस्तित्व क्या है ? मैं इस संसार में क्या लेने आया हूँ ? मेरी आत्मा को किस वस्तु की तलाश है, उसे किस्में सुख मिलेगा ? ...और इसी के साथ सत्य का बोध प्रारंभ हो जाता है |
हमारे भीतर की आवाज़ इतनी शक्तिशाली होती है कि यदि एक बार जाग जाए तो मनुष्य फिर कभी संसारी आवाजों में नहीं भटकता | हमें अपने भीतर की आवाज़ को ध्यान लगाकर सुनना चाहिए | ये जो भी माँगे, देना चाहिए | यकीन करिए सुख उसी में मिलेगा ...असीम सुख | ये वो सुख होगा जो संसारी वस्तुओं में कभी भी न मिला होगा | ...चिरस्थाई सुख |
----------------------------- रश्मि
शनिवार, 25 जून 2016
वहम की रस्सी तोड़ फेंकें
वहम की रस्सी तोड़ फेंकें
जीवन में मिलने वाली असफलताएं कभी भी स्थाई नहीं होतीं | अक्सर हम एक बार असफल हो जाने के बाद पुनः प्रयास करने से डरने लगते हैं | कभी-कभी तो यह भी होता है कि हम बेहद अच्छा काम करने के बाद भी असंतुष्ट रहते हैं या किसी अन्य के विचारों द्वारा परिचालित होने लगते हैं | हमें अपने काम पर विश्वास नहीं होता और दूसरों से राय मांगने लगते हैं | ऐसे में यदि दूसरे लोग सराहना करते हैं तो हम उत्साहित हो उठते हैं लेकिन यदि वे ज़रा भी कमियां निकाल दें तो हम नेगेटिव में चले जाते हैं | हम अपना उत्साह खो बैठते हैं | हमें अपने भीतर कमियां ही कमियां नज़र आने लगतीं हैं | लेकिन इस तरह के विचार सिर्फ हमारे पैर में पड़ी बेड़ियों का ही काम करते हैं | हमें इनसे बाहर निकलना चाहिए|
अपने काम के प्रति पॉजिटिव रवैया रखें और निरंतर आगे बढ़ते रहें | कभी ये न सोचें कि कोई क्या कहेगा... क्या मैं ऐसा कर भी पाऊँगा... क्या मेरे काम की तारीफ होगी... आदि | हमें अपना बैस्ट करना चाहिए, बिना किसी पूर्वाग्रह या आशंका के | बाकी की सारी चिंताएं तो बस बेड़ियों के सामान हैं जो हमने खुद अपने पैरों में डाल रखी हैं | हम इन बेड़ियों में अपनी मर्ज़ी से ही जकड़े हुए हैं क्योंकि यदि हम एक बार ठान लें तो ये झूठी बेड़ियाँ झट टूट जाएँ, क्योंकि ये मात्र हमारा वहम हैं | ऐसी कोई बेड़ियाँ हैं ही नहीं|
एक वाकया है – एक धोबी था | वह अपने गधे को रोज अपने साथ ले जाता |उससे कम लेता, बोझा उठवाता और फिर शाम को अपने दरवाज़े पर बांध देता |वह गधा भी अपने मालिक का आज्ञाकारी था | एक दिन वह धोबी कुछ सामन लेने अपने गधे को साथ लेकर शहर गया | पूरे दिन दोनों बाज़ार की ख़ाक छानते रहे | धोबी थककर चूर हो चुका था | उसने एक धर्मशाला में जाकर आराम करने का विचार किया | अब समस्या थी गधे की | गधे को बाँधने के लिए जो रस्सी वह लाया था, न जाने कहाँ खो गई थी | शहर भी अनजना और गधा एक जानवर ! अब इसे कहाँ सुरक्षित रखा जाए ! रात में कहीं इधर उधर चला गया तो मुसीबत हो जाएगी | वह इसी उधेड़बुन में था तभी एक बुज़ुर्ग उसके पास आए और उसकी परेशानी का कारण पूछा | उसने अपनी समस्या उन बुज़ुर्ग को बताई |
बुज़ुर्ग ने समझाया- “यह गधा है, तुम्हारी तरह समझदार नहीं | तुम एक काम करो इसके गले में और पैर में रस्सी बाँधने के अभिनय करो | ...फिर देखो यह कहीं भी नहीं जाएगा |”
