गुरुवार, 20 नवंबर 2014

वहम की रस्सी को तोड़ फेंकें

जीवन में मिलने वाली असफलताएं कभी भी स्थाई नहीं होतीं | अक्सर हम एक बार असफल हो जाने के बाद पुनः प्रयास करने से डरने लगते हैं | कभी-कभी तो यह भी होता है कि हम बेहद अच्छा काम करने के बाद भी असंतुष्ट रहते हैं या किसी अन्य के विचारों द्वारा परिचालित होने लगते हैं | हमें अपने काम पर विश्वास नहीं होता और दूसरों से राय मांगने लगते हैं | ऐसे में यदि दूसरे लोग सराहना करते हैं तो हम उत्साहित हो उठते हैं लेकिन यदि वे ज़रा भी कमियां निकाल दें तो हम नेगेटिव में चले जाते हैं | हम अपना उत्साह खो बैठते हैं | हमें अपने भीतर कमियां ही कमियां नज़र आने लगतीं हैं | लेकिन इस तरह के विचार सिर्फ हमारे पैर में पड़ी बेड़ियों का ही काम करते हैं | हमें इनसे बाहर निकलना चाहिए

अपने काम के प्रति पॉजिटिव रवैया रखें और निरंतर आगे बढ़ते रहें | कभी ये न सोचें कि कोई क्या कहेगा... क्या मैं ऐसा कर भी पाऊँगा... क्या मेरे काम की तारीफ होगी... आदि | हमें अपना बैस्ट करना चाहिए, बिना किसी पूर्वाग्रह या आशंका के | बाकी की सारी चिंताएं तो बस बेड़ियों के सामान हैं जो हमने खुद अपने पैरों में डाल रखी हैं | हम इन बेड़ियों में अपनी मर्ज़ी से ही जकड़े हुए हैं क्योंकि यदि हम एक बार ठान लें तो ये झूठी बेड़ियाँ झट टूट जाएँ, क्योंकि ये मात्र हमारा वहम हैं | ऐसी कोई बेड़ियाँ हैं ही नहीं|

एक वाकया है एक धोबी था | वह अपने गधे को रोज अपने साथ ले जाता | उससे कम लेता, बोझा उठवाता और फिर शाम को अपने दरवाज़े पर बांध देता | वह गधा भी अपने मालिक का आज्ञाकारी था | एक दिन वह धोबी कुछ सामन लेने अपने गधे को साथ लेकर शहर गया | पूरे दिन दोनों बाज़ार की ख़ाक छानते रहे | धोबी थककर चूर हो चुका था | उसने एक धर्मशाला में जाकर आराम करने का विचार किया | अब समस्या थी गधे की | गधे को बाँधने  के लिए जो रस्सी वह लाया था, न जाने कहाँ खो गई थी | शहर भी अनजना और गधा एक जानवर ! अब इसे कहाँ सुरक्षित रखा जाए ! रात में कहीं इधर उधर चला गया तो मुसीबत हो जाएगी | वह इसी उधेड़बुन में था तभी एक बुज़ुर्ग उसके पास आए और उसकी परेशानी का कारण पूछा | उसने अपनी समस्या उन बुज़ुर्ग को बताई

बुज़ुर्ग ने समझाया- यह गधा है, तुम्हारी तरह समझदार नहीं | तुम एक काम करो इसके गले में और पैर में रस्सी बाँधने के अभिनय करो | ...फिर देखो यह कहीं भी नहीं जाएगा |” 

व्यक्ति इस युक्ति को सुनकर हैरान हो गया किन्तु इस वक्त इसे ही मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था इसलिए गधे के साथ वैसा ही अभिनय करने लगा जैसा बुज़ुर्ग ने कहा था| बुज़ुर्ग हँसते हुए चले गए | धोबी भी सोने चला गया | सुबह बड़े तड़के उसकी आँख खुल गई| वह घबराया हुआ बाहर आया | उसे चिंता थी कि कहीं उसका गधा रात को चला न गया हो, आखिर था तो जानवर ही न ! किन्तु उसके आश्चर्य का ठिकाना न था | गधा तो आराम से ज़मीन पर बैठा हुआ था, सर झुकाए | धोबी ने गधे को पुचकारा और आगे की यात्रा के लिए उसे हांकने लगा किन्तु अब वह गधा टस से मस ही न होता था | उसने गुस्से में गधे को मारना शुरू कर दिया लेकिन गधा तो अब भी अपनी जगह से न हिला | धोबी उसकी ढिटाई पर क्रोधित हो उठा और वहीँ पर पड़ी एक बेंत से उसकी पिटाई करने लगा | गधा पिट रहा था, रेंक रहा था लेकिन दो कदम भी आगे को न बढ़ता था | गधे की आवाज़ सुनकर वे बुज़ुर्ग भी वहाँ आ पहुँचे

बोले – “ये क्या कर रहे हो बेटा ! इस नासमझ को क्यों पीट रहे हो ! तुम्हीं ने तो इसे रात में एक अदृश्य रस्सी से बाँधा था और अब जब ये चल नहीं रहा तो तुन इसे इतनी बेरहमी से पीट रहे हो !” 

लेकिन बाबा मैंने इसे कहाँ बाँधा था ? ये आगे तो बढ़े | खुद-ब-खुद चलने लग जाएगा|” 

बेटा ! यह भोला जीव है हमारी तुम्हारी तरह चतुर नहीं | यह अब भी उस अदृश्य रस्सी से बंधा है | तुम फिर से रस्सी खोलने का अभिनय करो | ...फिर देखना यह तुरंत चल देगा |” 

धोबी ने बुज़ुर्ग की बात मानकर वैसा ही किया और सच में इस बार वह गधा एक ही हांक में चल दिया |

