आत्मनिर्भर बनें
स्वावलंबन अर्थात् आत्मनिर्भरता | आत्मनिर्भरता जीवन का सबसे सुन्दर ध्येय है | इस संसार में आने के बाद से ही बालक स्वावलंबी बनने की चेष्टा शुरू कर देता है | उसके जीवन में आने वाला हर व्यक्ति, हर घटना उसे आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती है | छोटे बालाक की माँ उसे अपने स्नेह की भरपूर छाया तो देती ही है किन्तु धीरे-धीरे अपने काम खुद करने के लिए भी प्रेरित करती है | बड़े होने पर घर के अन्य सदस्य और स्कूल के सहपाठी व शिक्षक भी आत्मनिर्भर बनने की ही सीख देते हैं | शिक्षा का उद्देश्य भी आत्मनिर्भर बनना ही है | मात्र किताबी ज्ञान ले लेने से या अच्छे अंक हासिल कर लेने से न तो आत्मनिर्भरता आती है और न ही व्यक्तित्व का विकास होता है | मनुष्य को स्वजीवी होना चाहिए परजीवी होने से जीवन अवरुद्ध हो जाता है | अधिक रुपया पैसा जीवन के सभी सुख दिला सकता है किन्तु ज़रा भी विपरीत हालात हो जाने पर उनसे निबटने का हौसला नहीं दिला सकता | ऐसे में अपना हुनर ही काम आता है | अक्सर जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आ जातीं हैं जब कोई भी सेवक हमारे काम करने के लिए हमारे पास नहीं होता, ऐसे में आत्मनिर्भर मनुष्य स्वयं ही अपने काम बड़ी आसानी से कर लेता है |
एक वाकया है - कलकत्ता के रेलवे स्टेशन पर एक नवयुवक गाड़ी से उतरते ही ‘कुली कुली’ चिल्लाने लगा | हालाँकि उसके पास ज्यादा सामान नहीं था | जितना भी सामान था, उसे वह खुद भी ढो सकता था | किन्तु अपना सामन उठाना उसकी आदत में शुमार न रहा होगा | एक सज्जन जो सादी वेशभूषा में थे, उसके पास आए और बोले - “तुम्हें कहाँ जाना है ? मैं ले चलता हूँ |’’ वह नवयुवक किसी अन्य शहर से वहाँ पढ़ने के लिए आया था | उसने जगह का नाम बताया | वे उस युवक को सामान के साथ उस संस्थान में ले गए, जहाँ उसे जाना था | जब वे सज्जन सामान रखकर जाने लगे तो उस युवक ने उन्हें ईनाम देना चाहा किन्तु उन सज्जन व्यक्ति ने इनाम लेने से मना कर दिया फिर बोले - ‘‘तुम वादा करो कि भविष्य में अपना काम खुद करोगे, बस यही मेरा ईनाम है | इतना कहकर वह सज्जन चले गए | अगले रोज वह विद्यार्थी विद्यालय पहुँचा तो उसने देखा कि वे सज्जन जो कल उसका सामान उठा कर लाए थे, प्रधानाचार्य की कुर्सी पर विराजमान हैं | युवक उन्हें देख कर शर्मिंदा हो उठा | उसने उनसे माफ़ी माँगी और हमेशा अपना काम खुद करने का वादा किया | वे सज्जन प्रख्यात विद्वान् डॉ. ईश्वरचन्द विद्यासागर थे |
इसी प्रकार हम सभी को अपने काम स्वयं करने चाहिए | यदि हम अपने काम खुद करेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ी भी हमें देखकर स्वावलंबन का पाठ सीखेगी | धन से वस्तुएँ तो खरीदी जा सकती हैं किन्तु किसी की निष्ठा, स्नेह या भावनाएं नहीं खरीदी जा सकतीं | इसलिए यह सोचना कि ‘हमारे पास बहुत धन है अतः हमें कोई कार्य सीखने की या करने की क्या आवश्यकता है’ गलत है | आत्मनिर्भरता वो सबसे बड़ा धन है जो हर परिस्थिति के काम आता है |
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