व्यक्ति इस युक्ति को सुनकर हैरान हो गया किन्तु इस वक्त इसे ही मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था इसलिए गधे के साथ वैसा ही अभिनय करने लगा जैसा बुज़ुर्ग ने कहा था| बुज़ुर्ग हँसते हुए चले गए | धोबी भी सोने चला गया |सुबह बड़े तड़के उसकी आँख खुल गई| वह घबराया हुआ बाहर आया | उसे चिंता थी कि कहीं उसका गधा रात को चला न गया हो, आखिर था तो जानवर ही न ! किन्तु उसके आश्चर्य का ठिकाना न था | गधा तो आराम से ज़मीन पर बैठा हुआ था, सर झुकाए | धोबी ने गधे को पुचकारा और आगे की यात्रा के लिए उसे हांकने लगा किन्तु अब वह गधा टस से मस ही न होता था | उसने गुस्से में गधे को मारना शुरू कर दिया लेकिन गधा तो अब भी अपनी जगह से न हिला |धोबी उसकी ढिटाई पर क्रोधित हो उठा और वहीँ पर पड़ी एक बेंत से उसकी पिटाई करने लगा | गधा पिट रहा था, रेंक रहा था लेकिन दो कदम भी आगे को न बढ़ता था | गधे की आवाज़ सुनकर वे बुज़ुर्ग भी वहाँ आ पहुँचे |
बोले – “ये क्या कर रहे हो बेटा ! इस नासमझ को क्यों पीट रहे हो ! तुम्हीं ने तो इसे रात में एक अदृश्य रस्सी से बाँधा था और अब जब ये चल नहीं रहा तो तुन इसे इतनी बेरहमी से पीट रहे हो !”
“लेकिन बाबा मैंने इसे कहाँ बाँधा था ? ये आगे तो बढ़े | खुद-ब-खुद चलने लग जाएगा|”
“बेटा ! यह भोला जीव है हमारी तुम्हारी तरह चतुर नहीं | यह अब भी उस अदृश्य रस्सी से बंधा है | तुम फिर से रस्सी खोलने का अभिनय करो | ...फिर देखना यह तुरंत चल देगा |”
धोबी ने बुज़ुर्ग की बात मानकर वैसा ही किया और सच में इस बार वह गधा एक ही हांक में चल दिया |
मित्रों ! हमारी सोच भी कुछ इसी तरह की होती है | हम अदृश्य चिंताओं से जकड़े रहते हैं | भूतकाल में की गई गलतियों या नाकामियों की जकड़न से बाहर ही नहीं निकलना चाहते | वर्तमान को बोझ-सा बनाए रहते हैं | कभी पुरानी गलतियों पर रोते रहते हैं तो कभी भविष्य की चिंता में गले जाते हैं | जो बीत गया अब उस पर दुःख मनाने का क्या फायदा | बेहतर तो यह हो कि पुरानी गलतियों से सीख लेकर आगे की ओर बढ़ा जाए | इसी प्रकार से जो भविष्य में होने वाला है उसके लिए ख्याली पुलाव न पकाएँ बल्कि पूरे आत्मविश्वास से जुटे रहें और यह विश्वास रखें कि सफलता ज़रूर मिलेगी | यदि हम अपने वजूद पर पड़ी वहम और आशंका की इस जकड़न को... इस रस्सी रूपी बंधन को तोड़कर फेंक देंगे तो हम भी आगे की ओर बढ़ते चले जाएँगे |
- रश्मि
शुक्रवार, 24 जून 2016
मैं और मैं ही
मैं और मैं ही
मैं क्या है ? बस एक छोटा-सा शब्द जिसे हमने विस्तार दे देकर उसे अपना पूरा का पूरा वजूद बना लिया है | मैं एक शब्द के सिवाए कुछ भी नहीं है ...एक ऐसा शब्द जिसे हमने सिर्फ अपनी एक अलग पहचान देने के लिए गढ़ा था | ताकि हम अपने बारे में कह सकें | हमारा नाम मोहन हो या सोहन, हम उसी नाम से पहचाने जाते हैं | लोग मोहन कहकर पुकारते हैं तो हम दौड़े चले जाते हैं कि, ‘हाँ ! मैं ही मोहन हूँ’ लेकिन यदि हमें कोई सफलता मिल जाए या हम कुछ भी करें तो हम ये नहीं कहते कि, ‘मोहन को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तब हम यही कहते हैं कि, ‘मुझे सफलता मिली या मैंने ये किया’ क्योकि यदि हमने ये कहा कि, ‘मोहन को सफलता मिली या मोहन ने ये किया’ तो लोग हमें नहीं किसी और को ही मोहन समझेंगे | इसलिए ‘मैं’ शब्द का प्रयोग खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया | किन्तु हमने उसे इतना विस्तार दे दिया कि यह हमारी पहचान पर ही हावी हो गया |
