‘पढ़ने की कोई उम्र नहीं
होती और सीख का कोई अंत नहीं’ - ये बात हम बचपन से सुनते आ रहे हैं लेकिन इसका
साक्षात् प्रमाण मैंने पिछले दिनों देखा | आप सभी के साथ साझा करना चाहती हूँ ताकि
इस कहानी से मेरी नई जनरेशन परिस्थितियों से लड़ना और हर हाल में खुद को साबित करना
सीखे |
हुआ कुछ यूँ कि मैं जिस संस्थान
में पढ़ाती हूँ वहाँ एक फिजिक्स अटेंडेंट को नौकरी पर रखा गया | अटेंडेंट का काम
होता है- फिजिक्स लैब की सफाई, रख-रखाव, टीचर्स की सहायता, बच्चों को उपकरण वगैरह
देना आदि | इस काम के लिए भी समझदार व्यक्ति की ही ज़रूरत होती है क्योंकि लैब में
तरह-तरह के कैमिकल मौजूद होते हैं |
किस्सा ये है कि जब हमने उस
नए अटेंडेंट को देखा तो हम सभी चौंक गए क्योंकि वह लड़का कुछ समय पहले इसी संस्थान
में साफ़-सफाई का काम किया करता था | वह सफाई-कर्मचारी के पद पर था | डंडे का एक
लम्बा-सा पोंछा लिए सफाई करता रहता था | उसके इस बदले पद और चेहरे से झलकते आत्मविश्वास
को देखकर मुझे उससे बात करने की इच्छा हुई | मैंने छुट्टी के बाद उसे स्टाफ-रूम
में बुलाया और उसके साथ बात करने लगी | मैंने इस बदलाव के विषय में पूछा तो उसने
बताया – “मैडम मैं बहुत ही गरीब घर का लड़का हूँ | मेरी माँ घरों में सफाई-बर्तन का
काम करती है और पिता दिहाड़ी मजदूर थे | कुछ दिन पहले ही मेरे पिता टीबी की बीमारी
से मर गए | जब तक वे जिंदा रहे, हम पाँच भाई-बहनों को जैसे-तैसे पढ़ाते रहे | वे
नहीं चाहते थे कि हम उनकी तरह ज़िन्दगी गुजारें | ...लेकिन मैडम हम गरीब लोग पढ़ें
कि भूख मिटाएँ ! घर में मैं ही बड़ा था इसलिए पिता के बीमार पड़ जाने के कारण मुझे
यहाँ सफाई का काम करना पड़ा | पहले तो मैं ये भी नहीं जानता था कि जिस कमरे में मैं
सफाई करता हूँ, उसे लैब कहते हैं | मैं जब भी वहाँ सफाई करने जाता तो सारे पढने
वाले बच्चों को ध्यान से देखता | मेरा भी जी करता कि उनकी तरह झक्क साफ कपड़े पहनूं
और गिट-पिट बोलूं | मैं हर चीज़ ध्यान से देखता | अगर कोई भैयाजी या दीदीजी अपनी
किताब कॉपी भूल जाते तो उसके पन्ने पलटता, उन्हें पढ़ने की कोशिश करता | कभी-कभी तो
किसी-किसी भैयाजी और दीदीजी से उनकी किताब पर बनी फोटुओं के बारे में पूछने लगता, जानना
चाहता | कोई-कोई भैया प्यार से बता देते, कोई-कोई डांट के भगा देते | एक बार एक
भैयाजी बोले – “सुनो राजू ! मैंने ध्यान दिया है कि तुम्हें पढ़ने का बहुत शौक है |
मेरा यहाँ आखिरी साल है, फिर मैं यहाँ से पास होकर चला जाऊँगा| इसलिए यदि तुम
चाहो तो मेरी सारी किताबें और कॉपियाँ तुम ले लेना |” मैडम ! बाद में वे भैयाजी
अपना पूरा बस्ता मुझे दे गए | मुझे तो जैसे खजाना मिल गया | दिन भर यहाँ काम करता
और शाम के बाद उन किताबों के पन्ने पलटता रहता | एक दिन एक कॉपी में भैयाजी का फ़ोन
नंबर लिखा देखा | मैंने भैयाजी से कहा कि मुझे आपसे मिलना है | फिर मैं उनसे मिलने
उनके घर पहुँचा, तब मुझे पता चला कि उनके पिताजी एक बड़े डॉक्टर हैं | डॉक्टर साहब
भी मुझसे मिले और बहुत खुश हुए | उन्होंने भैयाजी से कहा कि, ‘मुझे लगता है कि यह
लड़का पढ़ना चाहता है और इसमें काबलियत भी है | तुम इसे हफ्ते में दो-एक बार पढ़ा
दिया करो, अगर यह ठीक-ठाक सीख गया तो मैं इसे अपने क्लिनिक में रख लूँगा|’ मैडम !
मैं उन भैयाजी की बदौलत ही आज यहाँ पर हूँ |”
“तो तुमने उनके पिता के
क्लिनिक में ही नौकरी क्यों नहीं की ?” मैंने आश्चर्य से पूछा |
“जब मैं यहाँ से चला गया
था, तब उन्हीं के क्लिनिक में ही रहा था | दिनभर बाबूजी के साथ हाथ बंटाता और जब-जब
मौका लगता भैयाजी मुझे पढ़ा देते | ऐसे मैं दो साल प्राइवेट पढ़ता रहा | ...फिर एक
दिन अखबार में यहाँ की नौकरी निकली | भैयाजी और बाबूजी ने समझाया- ‘बेटा, हमारे
पास तुम्हारी नौकरी पक्की नहीं है | तुम हमारे बेटे जैसे हो, हम तुम्हें कभी
निकालेंगे नहीं लेकिन जरा सोचो वहाँ की नौकरी सरकारी और पक्की है | तुम दिन में
काम भी कर सकते हो और शाम के बाद अपने भाई-बहनों का भी ध्यान रख सकते हो |’ मैडम
जी मुझे उनकी बात समझ में आ गई और मैंने यहाँ का फारम भर दिया | ...और आप सबके पास
फिर से आ गया |”
“तुम्हारी माँ कैसी है ?”
उसका चेहरा खिल रहा था | वह
बोला- “उन्हें मैंने मशीन दिलवा दी है और कहा है कि अब घर पर ही सिलाई का काम शुरू
करो, दूसरों के घर झाड़ू-पोंछा करने की जरुरत नहीं है | मैडम जी, अब मेरा छोटा वाला
भाई बाबूजी की क्लिनिक में काम संभाल रहा है | उन देवता जैसे लोगों की वजह से ही
हमारी ज़िन्दगी सँवर गई |”
उसकी कहानी सुनकर मुझे उसे सलामी देने को जी चाहा | मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराई | ...फिर अपने घर चल दी | ...लेकिन रास्ते भर सोचती रही कि जीवन को प्रेरणा देने वाले लोग बड़ी-बड़ी किताबों में ही नहीं बल्कि हमारे आस-पास भी मिल जाते हैं | यदि किसी को लगन और आत्मविश्वास का पाठ सीखना हो तो इस इंसान से भी सीख सकता है| है न ? – आपकी रश्मि
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