मंगलवार, 11 नवंबर 2014

रिसते रिश्ते

टूटे घरों से

सब रिस जाता है

हर रिश्ता

रिस जाता है

प्यार रिस जाता है

दरारें आ जाती हैं इतनी

कहाँ कुछ टिक पता है

हर दर्द, हर आह

दरारों को

और भी गहरा बनता है

पहले इन दरारों से

कुछ आवाजें रिसती हैं

फिर दर्द और कराहें रिसती हैं

जब सब चुक जाता है

तब

सन्नाटे रिसते हैं

धीरे-धीरे ये दरारें

बड़ी और बड़ी होती जाती हैं

और आखिर एक दिन

दरारों वाली ये दीवारें

ढह जातीं हैं

वे  दीवारें

जो कभी जगमगातीं थीं

उन पर टंगी

अरमानों की लाशें

थोड़ा तड़पतीं हैं

और छटपटातीं हैं

फिर लाचार वे भी

दम तोड़ जाती हैं

_ रश्मि
***********************

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें