शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

जब मंजिलें पड़ाव बन जातीं हैं


आप सोच रहे होंगे कि ये तो उल्टी बात है ! भला मंजिलें भी कभी पड़ाव हुआ करतीं हैं! इन मंजिलों को ही तो पाने के लिए हम सब इतनी भाग-दौड़, आफत किए रहते हैं ! हम अक्सर सुनते हैं कि, ‘हर जीवन में अपनी एक मंजिल होनी चाहिए’ ‘हमें हमेशा अपने मकसद को पूरा करना चाहिए’ ‘हमें अपना मुकाम हासिल करने के लिए जुट जाना चाहिए’ आदि आदि | हमें अपने बड़ों से ये सब अक्सर सुनने को मिलता रहता है और हम अपने से छोटों को अमूमन हर रोज़ ऐसी ही सलाह देते हैं |

किन्तु ज़रा ध्यान दीजिए – क्या वाकई कोई मंजिल होती है ? क्या वाकई कोई ऐसा मुकाम है जहाँ जाकर हमारी सारी कोशिशें ख़त्म हो जातीं हैं ? मैंने तो ऐसा नहीं पाया | आप भी ध्यान दीजिए | मैंने तो यही पाया है कि हम सभी के जीवन में अनेक रास्ते होते हैं और हम अपने लिए एक मंजिल तय कर लेते हैं | फिर हम उस तयशुदा मंजिल को पाने के लिए किसी एक रास्ते पर चल देते हैं | ये रास्ता कहीं-कहीं पर ऊबड़-खाबड़ है, झाड़-झंखाड़ और काँटों से भरा है, पैरों के तलवों में चुभता है और उन्हें छील-छील देता है | कभी-कभी यही रास्ता पैरों तले हरी मखमली कालीन बिछा देता है | हम पल भर को चिड़ियों की चहक में, सागर से गीली हो आई नर्म-मुलायम रेत में आनन्द लेते हुए आगे की ओर बढ़ने लगते हैं | (अक्सर कुछ लोग इन रास्तों की चुभन या नरमी में अपनी मंजिल को भूलकर रास्ते से भटक भी जाते हैं) ...ख़ैर....यह रास्ता निरंतर आगे को बढ़ता रहता है, हम चलते जाते हैं, बिना थमे आगे बढ़ते जाते हैं | कभी-कभी पीछे मुड़कर देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि ‘हम अपनी मंजिल को पाने के लिए इतना लम्बा सफर तय करके कितने आगे तक निकल आए हैं !’

तभी हमें सामने अपनी मंजिल करीब नज़र आने लगती है और हम उस ओर बेतहाशा दौड़ पड़ते हैं | अब पैरों के तले काँटे आ रहे हैं कि दूब बिछ रही है, कोई फर्क नहीं पड़ता...एहसास ही नहीं रहता क्योंकि निगाह सिर्फ मंजिल पर है | क्योंकि इसी के लिए ही तो यहाँ तक आए थे | ...और अंतत: हम अपनी मंजिल तक पहुँच जाते हैं | कुछ देर का ठहराव....असीम आराम....हम यहाँ बैठ जाते हैं | ‘बस ! यही तो पाना चाह रहे थे’ ऐसा सोचकर वहीँ ठहर जाते हैं | लेकिन आश्चर्य ! कुछ ही देर बीती थी कि फिर इधर-उधर निगाह दौड़ाते हैं | किसी और दिशा में देखने लगते हैं | फिर अनेक राहें नज़र आने लगतीं हैं...ये राहें भी आकर्षित करने लगतीं हैं...एक और मकसद दिखने लगता है | ज़रा से देर के आराम के बाद ही हम फिर उठ खड़े होते हैं और अब उस नई दिशा में दौड़ लगा देते हैं ......अब ये पाना है ....अब यहाँ पहुँचना है | इसी तरह पूरे जीवन अनेक रास्तों पर चलते-चलते अनेक पड़ावों पर अपने निशान छोड़ते जाते हैं | ये वही पड़ाव हैं जिन्हें हम दूर से मंजिल समझ रहे थे | .....और अंततः ऐसे ही किसी पड़ाव पर थक कर हमेशा-हमेशा के लिए सो जाते हैं |

मित्रों ! जीवन में रास्ते होते हैं, पड़ाव होते हैं, ठहराव होते हैं लेकिन मंजिल कभी नहीं होती | जहाँ सफर ख़त्म हो जाए वहीँ मंजिल है, किन्तु ऐसा कभी नहीं होता और एक के बाद दूसरी राह मिलती ही रहती है ....चुनौतियाँ आती ही रहतीं हैं | जो जीवन मिला है वो बड़ा ही खूबसूरत है | अपना रास्ता चुन लीजिए और चल दीजिये | फिर चाहें काँटे आएँ या दूब रुकियेगा मत | - आपकी रश्मि   

         

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