हम इस ‘मैं’ को ज्यों ज्यों अपने इर्दगिर्द लपेटते जाते हैं यह हमारे व्यक्तित्व पर हावी होने लगता है| तब यह उछाल मारने लगता है और उथल-पुथल मचा देता है | ‘मैं’ सिर्फ खुद को बताने के लिए बनाया गया ...खुद की पहचान करवाने के लिए बनाया गया लेकिन धीरे-धीरे यह खुद ही अपनी पहचान बनने लगा | इसका काम था यह कहना कि, ‘फलां काम मैंने किया’ लेकिन यह कहने लगा कि, ‘फलां काम मैंने ही किया’ ज्यों ही इस मैं ने खुद पर जोर डालना शुरू कर दिया त्यों ही ये पूरे के पूरे अस्तित्व पर हावी हो बैठा | हमारे व्यक्तित्व के बाकी सब गुण इसके आगे छोटे पड़ने लगे और यही उभरने लगा यह काम ‘मैंने ही’ किया | सारी मुसीबत की जड़ ‘ही’ पर ज़ोर डालने की प्रवृत्ति है | ‘मैं’ जो भी करे करने दीजिये | ‘मैं ही’ पर जोर मत डालिए | क्योंकि ‘मैं करता हूँ’ अच्छा है लेकिन यदि यह सोचें कि ‘मैं ही करता हूँ’ तो बस ! यहीं से परेशानी शुरू | सोचकर देखिये, जो जो काम हमने नहीं किये वे भी किसी ने तो किये ही न ? तो फिर हम अपने ‘मैं’ को इतना पोषित क्यों करें ?
संसार के सभी काम मिलकर होते हैं, कोई काम अकेले नहीं होता | इसलिए ‘मैं’ की कोई आवश्यकता नहीं है, ‘हम’ ही पर्याप्त है | मैं को तो सिर्फ खुद की पहचान बताने के लिए ही बचाए रखिये | इसे भीतर ही रखिये, बाहर विस्तार मत दीजिये | ‘मैं’ हमारा समूचा व्यक्तित्व नहीं है | एक उदाहरण देखिये - ‘यह मेरा घर है’ उचित है ...लेकिन यह कहना कि ‘यह मेरा ही घर है’ सारी मुसीबत की जड़ है | क्योंकि यदि यह हमारा न होता तो किसी और का होता | यहाँ तक कि हमारा रहते हुए भी किसी और का हो सकता है | ...और हमारे जाने के बाद तो यकीनन किसी और का ही हो जाएगा |
मित्रों ! ‘मैं’ को अपनी पहचान बताने तक ही सीमित रखिए | इसे ‘मैं’ से ‘मैं ही’ मत बनने दीजिये| ______________________________________________________________रश्मि
लघुकथा
राजनैतिक पोशाक
एक युवक का सिर फिर गया | वह मुन्ना भाई फिल्म देखकर आया और उसने डिसाइड किया कि अब से वह खादी ही पहनेगा | नया-नया गांधीवादी बना वह युवक खादी के कपड़े खरीदने चल दिया | वह एक ऐसी दुकान पर पहुँचा ....ओह ! माफ़ कीजिए...ऐसे शो-रूम में पहुँचा जहाँ खादी के ही कपड़े बिकते थे | वह एक-एक पोशाक देखता और फिर उसमे लगे रेट-टैग को देखता | बड़ी देर की जद्दोजहद के बाद भी वह युवक अपने लिए कुछ भी नहीं खरीद सका |
क्योंकि...... उसकी जेब में गांधीजी की तस्वीरों वाले इतने ‘हरे पत्ते’ थे ही नहीं कि इस ‘राजनैतिक-पोशाक’ को खरीद पाता |
बुधवार, 22 जून 2016
मंगलवार, 21 जून 2016
लघुकथा - दरारें
दरारें
जब से बेटी का फ़ोन आया है, वे बड़ी परेशान हैं |
“ये तो हद्द ही हो गई...विनोद जी ऐसा कैसे कर सकते हैं | माना हमारी नेहा थोड़ी मॉडर्न है पर है तो संस्कारी | उनकी उसे मारने की हिम्मत कैसे हुई...!” नेहा की माँ गुस्से से बोलीं |
पतिदेव ने पत्नी को समझाते हुए कहा – “कोई बात नहीं नेहा की माँ, तुम भी थोड़ा सब्र से काम लो... आखिरकार बेटी और दामाद का मामला है | तुम जा तो रही हो उसके पास | वहीँ जाकर पहले सारा मामला समझना और फिर उन्हें भी समझाना-बुझाना...सही राह दिखाकर आना | अभी दोनों की नई-नई ग्रहस्थी ही तो है |”
माँ जब बेटी के घर पहुंची तब तक सारी कहानी बदल चुकी थी | नव-दम्पति बड़े प्रेम-पूर्वक अपने घर के रंग-रोगन के बारे में बातचीत कर रहे थे | नेहा ने माँ को घर आया देख उनका स्वागत-सत्कार किया | माँ के बार-बार पूछने पर उसने पति के सामने ही बड़े संतुलित लहजे में रात के झगड़े के बारे में माँ को सब सच कह सुनाया | माँ ने भी स्थिति संभली देख बात को और तूल देना ठीक नही समझा और अगले दिन अपने घर लौट जाने का निर्णय ले लिया |
जाने से पहले माँ की नज़र सामने वाली दीवार पर पड़ी | उन्होंने उस दीवार पर कुछ दरारें देखीं | उसी वक्त बेटी और दामाद को बड़े प्यार से पास बुलाया और उस दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा - “बेटा, तुम लोगों का घर बहुत ही खूबसूरत है लेकिन इस दीवार पर कुछ दरारें हैं...रंग-रोगन से पहले इन दरारों को भली प्रकार से भरवा देना | अगर ये दरारें तुम लोगों ने सही समय पर नहीं भरवाईं तो यह दीवार कमज़ोर हो जाएगी | और अगर घर की एक दीवार भी कमज़ोर हो जाए तो, वो हलकी-सी ठोकर से भी ढह जाती है...फिर ऐसे घर के अन्दर किसी भी बाहर वाले के झांकते देर नहीं लगती |”
