जीवन गतिशीलता का ही दूसरा नाम है | जीवट मनुष्य सदैव गतिशील रहते हैं | रास्ते की मुश्किलें उनके लिए कभी-भी बाधा नहीं बन पातीं | मनुष्य के लिए ये आवश्यक है कि वह अपने लक्ष्यों को पाने के लिए उचित राह पर चले | रास्ते में मिलने वालीं छोटीं-छोटीं सफलताएं कभी भी ‘लक्ष्य’ नहीं होतीं, वे तो पड़ाव मात्र होतीं हैं | मनुष्य को अपनी राह पर चलते हुए थककर या संतुष्ट होकर नहीं बैठना चाहिए इससे महत्वाकांक्षाएं बाधित होती हैं | ऐसा मनुष्य कभी भी इतिहास नहीं रच सकता | यदि हम बड़े-बड़े महापुरुषों की जीवनी पढ़ें तो जानेंगें कि उनका जीवन गतिशीलता, कर्मठता और संघर्षों से भरा रहा है, उन्होंने कभी भी छोटी-छोटी बाधाओं से हार नहीं मानी | साहसी व्यक्ति तो ऐसी छोटी-छोटी बाधाओं को चुनौती के रूप में लेते हैं और दुगुने उत्साह से आगे की और बढ़ने लगते हैं | साथ ही साथ वे छोटी-छोटी उपलब्धियों को हासिल करके अपनी पीठ नहीं थपथपाते बल्कि अपनी अपनी गति को और बढ़ा देते हैं |
एक संत अपनी भक्ति और विद्वता के लिए बहुत विख्यात थे | लोग दूर-दूर से उनके दर्शनों के लिए आया करते थे | एक बार उनके पास एक लकड़हारा आया चरणों में बैठ गया | संत बहुत ज्ञानी थे अतः उसके मन की बात जान गए | किन्तु फिर भी उन्होंने अनजान बनते हुए पूछा – “तुम कहाँ से आए हो और क्या काम करते हो ?”
वह व्यक्ति बोला – “गुरुदेव ! पास के ही गाँव में रहता हूँ और लकड़ियाँ काटकर शहर ले जाकर बेचता हूँ, उसी से पूरे परिवार का गुज़ारा चलता है |”
संत ने पूछा –“ कहाँ काटते हो लकड़ी ?”
लकड़हारा बोला – “पास वाले जंगल में |”
संत ने कहा – “थोड़ा और आगे बढ़ो |” अगले दिन जब लकड़हारा लकड़ी काटने जंगल पहुंचा तो उसे संत की बात याद आ गई और वह जंगल के थोड़ा और भीतर पहुँचा | वहाँ उसे चन्दन के पेड़ मिले | कुछ दिनों के बाद वह फिर से संत के दर्शनों के लिए पहुँचा |
संत उसे देखते ही पहचान गए और हालचाल पूछने लगे - “अब भी उसी जंगल में लकड़ी काटते हो?”
वह बोला – “जी गुरुदेव |”
संत से इस बार भी कहा – “....तो थोड़ा और आगे बढ़ो |” अगले दिन वह लकड़हारा और भीतर पहुँच गया तो उसने देखा कि वहां चाँदी की खान हैं | वह बड़ा प्रसन्न हुआ और दौड़ा-दौड़ा संत के चरणों मे पहुँचा |
संत अन्तर्यामी थे, सारी बात जानते थे इसलिए मुस्कुराकर बोले-“......और आगे-आगे बढ़ते रहो |”
उस लकड़हारे ने संत की बात गाँठ बाँध ली और धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ता रहा | उसे सोने की, फिर हीरे की खाने मिलने लगीं | इस प्रकार उसकी सारी दरिद्रता दूर हो गई और उसे आगे बढ़ते रहने का सन्देश मिला | यदि वह दूसरे या तीसरे कदम पर ही संतुष्ट होकर बैठ जाता तो उसे और उपलब्धियां कतई हासिल न होतीं | अतः मनुष्य को राह में आने वाली कठिनाइयों से घबराकर या छोटी-छोटी कामयाबियों से संतोष करके नहीं बैठ जाना चाहिए बल्कि निरंतर उत्साह और सकारात्मकता के साथ आगे की ओर बढ़ते रहना चाहिए |
- रश्मि
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