मंगलवार, 4 नवंबर 2014

सूखे पत्ते

हरे-हरे पत्ते 
जिनसे सजती है टहनियाँ
फिर ये ही पत्ते 
सूखकर टूटकर बिखर जाते हैं | 
टूटे पत्तों का गिरना धरा पर 
है मात्र एक प्रक्रिया 
या षडयंत्र रचती हैं टहनियां |
इन सूखे निर्जीव पत्तों से 
नहीं चाहती दिखना वे बेजान 
फिर ये तोड़े जाते हैं ...
अलग किये जाते है 
....या किंचित 
लाचार पत्ते स्वयं ही अलग हो जाते हैं |
क्योंकि....
अब ये कोमल नहीं 
सूखने लगे हैं इनके किनारे 
और
ये मुरझाए से वृद्ध पत्ते 
बोझ बन गए हैं युवा टहनियों पर 
बदरंग कर रहे हैं इनको |
टहनियों का भी क्या दोष 
वे भी कब तक झेलती इन्हें 
मौसम की तरह उन्हें भी तो बदलना है
टहनियों की ही तरह शक्ति-संपन्न लोग 
नकार देते है उन्हें
जो नि:शक्त है, विपन्न हैं  
सूखे पत्तों की तरह......

--------------------------------रश्मि 

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