मित्रों ! हमारी सोच भी कुछ इसी तरह की होती है | हम अदृश्य चिंताओं से जकड़े रहते हैं | भूतकाल में की गई गलतियों या नाकामियों की जकड़न से बाहर ही नहीं निकलना चाहते | वर्तमान को बोझ-सा बनाए रहते हैं | कभी पुरानी गलतियों पर रोते रहते हैं तो कभी भविष्य की चिंता में गले जाते हैं | जो बीत गया अब उस पर दुःख मनाने का क्या फायदा | बेहतर तो यह हो कि पुरानी गलतियों से सीख लेकर आगे की ओर बढ़ा जाए | इसी प्रकार से जो भविष्य में होने वाला है उसके लिए ख्याली पुलाव न पकाएँ बल्कि पूरे आत्मविश्वास से जुटे रहें और यह विश्वास रखें कि सफलता ज़रूर मिलेगी | यदि हम अपने वजूद पर पड़ी वहम और आशंका की इस जकड़न को... इस रस्सी रूपी बंधन को तोड़कर फेंक देंगे तो हम भी आगे की ओर बढ़ते चले जाएँगे

-रश्मि 

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बुधवार, 12 नवंबर 2014

बुराइयों से दूर रहें

इस दुनिया में हर चीज़ अस्थाई हैकुछ भी हमेशा के लिए नहीं हैंये बात जानते हुए भी व्यक्ति इस संसार की भूल-भुलैया में भटकता रहता है वह अपने जीवन में सब पा लेना चाहता है और इन्हीं चेष्टाओं में लगा रहता है जीवन के सुखवैभवभोगविलासलिप्सातृष्णा आदि से कभी भी उसका जी नहीं भरता यदि कभी-कभी उसे अपनी गलतियों का एहसास होता भी है तो वह बहुत ही अल्पकालीन होता है संसार के भोग विलास के चंगुल से आसानी से नहीं निकला जा सकता |

एक वाकया है – एक रईस था वह हमेशा ज्यादा से ज्यादा पैसा कमानेजीवन को ऐश-ओ-आराम से युक्त बनाने तथा विलासिताओं की ओर ही आकर्षित रहता था लेकिन समय के साथ-साथ उसे एहसास हुआ कि मुझे भी अपना परमार्थ सुधारना चाहिए आखिर एक दिन मुझे भी यह सब छोड़ छाड़कर ईश्वर के घर जाना है और मैंने अपने जीवन में इतने छलकपटअपराध किये हैं कि मुझे तो माफ़ी भी आसानी से नहीं मिल पाएगी |’ उसे अपने द्वारा किये गए बुरे कामों का पछतावा हो रहा थावह एक धर्मगुरु के पास गया और बड़ी श्रद्धा से उनसे बोला – “गुरुदेव ! मैंने अपने जीवन में अनेक बुरे काम किये हैं मैं एक व्यवसायी हूँ और मैंने अपने व्यवसाय को और बढाने के लिए अनेक गलत तरीकों का प्रयोग किया मैं मांस-मदिरा से भी खुद को दूर न रख सका सुरा और सुंदरी में ही जीवन का रस तलाशता रहा लेकिन अब मुझे बहुत पछतावा होता है मैं सभी बुराइयाँ छोड़ना चाहता हूँ मेरा बेटा बड़ा हो रहा है और मैं नहीं चाहता कि वह भी मुझे देखकर इन बुराइयों को खुद में उतार ले किन्तु प्रभु मेरी समस्या ये है कि मैं इन कर्मों में इस हद तक लिप्त हो चुका हूँ कि यदि मैं छोड़ना भी चाहता हूँ तो ये मुझे नहीं छोड़तीं आप मेरी सहायता कीजिए |” गुरु मंद-मंद मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति की बातों को ध्यान से सुन रहे थे उन्होंने बड़े प्रेम से कहा- ज़रा अपना हाथ तो दिखाओ |” व्यक्ति ने अपना हाथ गुरु को दिखाने के लिए उनकी ओर बढ़ा दिया गुरु ने अपने चेहरे पर चिंता के भाव लाते हुए कहा- अरे ! तुम्हारी तो उम्र ही बहुत कम बची है तुम अगले चालीसवें दिन इस संसार में विदा होने वाले हो इतने कम समय में मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ! अब तो बेहतर यही होगा कि तुम अपने पुराने कामों को ही निपटाना शुरू कर दो क्योंकि तुम्हारे पास जीने के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं है |” वह व्यक्ति गुरु की बात सुनकर बहुत दुखी हुआ अब वह अपने कारोबार का सभी हिसाब किताब ठीक-ठाक करने लगा उसने जिसका भी धन रोका हुआ था वो सब देना शुरू कर दिया अपने बेटे और पत्नी को भी भरपूर समय और स्नेह देने लगा अपना अधिक से अधिक वक्त दूसरों की भलाई में गुज़ारने लगा उसे बार बार यह अहसास रहता कि उसके पास अब ज्यादा वक्त नहीं है 

जब उनतालीसवां दिन आया तो उसने सोचा- अब मेरे पास एक ही दिन बचा हैतो क्यों न गुरु जी का भी आशीर्वाद ले आऊँ आखिरकार उन्होंने ही मुझे यह बताया है यदि वे मुझे ऐसा न बताते तो मैं अपना इतना वक्त भी यूँ ही बर्बाद कर देता |’ इन उनतालीस दिनों में उसका जीवन पूरी तरह से बदल चुका था अब वह एक नए रूप में अपने गुरु के समक्ष खड़ा था उसने गुरु को प्रणाम किया और कहा- आपकी आज्ञानुसार मैंने अपने सभी बुरे कामों को काफी हद तक सुधार लिया है कल मैं इस जीवन से मुक्त हो जाऊँगा अत: आज आपके दर्शनों के लिए आया हूँ |” गुरु ने उसे प्रेम से अपने नज़दीक बैठाया और समझाया- तुम्हारा पुराना जीवन तो कब का ख़त्म हो चुका है और नया जीवन शुरू भी हो चुका है सच तो ये है कि मुझे तुम्हारी मृत्यु की कोई निश्चित जानकारी नहीं है लेकिन मैं यह सत्य ज़रूर जानता हूँ कि हम सभी को एक न एक दिन इस संसार से जाना ज़रूर है जब हम इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि हम यहाँ हमेशा के लिए नहीं है तो हम अनेक बंधनों और अवगुणों की जंजीरों से खुद को जकड़ लेते हैं जब हमें इस बात का एहसास बना रहता है कि हमें इस संसार से एक न एक दिन चले जाना है तो हम बुराइयों और मिथ्या बंधनों से बचे रहते हैं तुम्हारे भीतर भी इतने बदलाव इसीलिए आए क्योंकि तुमने पिछले उनतालीस दिन यह सोचकर बिताए कि तुम्हें इस दुनिया से चले जाना है तुम अपने सभी अधूरे कामों को पूरा करते रहे और बुराइयों से दूर बने रहे |”

