हरे-हरे
पत्ते
जिनसे
सजती है टहनियाँ
फिर
ये ही पत्ते
सूखकर
टूटकर बिखर जाते हैं |
टूटे
पत्तों का गिरना धरा पर
है
मात्र एक प्रक्रिया
या
षडयंत्र रचती हैं टहनियां |
इन
सूखे निर्जीव पत्तों से
नहीं
चाहती दिखना वे बेजान
फिर
ये तोड़े जाते हैं ...
अलग
किये जाते है
....या
किंचित
लाचार
पत्ते स्वयं ही अलग हो जाते हैं |
क्योंकि....
अब
ये कोमल नहीं
सूखने
लगे हैं इनके किनारे
और
ये
मुरझाए से वृद्ध पत्ते
बोझ
बन गए हैं युवा टहनियों पर
बदरंग
कर रहे हैं इनको |
टहनियों
का भी क्या दोष
वे
भी कब तक झेलती इन्हें
मौसम
की तरह उन्हें भी तो बदलना है |
टहनियों
की ही तरह शक्ति-संपन्न लोग
नकार
देते है उन्हें
जो
नि:शक्त है, विपन्न
हैं
सूखे
पत्तों की तरह......
--------------------------------रश्मि
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें