मित्रों ! क्या वाकई किसी एक
भाषा को ऊपर उठाने के लिए अन्य भाषाओं को नीचे गिराना ज़रूरी है ? क्या वाकई अपनी
मातृभाषा को अपमानित करके की अंग्रेजी भाषा में महारत हासिल की जा सकती है ? यदि
कोई बच्चा गणित के साथ विज्ञान सीख सकता है तो हिंदी के साथ अंग्रेजी क्यों नहीं
सीख सकता? मैंने जब से होश संभाला है तब से यही देखती आ रही हूँ कि हमारे देश के अधिकतम
लोग धर्म और भाषा के नाम पर बँटे हुए हैं | अंग्रेजियत के रंग में रंगे कुछ लोग
हिंदी का सिरे से बहिष्कार करते हैं | उनके परिवारों में हिंदी किसी संक्रमण के समान
बैन है....उसका प्रवेश निषेध है | उनका मानना है कि यदि उनका बच्चा हिंदी बोलेगा तो
घटिया भाषा बोलना जल्दी सीख जाएगा, गोया सारी गालियाँ हिंदी की ही देन हों...
अंग्रेजी में तो कोई क्रिएटिव व्यक्ति है ही नहीं जो गालियाँ बनाना जानता हो !
मानों अंग्रेजी भाषा तो छन्ने से छान छानकर बनाई गई हो | अंग्रेजों को भी अपनी
भाषा पर इतना लाड़ न आता होगा जितना हमने इसे सर पर चढ़ा रखा है |
हाल ही में एक प्रतिष्ठित
व्यक्ति के मुँह से यह सुना कि, “हमारे बच्चों को इंग्लिश में ही बात करनी चाहिए
और यदि इंग्लिश को प्रमोट करना हो तो हिंदी में बोलने वालों को अम्बैरस (शर्मिंदा)
करना शुरू कर दो |” मन क्षुब्ध हो उठा | हम सब भारतीय हैं, इस देश की नागरिकता और
अधिकारों का उपयोग करते हैं, इसकी मिटटी में पैदा हुए, हमारे बुजुर्गों ने हमारे
पैदा होने पर हमारे कान में सबसे पहले इसी भाषा में कुछ बुदबुदाया था | हमें इसी
भाषा में आशीर्वाद मिले | फिर भला क्यों हम अपनी ही धरती और अपनी ही भाषा का
सम्मान नहीं कर पा रहे ! जश्न हमारे घर है और हम गीत दूसरों के गा रहे हैं! अपनी
भाषा से प्रेम कीजिए | हर भाषा में अपनेपन की मिठास होती है वो उसकी संतानों को ही
महसूस होती है | बिलकुल वैसे ही जैसे सभी माताएँ अच्छी होतीं हैं लेकिन हमें अपनी
माँ दुनिया की सबसे प्यारी महिला लगतीं हैं | जो अपनी माँ से स्नेह नहीं कर सकता
वो किसी से भी प्यार नहीं कर सकता |
किसी भी विदेशी भाषा का
ज्ञान होना अच्छी बात है किन्तु उसका नशा सवार हो जाना गलत है | हर किसी की अपनी
अहमियत होती है और हमें उस अहमियत का सम्मान करना चाहिए | सम्मान के इसी सिद्धांत
को अपनाते हुए हमें दूसरों की भाषा के सम्मान के साथ-साथ अपनी भाषा पर भी गर्व
करना चाहिए | जब मैं छोटी थी तब मेरे पिता मुझे मेरी अपनी खुद की अहमियत समझाने के
लिए कागज़ पर दो छोटी बड़ी लकीरें खींच कर कहते कि, “ये छोटी वाली लकीर तुम हो | और
वो बड़ी वाली कोई और | अब ये तुम्हारी मर्ज़ी है कि उस बड़ी लकीर को मेहनत लगाकर ज़ोर
ज़ोर से घिसना शुरू कर दो ताकि वो तुमसे छोटी हो जाए या फिर अपनी मेहनत से अपनी वाली
लकीर को खूब लम्बा कर लो ताकि वो लकीर छोटी नज़र आने लगे |” मित्रों ! तभी मुझे
पापा की ये बात समझ आ गई थी कि मेरे पास भी मेरी अपनी क्षमताएँ हैं, अनूठी
शक्तियाँ हैं, तेज दिमाग है | मैं चाहूँ तो अपनी इन सभी शक्तियों को दूसरों की निंदा
करने में, कामयाब व्यक्तियों से ईर्ष्या करने में लगाकर बर्बाद कर दूँ या अपनी
इन्हीं शक्तियों को एकजुट करके इतनी रचनात्मक बन जाऊँ कि सभी को हँसती-खिलखिलाती
एक लम्बी लकीर-सी नज़र आने लगूं |
मित्रों ! विध्वंस के मार्ग
से विकास का मार्ग कहीं ज्यादा उचित है, नफरत की राह से प्यार की राह कहीं ज्यादा
आसान है, अपमान के बोल से सम्मान के बोल कहीं ज्यादा सरस हैं | हर चीज़ का सम्मान
करिए, सबसे स्नेह करिए | अपनी हिंदी भाषा को बोलने में शर्म नहीं बल्कि गौरव का
अनुभव कीजिए | अंग्रेजी को एक भाषा की तरह सीखिए किन्तु उसे खुद पर हावी मत होने
दीजिए | अपने बच्चों को भी अपनी भाषा और संस्कृति से दूर मत कीजिए, वर्ना उनके
व्यक्तित्व का विकास रुक जाएगा क्योंकि कोई भी विकास एकतरफा नहीं बल्कि चौतरफा
होना चाहिए तभी सही मायनों में विकास है | है न ? – आपकी रश्मि
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