इसी तरह से हमें भी हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए कि हम इस संसार में एक ख़ास मकसद से आए हैं हमारे हैं पास भी थोड़ा ही समय है हम न तो कुछ साथ लाए थे और न ही साथ ले जाएँगे |हमें जल्दी से जल्दी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लेना चाहिए और उस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में काम करना चाहिए जब हम अपने कार्यों को इस सोच के साथ करेंगे तो सभी बुराइयों और बंधनों से दूर बने रहेंगे | - रश्मि 

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

रिसते रिश्ते

टूटे घरों से

सब रिस जाता है

हर रिश्ता

रिस जाता है

प्यार रिस जाता है

दरारें आ जाती हैं इतनी

कहाँ कुछ टिक पता है

हर दर्द, हर आह

दरारों को

और भी गहरा बनता है

पहले इन दरारों से

कुछ आवाजें रिसती हैं

फिर दर्द और कराहें रिसती हैं

जब सब चुक जाता है

तब

सन्नाटे रिसते हैं

धीरे-धीरे ये दरारें

बड़ी और बड़ी होती जाती हैं

और आखिर एक दिन

दरारों वाली ये दीवारें

ढह जातीं हैं

वे  दीवारें

जो कभी जगमगातीं थीं

उन पर टंगी

अरमानों की लाशें

थोड़ा तड़पतीं हैं

और छटपटातीं हैं

फिर लाचार वे भी

दम तोड़ जाती हैं

_ रश्मि
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बुरा जो देखन मैं चला

बुरा जो देखन मैं चलाबुरा ना मिलया कोय !
जो दिल खोजा आपनामुझसा बुरा ना कोय 
!!

        यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह स्वयं को छोड़ संसार के प्रत्येक जीव पर वस्तुओं में बुराई खोजता रहता है| यदि वह खुद के भीतर बुराइयाँ खोजने का प्रयास करे तो यह संसार उसके लिए सुखद बन जाए| बुराई का कोई अंत नहीं है, मानो तो यह कण-कण में विद्यमान है और न मानो तो कहीं भी नहीं, सिवाए एक भ्रम के|  

        एक संत अपने शिष्यो के साथ जा रहे थेरास्ते मे एक शराबी मिला| वह झूमते हुए संत के पास आकर खड़ा हो गया और बोला – “आप सभी को उपदेश देते हैं कि शराब मत पियो, ये बुरी चीज़ है| लेकिन आप अन्न और फल को बुरा नहीं कहते| अगर ये अच्छे हैं तो इन्हीं से बनने वाली शराब कैसे बुरी हो सकती है?” शिष्य हैरत से देखने लगे की संत इस बात का क्या जवाब देंगेसंत ने मुस्कराकर कहा- अगर कोई तुमपर एक गिलास में पानी भरके फेंक के मारे तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?” शराबी ने कहा- नहीं, बिलकुल भी नहीं|” संत ने कहा- अगर कोई थोड़ी सी मिट्टी उठाकर तुम्हें मारे तो क्या तुम घायल हो जाओगे?” शराबी ने फिर सर हिलाते हुए कहा- नहीं, नहीं|” संत ने आगे पूछा –“अब अगर कोई उसी मिट्टी और पानी को मिलाकर तुमपर फेंके तो क्या तुम्हें चोट लगेगी?” शराबी ने कहा- हाँ! उससे तो मैं घायल हो सकता हूँ|” संत ने समझाते हुए कहा- इसी तरह अंगूर और चावल अपने आप में बुरे नहीं हैं लेकिन यदि इन्हें मिलाकर सड़ा दिया जाए और शराब बनाकर सेवन किया जाए तो ये चीज़ें भी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो बन जातीं हैं|” संत की इस बात का शराबी पर गहरा असर
पड़ा और उस दिन से उसने शराब छोड़ दी|

       इस कहनी से दो बातें सीखने को मिलती हैं- एक तो यह कि शराब बुरी चीज़ है और दूसरी यह कि हम इंसान हर किसी में बुराई ही खोजते रहते हैं और उन्हीं का ढिंढोरा पीटते रहते हैं जबकि उसके बेहतर पक्ष भी हैंहमें दोनों पहलुओं पर विचार करना चाहिए और बुराई को दरकिनार करके उसकी अच्छाइयों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए| -रश्मि 


सोमवार, 10 नवंबर 2014

मनोबल न खोएँ


         हम अपने जीवन में अनेक सपने सजाते हैं | अनेक इच्छाएँ पैदा करते हैं और बड़े-बड़े लक्ष्य बनाते हैं | अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अनेकानेक प्रयत्न भी करते हैं | उनके लिए योजनाएँ बनाते हैं और जी जान से जुट जाते हैं किन्तु विडंबना ये है कि अक्सर हम किसी भी काम के पूरा होने में अधिक समय लगता देखकर निराश हो उठते हैं और अपनी उन योजनाओं को बीच में ही छोड़ देते हैं | कहीं न कहीं हम नकारात्मकता से भर उठते हैं और अपने प्रयास बंद कर देते हैं | यह निराशा और नकारात्मक सोच ही हमारी सफलता की राह की सबसे बड़ी बाधा है | काफी साल पहले मैंने एक किस्सा सुना था जो कुछ यूँ था –

