मित्रों आज एक चर्चा में जाना हुआ |
यह एक साहित्यिक चर्चा थी और इसमें काव्य के विविध रूपों को
प्रस्तुत किया गया, विविध छंदों पर प्रकाश डाला गया |
इस चर्चा में लंका कांड को भी नाट्य प्रस्तुति दी गई | आप सोच रहे होंगे कि इसमें ख़ास बात क्या है ? मैंने
ये चर्चा आप सभी से क्यों कर रही हूँ ? दरअसल जब लंका कांड
का मंचन चल रहा था तो
मैं उस दौरान यह सोच रही थी कि –
क्या कारण है कि हमारा समाज रावण जैसे ज्ञानी
व्यक्ति को सम्मान नहीं देता !
क्या कारण है कि रावण बलवान होते हुए भी हर
साल जलाया जाता है !
क्या कारण है कि सूर्पनखा की खातिर इतना बड़ा
युद्ध रच देने वाले भाई के जैसा भाई कोई भी बहन नहीं चाहती !
कहा जाता है कि मंदोदरी स्वयं बहुत ज्ञानी
थीं |
शतरंज के खेल की शुरुआत उन्हींने ही की थी | रावण
के साथ वे इन खेल को खेला करतीं थीं किन्तु फिर भी कोई स्त्री अपने लिए रावण जैसा पति
नहीं चाहती !
रावण अपने भाइयों और बेटों से स्नेह करता था,
बावजूद इसके कोई भी रावण-सा भाई या पिता नहीं चाहता !
रावण सोने की लंका का मालिक था,
अपार संपदा का स्वामी, तब भी कोई जनता रावण
जैसा शासक नहीं चाहती !
मित्रों ! यदि रावण के चरित्र को ध्यान से
देखा जाए तो वह भी एक साधारण इंसान-सा ही दिखता है | लेकिन हम
हर बार रावण का मुक़ाबला श्री रामजी से करके उसके अवगुणों को और भी महिमामंडित करते
हैं | जितनी बुराइयाँ रावण में थीं उतनी ही बुराइयाँ हम सब
में भी मौजूद हैं | फिर क्या कारण है कि हम अपने भीतर के
रावण को कभी नहीं मारते किन्तु उसके प्रतीक को हर साल फूँक डालते हैं | हमें रावण के चरित्र का मूल्यांकन आधुनिक दृष्टि से करना होगा | हमारा समाज रावण जैसे ज्ञानी व्यक्ति को सम्मान इसलिए नहीं देता क्योंकि
रावण का ज्ञान समाज के लिए कल्याण का काम नहीं कर रहा था | उसका
अपार ज्ञान अभिमान की भेंट चढ़ गया था | यदि ज्ञान का विस्तार
न किया जाए तो वह सिमट कर रह जाता है | किसी का कल्याण नहीं
कर पाता| इसीलिए हमें रावण के चरित्र से यह सीख लेनी चाहिए
कि कभी अपने ज्ञान पर अभिमान न करें | अपना ज्ञान अगली पीढ़ी
तक ज़रूर पहुँचाना चाहिए | रावण बलवान होते हुए भी हर साल
जलाया जाता है और हमें यह संकेत दे जाता है कि चाहे जितने भी बलवान या सामर्थ्यवान
बन जाओ किन्तु जीवन का अंत जरुर होना है | और उस वक्त कुछ भी
हमारे साथ नहीं जा सकता | स्त्रियाँ कभी रावण-सा भाई या पति
इसलिए नहीं चाहतीं क्योंकि रावण ने पराई स्त्री का अपमान किया था | स्त्रियाँ समाज का आधा महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनका सम्मान पुरुषत्व का
सम्मान है अर्थात पूरे समाज के लिए सम्मानजनक | रावण अपने
बेटे और भाइयों से स्नेह तो करता रहा किन्तु वह उन्हें जीने का सही ढंग सिखाना भूल
गया | वह अपनी अगली जनरेशन को अच्छे संस्कार देना भूल गया |
रावण एक योग्य शासक की तरह अपने नागरिकों के भीतर के पशुत्व को
समाप्त नहीं कर पाया | अन्य राजा के संधि प्रस्तावों को
स्वीकार नहीं कर पाया |
कुल मिलाकर यदि हम देखें तो वाल्मीकि या
तुलसीदास द्वारा निर्मित यह चरित्र कभी अपने अभिमान से बाहर नहीं निकल पाया और यही
अभिमान उसे अपने हर करीबी से दूर ले गया| अत्यंत ज्ञानी रावण भी
अभिमान के चलते समूल मिटा दिया गया |
इसीलिए बार-बार लंका के रावण को जलाने की
बजाए एक बार अपने भीतर के रावण को जला दें | बार-बार लंकेश से नफरत करने
की बजाए एक बार अपने भीतर की लंका को जलाकर नष्ट कर दें | बार-बार
दशानन का सर कलम करने की बजाए एक बार अपने भीतर सर उठाने वाली नफरत और घमंड की बेल
को समूल काट कर फेंक दें | एक बार ज़रूर सोचें कि क्यों हम
बार-बार रावण से ही नफरत करते हैं लेकिन अपने आप से नहीं! हम उसकी बुराइयाँ खोद
खोदकर कर निकालते हैं लेकिन अपनी पालते चले जाते हैं ! बार-बार लगातर लंका के रावण
को मार चुके चलिए इस बार अपने भीतर के रावण को मारकर देखें | - आपकी रश्मि
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