- रश्मि
प्रेरक प्रसंग
आत्मसम्मान
एक कुम्हार मिट्टी से सामान बना रहा था | पास ही अनेक घड़े, दिए, मूर्तियां, गुल्लकें बनी रखीं थीं| सभी आपस में बातें कर रहे थे |
घड़े ने दीयों से कहा– “तुम सभी कितने सुन्दर हो भिन्न-भिन्न आकृतियों के | एक हम हैं... सब के सब मोटे-मोटे | ज़रा-सा जो ढलक जाएँ तो तुरंत टूट जाएँ |”
पास बैठे दीये घड़े की बात सुन रहे थे | एक दीया बोला– “अरे ! कहाँ घड़े काका, हमारा आकर तो देखो आपके आगे कितना छोटा है | हम तो इतने छोटे हैं कि किसी कोने या सामान के पीछे कब दब जाएँ, टूट जाएँ.... पता भी न चले | हमारी बजाए तो ये मूर्तियाँ कहीं ज्यादा सुन्दर हैं | काश ! हम भी मूर्ति होते |”
दीये और घड़े की बातचीत सुनकर मूर्तियाँ भी कुछ उदास हो उठीं | एक मूर्ति बोली– “दीये भैया, ये आप क्या कह रहे हैं ! आपको नहीं पता कि हमें इस आकर को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है | अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं | हमें तो गुल्लक बनना पसंद था | काश ! हम गुल्लक होते तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते |”
गुल्लकें जो कि काफी देर से सबकी बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं | एक गुल्लक विफर पड़ी और बोली– “आप सभी हमारा दर्द नहीं समझ पाएँगे | हम से बड़ा दुर्भाग्यशाली और कोई नहीं होगा | लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे किन्तु इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी ही निर्ममता से जमीन पर पटक कर तोड़ देते हैं | अब आप ही बताइए क्या आपको कोई ऐसे निर्ममता से तोड़ता है ? आप में से सभी स्वतः ही टूट जाएँ तो और बात है किन्तु कोई निर्दयतापूर्वक तोड़ता नहीं है | इसीलिए मुझे तो अपने अलावा आप में से सभी की ज़िन्दगी पसंद है |”
इधर कुम्हार की चक्की जल्दी-जल्दी अपना काम भी करती जा रही थी और इन सभी की तकलीफें भी सुनती जा रही थी | जब उसका काम समाप्त हो गया तो उसने सभी के साथ प्रेमपूर्वक बातचीत शुरू कर दी |
उसने घड़े को समझाया– “तुम बहुत ही उपयोगी हो | क्या तुम्हें पता है कि तुम अपने शीतल जल से लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक संग्रह करते हैं |”
फिर वह दीये से बोली– “तुम आकार में बेशक बहुत छोटे हो लेकिन तुम्हारे भीतर से अनंत प्रकाश फूटता है | तुम मंदिरों में जगह पाते हो.. तो कभी-कभी घरों और देहरियों को जगमगाते हो |”
अब उस चक्की ने मूर्तियों की तरफ देखते हुए कहा– “तुम्हारी शोभा इसीलिए तो चौगुनी हो जाती है क्योंकि तुम इतनी तकलीफ सहती हो | और जानती हो ! इसीलिए तुम संसार भर के लोगों के घरों, मंदिरों, दफतरों की शोभा बढाती हो |”
आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा– “तुम सभी बहुत कीमती हो | तुम बच्चों की ख़ुशी हो... तो गरीब का आसरा हो | तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो |”
इस प्रकार वह चक्की उन माटी की चीजों के साथ-साथ हम मनुष्यों को भी ये सीख दे गई कि हमें अपने गुणों को पहचान कर खुद का सम्मान करना चाहिए | दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए | अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं, हमें स्वयं अपना मोल पहचानना चाहिए |