        एक व्यक्ति था | वह बहुत ही परिश्रमी था | उसने अपने पूरे जीवन के लिए अनेक योजनाएँ बना रखीं थीं और उन्हें पाने के लिए भरसक प्रयास भी करता था लेकिन उसकी एक बड़ी कमजोरी थी कि वह बहुत जल्द ही निराश हो जाता था | इसी निराशा के चलते वह अनेकों कार्यों को आजमाता रहा | किन्तु धैर्य और सकारात्मकता का आभाव होने के कारण वह जल्द ही पुराने काम को बीच में ही छोड़ नए कामों पर हाथ आजमाने लगता और इसी प्रकार दिन गुज़रते गए | एक रोज़ उसकी मृत्यु हो गई और वह अपनी अनेक अधूरी इच्छाओं के साथ दुनिया से विदा हो गया | जब वह स्वर्ग पहुँचा तो देवदूत उसे एक कमरे में ले गए जहाँ वे सभी चीज़ें बड़े ही करीने से सजी रखीं थीं, जिन्हें पाने की इच्छा वह धरती पर किया करता था | उसने देवदूत से पूछा –“क्या ये सब मेरे लिए हैं !” देवदूत ने उत्तर दिया –“जी हाँ ! ये सारी चीज़ें आपकी ही हैं | ये वे ही चीज़ें हैं जिन्हें आप पाना चाहते हैं |” “.....तो ये सब आपने मुझे जीते-जी ही धरती पर ही क्यों नहीं दीं !” “जब आप इच्छा करते थे तो हम बनाना शुरू कर देते थे और फिर हम जैसे ही आपको देने वाले होते थे कि आप उसे पाने का ख्याल छोड़ कुछ और चाहने लगते थे |....फिर हम आपके लिए उस दूसरी चीज़ को बनाने में जुट जाते थे | इस प्रकार कुछ चीज़ें तो हम आपको दे पाए और कुछ नहीं दे पाए, सब यहीं इकट्ठी होतीं गईं | ये सब आपकी ही हैं, आप इनका इस्तेमाल कीजिए |”

        मित्रों ! ये एक काल्पनिक कथा है | दूसरी दुनिया का सच हम नहीं जानते | लेकिन इस दुनिया के सच से हम सब बखूबी परिचित हैं | और यह सच है कि जब हम अपने भीतर किसी भी तरह की इच्छा पैदा करते हैं तो हमारी सारी शक्ति, सोच, प्रकृति, गतिविधियाँ उसे प्राप्त करने के लिए उद्यत हो उठतीं हैं | आवश्यकता है तो बस ‘मनोबल’ की | यदि हम पूरे जोश और लगन के साथ किसी काम को करने में जुट जाएँ तो वह काम अवश्य ही पूरा होता है जबकि थककर या निराश होकर उस काम को बीच में ही छोड़ दें तो असफलता ही हाथ लगती है | वैसे ही यदि हम कोई खवाहिश पैदा करें तो उसे पाने के लिए अपनी पूरी निष्ठा और शक्ति लगा दें | हम कभी भी न तो निराश हों और न ही हताश | हमारी लगन और आत्मबल ही हमारे भीतर वो उत्साह और शक्ति पैदा करता है जो कठिन से कठिन काम को भी पूरा करते हैं |

------------------------------------------------ रश्मि          


शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

माँगना नहीं देना सीखो

मनुष्य का स्वभाव भी बड़ा अजीब होता है | वह हमेशा कुछ न कुछ पाने की जद्दोजहद में लगा रहता है | समाज से, राष्ट्र से, रिश्तों से सभी से कुछ न कुछ माँगने की ही चेष्टा में रहता है | सबसे विचित्र बात ये है कि इस माँग का कोई अंत नहीं है |
       
हम हमेशा असंतुष्ट से माँगते ही रहते हैं | हमें इतना अव्यवस्थित, असंतुष्ट किसने बना रखा है ? हमारी माँग ने, इच्छाओं ने, जो कभी ख़त्म नहीं होतीं | हम अपने पूरे जीवन भर सबसे प्यार माँगते हैं और खुद किसी को न प्यार ही दे पाते हैं और न ही विश्वास | हम हमेशा धन की ख्वाहिश करते हैं लेकिन कभी भी अपनी जेब से किसी ज़रूरतमंद पर खर्च नहीं करना चाहते | अपने अंतिम समय तक ईश्वर से भी कुछ-न-कुछ फ़रियाद ही करते रहते हैं लेकिन उसे अपनी निश्छल-भक्ति और श्रद्धा नहीं दे पाते | इसीलिए वॉटर टोंपिल कहते हैं -मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो रोता हुआ पैदा होता है और निराशा में मरता है |”

हमारे बुज़ुर्ग एक कहानी कहते हैं-
      
शुरू-शुरू में ईश्वर ने सभी प्राणियों को बराबर आयु दी थी | सभी को चालीस-चालीस वर्ष आयु मिली | मनुष्य को अपनी उम्र काफी कम लगी और वह लोभ-वश और चाहने लगा| गधे को भी चालीस वर्ष आयु मिली थी लेकिन वह दूसरों का बोझ ढोते-ढोते इतना उकता चुका था कि अपनी आयु घटवाना चाहता था | ईश्वर ने दोनों के मन की बात जान ली और गधे की आयु के बीस वर्ष मनुष्य को दे दिए | इसीलिए हम चालीस वर्ष की उम्र के बाद जिम्मेदारियों के बोझ से दबे होते हैं | घर, परिवार, नौकरी, बच्चे, धन, माँ-प्रतिष्ठा इन्हीं सबको जोड़ने में उलझे रहते हैं | कुछ समय के बाद कुत्ते को भी अपनी चालीस वर्ष की उम्र लम्बी और उबाऊ लगने लगी | पूरे-पूरे दिन भौंकते रहना, इसके अतिरिक्त और कोई काम नहीं | अतः वह भी अपनी फरियाद लेकर ईश्वर के पास पहुँच गया | इधर मनुष्य को अब भी अपनी आयु कम लग रही थी और उसने कुत्ते की उम्र के बीस साल भी स्वीकार कर लिए | इसीलिए साठ वर्ष के बाद मनुष्य को रिटायर समझा जाता है और वह चाहे जितनी भी नसीहत दे, कोई उसकी बात को तवज्जो नहीं देता | आश्चर्य ये कि इतने पर भी मनुष्य की इच्छा का अंत नहीं हुआ, वह अब भी अपने जीवन से असंतुष्ट ही रहा | शायद उसे खुद ही पता नहीं था कि उसे क्या चाहिए| उसे जो भी मिला, वह लेता रहा | आखिरकार उल्लू को भी एहसास हुआ कि उसकी उम्र भी कुछ ज्यादा है | वह दिन-रात औंधा पड़ा करता ही क्या है ? इसीलिए उसने भी ईश्वर से अपनी आयु कम कर देने की विनती की | ईश्वर ने देखा कि मनुष्य का लोभ तो अब भी नहीं मिटा है और उसने उल्लू की आयु भी मनुष्य को ही दे दी | तभी से अस्सी वर्ष के बाद मनुष्य को न नींद आती है, न दिखाई देता है और न ही सुनाई देता है | वह रात-रात भर जागता रहता है |
       
