मित्रों ! रिश्तों पर लिखना
मतलब बहते पानी पर लिखना, हवा पर तैरती सुगंध पर लिखना, चिड़िया के फड़फड़ाते पंखों
पर लिखना | ....हम सभी लोग इन पर लिखना चाहते हैं और लिखते भी हैं लेकिन कभी आधा, कभी
अधूरा.... पूरा नहीं लिख पाते | रिश्ते कभी थमें तब तो हम लिखें, यही सोचकर इंतज़ार
करते रह जाते हैं | उनके थमने का इंतज़ार न करें, खुद ही आगे बढ़ें और उन्हें हर हाल
में सहेज लें, समेट लें | क्योंकि रिश्ते नर्मी चाहते हैं...स्नेह की गर्मी चाहते
हैं |
संसार में आँख खोलने के साथ
ही हम अपने आस-पास जो बिखरा पाते हैं....महकता पाते हैं, वो रिश्ते ही हैं |
जैसे-जैसे हम इन रिश्तों को आत्मसात करते जाते हैं, वैसे-वैसे ही ये हमारे
इर्द-गिर्द सुन्दर जाल के समान बिखरने लगते हैं | अक्सर ऐसा भी होता है कि हम
इनमें से कुछ रिश्तों के साथ बेहद सुरक्षा, समर्पण और लगाव महसूस करते हैं | हमें
उन्हीं के साथ खेलना-खिलखिलाना, हँसना-बतियाना अच्छा लगता है | ....जबकि कुछ
रिश्ते हमें नापसंद होते हैं, उनके बीच से स्नेह की महक नहीं उठती | अक्सर वे हमें
जंजीरों की तरह जकड़ने लगते हैं | हम उनके साथ छटपटाते हैं, बिलखते हैं, कसमसाते
हैं लेकिन उनके बंधन झटक कर उनसे बाहर नहीं निकल पाते |
यूँ ही बातों-बातों में
मेरी एक मित्र ने बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही कि, ‘हमें रिश्तों को भी अपने कपड़ों
की अलमारी की तरह सजा लेना चाहिए |’ .....ठीक हो तो कहा उन्होंने | बेहद बेकार निरर्थक
फटा पुराना रिश्ता जिसे आपने सालों से हाथ नहीं लगाया उसे निकाल कर फेंक देना
चाहिए | फिर इसके बाद बाकी के रिश्तों को बारी-बारी बड़ी कोमलता से अपने जीवन की अलमारी
में सहेजना चाहिए | आप सोच रहे होंगे कि, ‘वो कैसे ?’.....वो ऐसे, जिस प्रकार हम
अपने कपड़ों को अपनी आवश्यकता के अनुसार अलमारी की अलग-अलग दराजों में जगह देते हैं,
उसी प्रकार इन्हें भी अपने जीवन की अलमारी में जमाते जाना चाहिए | जो रिश्ते हर
रोज़ महकते हों.... जो हमें ख़ुशी देते हों, उन्हें सामने की दराज में जमा लेना चाहिए
| अब वे रिश्ते जो आदरणीय हैं, जिन्हें हम सम्मान देते हों, जिनसे जीना सीखते हों,
उन्हें ऊपर के खाने में रखें | इसके बाद उन रिश्तों को जो बार-बार खटकते हों, जिनके
रंग बिगड़ चुके हों, जिनमें रोएँ चुभते हों, जिन्हें हम ओढ़ना ही न चाहते हों लेकिन
वो किसी न किसी वजह से हमारे हैं क्योंकि किसी अपने की ही सौगात हैं, किसी अपने के
द्वारा ही मिले हैं, उन्हें फेंकें नहीं बल्कि अलमारी के नीचे के खाने में बड़े
प्यार से जमा दें क्योंकि कहीं न कहीं ये भी अपनी अहमियत रखते हैं | बस फर्क इतना
है कि ये रिश्ते बार-बार हमारे सामने आ जाते हैं और हम इनसे विचलित हो जाते हैं |
इन्हें महत्त्व न दें| इन्हें जब देखें, मुस्कुरा कर देखें बस ! जब तक ज़रूरत न हो
इन्हें हाथ न लगाएँ | इस तरह से ये भी हमारे जीवन की अलमारी में सुन्दरता से सजे
रहेंगे | ये आँखों को इसीलिए अखर रहे थे क्योंकि पहले ये बड़ी बेतरतीबी से बिखरे
हुए थे |
आखिर में सबसे ज़रूरी बात !
वे रिश्ते जो किसी ग़लतफ़हमी की वजह से उधड़ गए हों... किसी उलझाव के कारण जिनकी धागे
निकल आए हों.... किसी उपेक्षा के चलते बटन टूट गए हों ....उन्हें अपने दोनों हाथों
से उठाएँ, सीने से सटाएँ और इन्हें कुछ देर के लिए अपने साथ रखें... अपने नर्म
पोरों का स्नेह दें| इन्हें सुई धागे से सँवारें... इनके सीम बंद करें.... प्यार
के बटन लगाएँ क्योंकि ये रिश्ते हमारे जीवन की अलमारी के लिए बेहद ज़रूरी हैं | हैं
न ? – आपकी रश्मि
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