! इस प्रसंग से हमें यह सीख मिलती है कि हमें स्वयं अपना अपना महत्त्व पहचानना चाहिए | हमारा आत्मविश्वास ही सब कुछ है |
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घड़े ने दीयों से कहा– “तुम सभी कितने सुन्दर हो भिन्न-भिन्न आकृतियों के | एक हम हैं... सब के सब मोटे-मोटे | ज़रा-सा जो ढलक जाएँ तो तुरंत टूट जाएँ |”
पास बैठे दीये घड़े की बात सुन रहे थे | एक दीया बोला– “अरे ! कहाँ घड़े काका, हमारा आकर तो देखो आपके आगे कितना छोटा है | हम तो इतने छोटे हैं कि किसी कोने या सामान के पीछे कब दब जाएँ, टूट जाएँ.... पता भी न चले | हमारी बजाए तो ये मूर्तियाँ कहीं ज्यादा सुन्दर हैं | काश ! हम भी मूर्ति होते |”
दीये और घड़े की बातचीत सुनकर मूर्तियाँ भी कुछ उदास हो उठीं | एक मूर्ति बोली– “दीये भैया, ये आप क्या कह रहे हैं ! आपको नहीं पता कि हमें इस आकर को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है | अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं | हमें तो गुल्लक बनना पसंद था | काश ! हम गुल्लक होते तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते |”
गुल्लकें जो कि काफी देर से सबकी बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं | एक गुल्लक विफर पड़ी और बोली– “आप सभी हमारा दर्द नहीं समझ पाएँगे | हम से बड़ा दुर्भाग्यशाली और कोई नहीं होगा | लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे किन्तु इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी ही निर्ममता से जमीन पर पटक कर तोड़ देते हैं | अब आप ही बताइए क्या आपको कोई ऐसे निर्ममता से तोड़ता है ? आप में से सभी स्वतः ही टूट जाएँ तो और बात है किन्तु कोई निर्दयतापूर्वक तोड़ता नहीं है | इसीलिए मुझे तो अपने अलावा आप में से सभी की ज़िन्दगी पसंद है |”
इधर कुम्हार की चक्की जल्दी-जल्दी अपना काम भी करती जा रही थी और इन सभी की तकलीफें भी सुनती जा रही थी | जब उसका काम समाप्त हो गया तो उसने सभी के साथ प्रेमपूर्वक बातचीत शुरू कर दी |
उसने घड़े को समझाया– “तुम बहुत ही उपयोगी हो | क्या तुम्हें पता है कि तुम अपने शीतल जल से लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक संग्रह करते हैं |”
फिर वह दीये से बोली– “तुम आकार में बेशक बहुत छोटे हो लेकिन तुम्हारे भीतर से अनंत प्रकाश फूटता है | तुम मंदिरों में जगह पाते हो.. तो कभी-कभी घरों और देहरियों को जगमगाते हो |”
अब उस चक्की ने मूर्तियों की तरफ देखते हुए कहा– “तुम्हारी शोभा इसीलिए तो चौगुनी हो जाती है क्योंकि तुम इतनी तकलीफ सहती हो | और जानती हो ! इसीलिए तुम संसार भर के लोगों के घरों, मंदिरों, दफतरों की शोभा बढाती हो |”
आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा– “तुम सभी बहुत कीमती हो | तुम बच्चों की ख़ुशी हो... तो गरीब का आसरा हो | तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो |”
इस प्रकार वह चक्की उन माटी की चीजों के साथ-साथ हम मनुष्यों को भी ये सीख दे गई कि हमें अपने गुणों को पहचान कर खुद का सम्मान करना चाहिए | दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए | अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं, हमें स्वयं अपना मोल पहचानना चाहिए |
! इस प्रसंग से हमें यह सीख मिलती है कि हमें स्वयं अपना अपना महत्त्व पहचानना चाहिए | हमारा आत्मविश्वास ही सब कुछ है |
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