इसीलिए ज्ञानी समझाते हैं कि ईश्वर से लम्बी आयु मत माँगो बल्कि बड़ी आयु माँगो | कभी भी अथाह धन की लालसा मत करो बल्कि कम-से-कम धन के भी सही उपयोग का ज्ञान माँगो | रिश्तों से प्यार मत माँगो बल्कि उन्हें इतना स्नेह दो कि वे सदा-सदा के लिए आपके हो जाएँ | हमारा देश, हमारा समाज सब हमसे ही है और ये समृद्ध हैं तो हमारा अस्तित्व भी है इसीलिए ये मत सोचो कि देश और समाज ने हमें क्या दिया बल्कि खुद उसे देना सीखो | फिर एक दिन ऐसा होगा कि हम देते-देते भी पूरी तरह से तृप्त हो उठेंगे, प्रेम और संतुष्टि से भर उठेंगे | -रश्मि

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

जीवन की प्रेरणा अपने आस-पास से भी लें

‘पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती और सीख का कोई अंत नहीं’ - ये बात हम बचपन से सुनते आ रहे हैं लेकिन इसका साक्षात् प्रमाण मैंने पिछले दिनों देखा | आप सभी के साथ साझा करना चाहती हूँ ताकि इस कहानी से मेरी नई जनरेशन परिस्थितियों से लड़ना और हर हाल में खुद को साबित करना सीखे |

हुआ कुछ यूँ कि मैं जिस संस्थान में पढ़ाती हूँ वहाँ एक फिजिक्स अटेंडेंट को नौकरी पर रखा गया | अटेंडेंट का काम होता है- फिजिक्स लैब की सफाई, रख-रखाव, टीचर्स की सहायता, बच्चों को उपकरण वगैरह देना आदि | इस काम के लिए भी समझदार व्यक्ति की ही ज़रूरत होती है क्योंकि लैब में तरह-तरह के कैमिकल मौजूद होते हैं |

किस्सा ये है कि जब हमने उस नए अटेंडेंट को देखा तो हम सभी चौंक गए क्योंकि वह लड़का कुछ समय पहले इसी संस्थान में साफ़-सफाई का काम किया करता था | वह सफाई-कर्मचारी के पद पर था | डंडे का एक लम्बा-सा पोंछा लिए सफाई करता रहता था | उसके इस बदले पद और चेहरे से झलकते आत्मविश्वास को देखकर मुझे उससे बात करने की इच्छा हुई | मैंने छुट्टी के बाद उसे स्टाफ-रूम में बुलाया और उसके साथ बात करने लगी | मैंने इस बदलाव के विषय में पूछा तो उसने बताया – “मैडम मैं बहुत ही गरीब घर का लड़का हूँ | मेरी माँ घरों में सफाई-बर्तन का काम करती है और पिता दिहाड़ी मजदूर थे | कुछ दिन पहले ही मेरे पिता टीबी की बीमारी से मर गए | जब तक वे जिंदा रहे, हम पाँच भाई-बहनों को जैसे-तैसे पढ़ाते रहे | वे नहीं चाहते थे कि हम उनकी तरह ज़िन्दगी गुजारें | ...लेकिन मैडम हम गरीब लोग पढ़ें कि भूख मिटाएँ ! घर में मैं ही बड़ा था इसलिए पिता के बीमार पड़ जाने के कारण मुझे यहाँ सफाई का काम करना पड़ा | पहले तो मैं ये भी नहीं जानता था कि जिस कमरे में मैं सफाई करता हूँ, उसे लैब कहते हैं | मैं जब भी वहाँ सफाई करने जाता तो सारे पढने वाले बच्चों को ध्यान से देखता | मेरा भी जी करता कि उनकी तरह झक्क साफ कपड़े पहनूं और गिट-पिट बोलूं | मैं हर चीज़ ध्यान से देखता | अगर कोई भैयाजी या दीदीजी अपनी किताब कॉपी भूल जाते तो उसके पन्ने पलटता, उन्हें पढ़ने की कोशिश करता | कभी-कभी तो किसी-किसी भैयाजी और दीदीजी से उनकी किताब पर बनी फोटुओं के बारे में पूछने लगता, जानना चाहता | कोई-कोई भैया प्यार से बता देते, कोई-कोई डांट के भगा देते | एक बार एक भैयाजी बोले – “सुनो राजू ! मैंने ध्यान दिया है कि तुम्हें पढ़ने का बहुत शौक है | मेरा यहाँ आखिरी साल है, फिर मैं यहाँ से पास होकर चला जाऊँगा| इसलिए यदि तुम चाहो तो मेरी सारी किताबें और कॉपियाँ तुम ले लेना |” मैडम ! बाद में वे भैयाजी अपना पूरा बस्ता मुझे दे गए | मुझे तो जैसे खजाना मिल गया | दिन भर यहाँ काम करता और शाम के बाद उन किताबों के पन्ने पलटता रहता | एक दिन एक कॉपी में भैयाजी का फ़ोन नंबर लिखा देखा | मैंने भैयाजी से कहा कि मुझे आपसे मिलना है | फिर मैं उनसे मिलने उनके घर पहुँचा, तब मुझे पता चला कि उनके पिताजी एक बड़े डॉक्टर हैं | डॉक्टर साहब भी मुझसे मिले और बहुत खुश हुए | उन्होंने भैयाजी से कहा कि, ‘मुझे लगता है कि यह लड़का पढ़ना चाहता है और इसमें काबलियत भी है | तुम इसे हफ्ते में दो-एक बार पढ़ा दिया करो, अगर यह ठीक-ठाक सीख गया तो मैं इसे अपने क्लिनिक में रख लूँगा|’ मैडम ! मैं उन भैयाजी की बदौलत ही आज यहाँ पर हूँ |”

“तो तुमने उनके पिता के क्लिनिक में ही नौकरी क्यों नहीं की ?” मैंने आश्चर्य से पूछा |

“जब मैं यहाँ से चला गया था, तब उन्हीं के क्लिनिक में ही रहा था | दिनभर बाबूजी के साथ हाथ बंटाता और जब-जब मौका लगता भैयाजी मुझे पढ़ा देते | ऐसे मैं दो साल प्राइवेट पढ़ता रहा | ...फिर एक दिन अखबार में यहाँ की नौकरी निकली | भैयाजी और बाबूजी ने समझाया- ‘बेटा, हमारे पास तुम्हारी नौकरी पक्की नहीं है | तुम हमारे बेटे जैसे हो, हम तुम्हें कभी निकालेंगे नहीं लेकिन जरा सोचो वहाँ की नौकरी सरकारी और पक्की है | तुम दिन में काम भी कर सकते हो और शाम के बाद अपने भाई-बहनों का भी ध्यान रख सकते हो |’ मैडम जी मुझे उनकी बात समझ में आ गई और मैंने यहाँ का फारम भर दिया | ...और आप सबके पास फिर से आ गया |”

“तुम्हारी माँ कैसी है ?”

उसका चेहरा खिल रहा था | वह बोला- “उन्हें मैंने मशीन दिलवा दी है और कहा है कि अब घर पर ही सिलाई का काम शुरू करो, दूसरों के घर झाड़ू-पोंछा करने की जरुरत नहीं है | मैडम जी, अब मेरा छोटा वाला भाई बाबूजी की क्लिनिक में काम संभाल रहा है | उन देवता जैसे लोगों की वजह से ही हमारी ज़िन्दगी सँवर गई |”

उसकी कहानी सुनकर मुझे उसे सलामी देने को जी चाहा | मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराई | ...फिर अपने घर चल दी | ...लेकिन रास्ते भर सोचती रही कि जीवन को प्रेरणा देने वाले लोग बड़ी-बड़ी किताबों में ही नहीं बल्कि हमारे आस-पास भी मिल जाते हैं | यदि किसी को लगन और आत्मविश्वास का पाठ सीखना हो तो इस इंसान से भी सीख सकता है| है न ? – आपकी रश्मि 

बुधवार, 5 नवंबर 2014

फ़ोन कट चुका था

कहानी (बिंदिया में प्रकाशित)
समीरा दफ्तर से आते ही सीधे अपने कमरे की ओर गई और अपने हैंड बैग को एक ओर फेंकती हुई खुद भी बिस्तर पर औंधी गिर पड़ी | न जाने क्यों आजकल उसे अपनी ज़िन्दगी भी कुछ औंधी-सी महसूस हो रही है | इस वक्त उसके कमरे में लगभग अँधेरा है, चीज़ें नज़र तो आ रही हैं मगर धुंधली धुंधली-सी | वह उन्हें देखने की कोशिश भी नहीं करना चाहती | क्या करेगी उन्हें देखकर...वह उन्हें देखेगी...वे उसे देखेंगी...बस यही न ?

तस्वीर दीवार पर लटकी है तो लटकी रहे, मैं भी तो ऐसी ही किसी कील पर गड़ी हुई हूँ | घड़ी अपनी जगह पर चल रही है.... चलती रहे, मैं भी तो चल ही रही हूँ | वो तो फिर भी एक बार बंद हो जाए तो सेल बदलते ही फिर चल पड़ती है | लेकिन मैं....मैं दोबारा नहीं चलना चाहती....आखिर कब ख़त्म होंगे मेरे सेल !! अच्छे भले गुलाबी पर्दे भी मटमैले से नज़र आते हैं बिलकुल रिश्तों की तरह | चुपचाप लटक रहे हैं लेकिन जैसे ही मेरी भावनाएँ जोर मारतीं हैं, ये भी हिल पड़ते हैं | बड़ा अजीब-सा रिश्ता बन गया है मेरा इस कमरे की इन निर्जीव चीज़ों से..... पता ही नहीं चलता है कि ये ज्यादा निर्जीव हैं या मैं ?’

अपने ख्यालों में गुम समीरा के मन में एक बार तो आया कि उठे और कमरे की लाइट जला ले लेकिन फिर सोचने लगी क्या करेगी इस कमरे का अँधेरा मिटाकर.... ये कमरा है ही ऐसी जगह पर कि जहाँ जब देखो तब अँधेरा ही रहता है | यही हाल ज़िन्दगी का भी हो गया है....चौबीसों घंटे धुंधलका-सा.... बिलकुल इस कमरे के जैसा | कभी-कभी तो वह बड़ी असमंजस में पड़ जाती कि कमरे का धुंधलापन सिमटकर मन में समा रहा है या मन का धुंधलका विस्तार लेकर कमरे में गहरा रहा है !! अक्सर ऐसी ही ऊल-जलूल कल्पनाएँ करती हुई अपने इस कमरे में घंटों पड़ी रहती | पड़े-पड़े उसे वक्त का भी पता नहीं चलता | वह अपनी सोच की लहरों के उतार-चढ़ाव उतरा रही थी कि एकाएक उसके कानों में बेटे की आवाज़ गूंजी-
           मम्मी! शाम हो गई है, मुझे दूध दे दो |”

समीरा हरकत में आ गई और उठ बैठी लेकिन फिर ठहर गई और दो मिनट तक यूँ ही बैठी रही...थोड़ी उदास और परेशान....फिर अपनी हथेलियों से आँखों को रगड़ते हुए पीछे टेक लगाकर बैठ गई | खुद से बुदबुदाई-
              कहाँ है अमी ? वो तो इस वक्त कॉलेज में होगा...या अपने दोस्तों के साथ...या फिर हॉस्टल में | उसे गए हुए तो दो महीने हो चुके हैं लेकिन अब भी शाम होते ही लगता है मानो वो मुझे पुकार रहा है |’
शाम होते ही क्यों, समीरा को तो हर वक्त अपने बेटे की ही आवाज़ सुनाई देती रहती | अब भी सुबह-सुबह बाथरूम से आवाज़ आती है-
            मम्मी ! प्लीज़ टॉवल दे दो, बाहर ही भूल गया |”
            मम्मी ! जल्दी से नाश्ता दो न, बस आती होगी |”
            मम्मी ! मेरा एक जूता नहीं मिल रहा |”
........और कभी-कभी बड़े करीब आकर गले में हाथ डाल देता और अपनी आवाज़ में चॉकलेट घोलता हुआ कहता-
             मम्मी ! थोड़े-से पैसे दे दो न |”
......मम्मी! ये दे दो न...वो दे दो न...बचपन से यही सीखा उसने | वह भी देती रही...चाहे जैसे भी दे पाई हो, लेकिन जितना भी संभव हो सका उसे देती रही | पिछले इतवार जब घर आया था तब फिर कुछ माँग गया-
             मम्मी, मुझे भी थोड़ी आज़ादी चाहिए | आप तो हर वक्त कॉन्टेक्ट में रहना चाहती हैं | खाना खाया... पानी पिया.... कॉलेज के लिए निकल गया.... टाइम पर सो गया....? बस मॉम, बहुत हो गया | अब मैं बच्चा नहीं रहा, संभाल सकता हूँ खुद को |”
समीरा सन्न रह गई | कैसे दे दे उसे वो, जो इस वक्त वो मांग रहा है | उसी को देख-देखकर ही तो इतने साल गुज़ारे हैं और अब वही खुद को उससे छीन लेना चाहता है !! रुपयों-पैसों से खरीदी जा सकने वाली चीज़ों की माँग करने वाला अमी आज माँ की भावनाएँ माँग रहा है, उनसे आज़ादी माँग रहा है |...... काश ! तूने कोई नया मोबाइल मांग लिया होता या लेपटॉप जैसा कुछ और माँग लेता..... तूने अपनी माँ से खुद को ही माँग लिया | छोटा-सा अमी, जो हर वक्त उसका दुपट्टा पकड़े उसके पीछे-पीछे घूमता था और पूछता था 
                मम्मी ! पापा मुझे छोड़कर क्यों चले गए? मम्मी आप तो नहीं जाओगी ना मुझे छोड़कर ?”
.......और आज वही अमी इतना बड़ा हो गया है कि अपनी माँ से ही आज़ादी मांग रहा है | दुपट्टा तो कब का छोड़ चुका है, अब हाथ भी झटक लेना चाहता है | आज इतना बड़ा हो गया है कि मुझे ही आज़ादी के मायने सिखा रहा है |
        एक समय था जब इसी अमी की खातिर मैंने आज़ादी शब्द को अपनी फीकी पड़ चुकी लाल चूनर में लपेटकर घर के सबसे पुराने संदूक की तली में डाल दिया था, हमेशा-हमेशा के लिए | सभी मिलने-जुलने वाले दूसरी शादी कर लेने का सुझाव देते और समझाते-
              अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, दूसरी शादी कर लो | अभी बेटा भी मासूम है, उसे ढलने में परेशानी नहीं होगी |
.....लेकिन सिर्फ तुम्हारे लिए अमी... सिर्फ तुम्हारे लिए..... तुम्हारी मासूम मुस्कान के लिए मुझे ढलनेशब्द से परेशानी होने लगी थी | मैं कल्पना मात्र से काँप जाती थी कि एक अनजाने इंसान को तुम अपना पिता कैसे कह पाओगे.... उसके लिए तुम खुद को कैसे ढाल पाओगे.... अपने बचपन और अपनी माँ को हिस्सों में कैसे बाँट पाओगे ? उस वक़्त सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी परवरिश की खातिर मैंने इस आज़ादी शब्द को अपने जीवन से मिटा दिया था ....हमेशा हमेशा के लिए | सभी नाते रिश्तेदारों को दो टूक जवाब देने के बाद मैं तुम्हारी कंचे जैसी मासूम आँखों में सिमटने लगी और तुम मेरी बाहों के खुले गगन में निर्बाध और निर्द्वंद्व उड़ने लगे | तुम बचपन से ही बड़े शरारती और बातूनी थे | तुम्हारी मीठी-मीठी बातें सबको बताने का मन करता लेकिन किसे बताती.... बहुत छोटी-सी दुनिया थी हमारी |
         समीरा ने विचारों में खोए खोए ही अपना हाथ बढ़ाया और कमरे की लाइट जला दी | पूरा कमरा दूधिया रौशनी से भर उठा और समीरा की पनीली आँखें इस दूधिया रौशनी से चौंधिया उठीं | धीरे - धीरे उसे अपने भीतर कमजोरी महसूस होने लगी, उसका बदन भी टूट रहा है | उसे लगा कि जैसे उसे बुखार चढ़ रहा हो | बिस्तर पर ही धीरे-धीरे खिसकते हुए उसने सिरहाने रखी मेज़ की दराज से थर्मामीटर निकाला और अपने मुँह से लगाया | उसने देखा, वाकई बुखार है मगर अभी हल्का ही है | कुछ देर यूँ ही बैठी रही, शांत निश्चेष्ट फिर उसने थर्मामीटर दराज़ में रख दिया और मेज़ पर रखी डायरी उठा ली और उसके पन्ने पलटने लगी | डायरी के पन्ने पलटते ही समीरा के कानों में फिर से अमी की आवाज़ गूंज उठी
               मम्मी, आप इस डायरी में क्या लिखती रहती हैं ?”
               कुछ नहीं बेटा, जो भी मेरे मन में आता है, वो सब इस डायरी में लिख देती हूँ... तुम्हारी सारी शैतानियाँ और मीठी-मीठी बातें भी इसी के पन्नों में उतार देती हूँ | बेटा, मैं तुम्हारे बचपन को तो रोक नहीं सकती इसीलिए तुम्हारी हर रंग-बिरंगी याद को इस डायरी के रीते पन्नों में कैद करने की कोशिश करती रहती हूँ | जब तुम बड़े हो जाओगे, तो मैं इसे पढ़-पढ़कर तुम्हारा बचपन दोहरा लिया करुँगी, और जब तुम पापा बनने वाले होओगे, तब यही डायरी अपनी बहू को गिफ्ट कर दूंगी |”
                 मम्मी आप भी न ! कैसी-कैसी बातें करती हैं.... अभी तो मैं बच्चा हूँ |”
अब वही मासूम बच्चा कितना बड़ा हो गया है ....दुनियादारी से भरा हुआ | अपने एकमात्र रिश्ते से भी आज़ादी माँग रहा है | क्या इस कड़वाहट को भी मैं इस डायरी में उतार दूँ ?...... कैसे करूँ ऐसा.... जिस डायरी में अब तक फूल उगाती आई थी, अब धीरे-धीरे काँटों को कैसे जगह लेने दूँ ?.... तुम क्यों बदल गए अमी ?...... उसे लगा कि बुखार धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है, वह उठी और बाथरूम में चली गई | उसके तन मन की पीड़ा बढ़ती ही जा रही थी, टांगें दर्द से चूर चूर हो रहीं थीं.... और आत्मा.... आत्मा के चूरे तो वह अपने बिस्तर पर ही छोड़ आई थी | इसी बीच कमरे में मोबाइल की घंटी बज उठी और कुछ देर शोर मचाकर उसके मोबाइल के रिंग की आवाज़ कमरे के कोनों में कहीं खो गई | उधर बाथरूम में भी समीरा के ज़हन में अमी की यादें और कानों में अमी की ही आवाजें गूंजती रहीं | वह हाथ मुँह धोकर बाहर आई ....खुद को आईने में देखा .....वह बहुत थकी-थकी और कमज़ोर लग रही थी | जी किया कि चाय बना कर पीये लेकिन शरीर की ताकत साथ नहीं दे रही थी ......फिर से बिस्तर पर लेट गई | उसे अपना मुँह भी कड़वा-सा लग रहा था |
                 “मम्मी आप हर वक़्त अपन कमरे में ही बंद रहती हैं | कभी बाहर जाया करिए.... कुछ शॉपिंग किया करिए.... अपने दोस्तों से मिला करिए | आपने अपनी लाइफ बस मुझ तक ही समेट कर रख दी है |”
वह चौंक पड़ी | उसे लगा अमी हमेशा की तरह फिर अचानक उसके कमरे में आकर उससे नाराज़ हो रहा है |
         “.....क्या करुँगी बाहर जाकर .....और शॉपिंग !! बाज़ार की चमचमाती दुकानों में मेरी ख्वाहिशों का सामान मिलता ही कहाँ है.... जब भी किसी मॉल में घूमती हूँ तो यही सोचने लगती हूँ कि मैं सामान खरीदने आई हूँ या अपने चैन-सुकून को बेचने आई हूँ !! ......फ्रेंड्स के बीच भी अक्सर बेचैनी महसूस करती हूँ | वे अपने भरे-पूरे घर की भरी-भरी बातें सुनाकर मेरे सूने मन को भरना चाहते हैं लेकिन मैं इस भराव से दरकने लगती हूँ .....और बिखरने लगती हूँ | .....नहीं अमी, मैं यहीं ठीक हूँ |”
वह मन ही मन बुदबुदाई | मोबाइल की घंटी फिर एक बार बजी | समीरा चौंक उठी, अरे ! अमी की मिस कॉल ! ये कब आई ? .....अब फिर झगड़ा करेगा कि कहाँ थीं आप ? फोन क्यों नहीं उठाया ?
        “हैल्लो !
        “क्या माँ, कहाँ थीं आप ? कितनी देर से आपको फोन ट्राई कर रहा हूँ | रिंग जा रही है लेकिन आप फ़ोन ही नहीं उठा रहीं | .....अपनी उसी अँधेरी कोठरी में पड़ी होंगीं, है न ? .....अच्छा सुनिए, मैं सन्डे को आ रहा हूँ और अपने कुछ दोस्तों को भी साथ ला रहा हूँ | प्लीज कुछ बढ़िया से स्नैक्स वगैरह बना दीजियेगा | .....बाय, ......थैंक यू, .....लव यू |”
        “हैल्लो...!!!! सुन अमी....!!! हैल्लो....!!
समीरा का मुँह खुला का खुला ही रह गया और मोबाइल कब का बंद हो चुका था | कमरे में तेज़ लाइट फैल रही थी .....लेकिन समीरा..... वह तो और भी गहरे अन्धकार में उतर चुकी थी | उसके बेटे ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि माँ, आप ठीक तो हैं न ! आपकी तबियत तो ठीक है न ! काश वो एक बार यही कह देता कि मम्मी, जब आप फ़ोन नहीं उठाती हैं तो मुझे आपकी चिंता हो जाती है | ......नहीं, अब वो ये सब क्यों पूछेगा, अब वो बड़ा हो गया है | अपने सपने पूरे करने के लिए आगे बढ़ चुका है | समीरा की कोरों से टपकते पानी ने कब उसका तकिया भिगो डाला, उसे भी पता नहीं चला|
          अमी बचपन में समीरा के दुपट्टे में लगे सितारे अपने नाखून से नोंच नोंच कर निकाल लिया करता था, वह उन्हें इकट्ठे कर लेता और फिर घंटों उनसे खेला करता | समीरा को इस समय ऐसा लगा, मानों उसके बेटे ने वे सारे सितारे, जो कभी उसकी चुनरी से नोंचकर निकले थे, वे सब सितारे अपने सपनों की दीवार पर चिपका दिए हों | अमी के लिए आज उसका कैरियर ही उसका सपना है इससे बढ़कर और कुछ नहीं है उसके लिए | यूँ तो वह भी हमेशा से यही चाहती रही थी कि उसका अमी अपने जीवन में कामयाबी हासिल करे.... बहुत बड़ा आदमी बने .....लेकिन वह तो माँ की ममता को ही भूल बैठा | समीरा फिर बिस्तर पर लेट गई | उसे महसूस हुआ कि उसका बुखार तेज़ होता जा रहा है, और उसे उठकर दवाई ले लेनी चाहिए ....लेकिन इससे पहले उसे एक और ज़रूरी काम करना है | उसने मोबाइल उठाया और अमी के नंबर पर फ़ोन लगाया |
        “हैल्लो अमी !
        “यस मम्मा !
        “अमी, मैं कल सुबह ही तुम्हारे नाना के घर जा रही हूँ (समीरा के हाथ बुखार से काँप रहे थे और होंठ लाल होकर तप रहे थे ) वे कई दिन से बीमार हैं और उन्हें इस वक़्त मेरी ज़रूरत है | मैंने तुम्हें उनकी तबियत के बारे में पहले इसलिए नहीं बताया ताकि तुम्हारी पढ़ाई में डिस्टर्ब न हो | .....खैर, ....होप सो ! .....तुम समझोगे | .....और वैसे भी बेटा, एन्जॉय योर फ्रीडम ! ....लव यू टू ....बाय |”
       “हैल्लो !! मॉम, .....मेरे फ्रेंड्स, हैल्लो....!! हैल्लो....!!
.........फ़ोन कट चुका था |       
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 -रश्मि