इस दुनिया में हर चीज़ अस्थाई है, कुछ भी हमेशा के लिए नहीं हैं, ये बात जानते हुए भी
व्यक्ति इस संसार की भूल-भुलैया में भटकता रहता है | वह अपने
जीवन में सब पा लेना चाहता है और इन्हीं चेष्टाओं में लगा रहता है | जीवन के सुख, वैभव, भोग,
विलास, लिप्सा, तृष्णा
आदि से कभी भी उसका जी नहीं भरता | यदि कभी-कभी उसे अपनी
गलतियों का एहसास होता भी है तो वह बहुत ही अल्पकालीन होता है | संसार के भोग विलास के चंगुल से आसानी से नहीं निकला जा सकता |
एक वाकया है – एक रईस था | वह हमेशा
ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने, जीवन को ऐश-ओ-आराम से युक्त
बनाने तथा विलासिताओं की ओर ही आकर्षित रहता था | लेकिन समय
के साथ-साथ उसे एहसास हुआ कि ‘मुझे भी अपना परमार्थ सुधारना
चाहिए | आखिर एक दिन मुझे भी यह सब छोड़ छाड़कर ईश्वर के घर
जाना है और मैंने अपने जीवन में इतने छल, कपट, अपराध किये हैं कि मुझे तो माफ़ी भी आसानी से नहीं मिल पाएगी |’ उसे अपने द्वारा किये गए बुरे कामों का पछतावा हो रहा था | वह एक धर्मगुरु के पास गया और बड़ी श्रद्धा से उनसे बोला – “गुरुदेव ! मैंने अपने जीवन में अनेक बुरे काम किये हैं | मैं एक व्यवसायी हूँ और मैंने अपने व्यवसाय को और बढाने के लिए अनेक गलत
तरीकों का प्रयोग किया | मैं मांस-मदिरा से भी खुद को दूर न
रख सका | सुरा और सुंदरी में ही जीवन का रस तलाशता रहा |
लेकिन अब मुझे बहुत पछतावा होता है | मैं सभी
बुराइयाँ छोड़ना चाहता हूँ | मेरा बेटा बड़ा हो रहा है और मैं
नहीं चाहता कि वह भी मुझे देखकर इन बुराइयों को खुद में उतार ले | किन्तु प्रभु मेरी समस्या ये है कि मैं इन कर्मों में इस हद तक लिप्त हो
चुका हूँ कि यदि मैं छोड़ना भी चाहता हूँ तो ये मुझे नहीं छोड़तीं | आप मेरी सहायता कीजिए |” गुरु मंद-मंद मुस्कुराते
हुए उस व्यक्ति की बातों को ध्यान से सुन रहे थे | उन्होंने
बड़े प्रेम से कहा- “ज़रा अपना हाथ तो दिखाओ |” व्यक्ति ने अपना हाथ गुरु को दिखाने के लिए उनकी ओर बढ़ा दिया | गुरु ने अपने चेहरे पर चिंता के भाव लाते हुए कहा- “अरे
! तुम्हारी तो उम्र ही बहुत कम बची है | तुम अगले चालीसवें
दिन इस संसार में विदा होने वाले हो | इतने कम समय में मैं
तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ! अब तो बेहतर यही होगा कि तुम अपने पुराने कामों
को ही निपटाना शुरू कर दो क्योंकि तुम्हारे पास जीने के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं
है |” वह व्यक्ति गुरु की बात सुनकर बहुत दुखी हुआ | अब वह अपने कारोबार का सभी हिसाब किताब ठीक-ठाक करने लगा | उसने जिसका भी धन रोका हुआ था वो सब देना शुरू कर दिया | अपने बेटे और पत्नी को भी भरपूर समय और स्नेह देने लगा | अपना अधिक से अधिक वक्त दूसरों की भलाई में गुज़ारने लगा | उसे बार बार यह अहसास रहता कि उसके पास अब ज्यादा वक्त नहीं है |
जब उनतालीसवां दिन आया तो उसने सोचा- ‘अब मेरे पास
एक ही दिन बचा है, तो क्यों न गुरु जी का भी आशीर्वाद ले आऊँ
| आखिरकार उन्होंने ही मुझे यह बताया है | यदि वे मुझे ऐसा न बताते तो मैं अपना इतना वक्त भी यूँ ही बर्बाद कर देता |’
इन उनतालीस दिनों में उसका जीवन पूरी तरह से बदल चुका था | अब वह एक नए रूप में अपने गुरु के समक्ष खड़ा था | उसने
गुरु को प्रणाम किया और कहा- “आपकी आज्ञानुसार मैंने अपने
सभी बुरे कामों को काफी हद तक सुधार लिया है | कल मैं इस
जीवन से मुक्त हो जाऊँगा अत: आज आपके दर्शनों के लिए आया हूँ |” गुरु ने उसे प्रेम से अपने नज़दीक बैठाया और समझाया- “तुम्हारा पुराना जीवन तो कब का ख़त्म हो चुका है और नया जीवन शुरू भी हो
चुका है | सच तो ये है कि मुझे तुम्हारी मृत्यु की कोई
निश्चित जानकारी नहीं है लेकिन मैं यह सत्य ज़रूर जानता हूँ कि हम सभी को एक न एक
दिन इस संसार से जाना ज़रूर है | जब हम इस सच्चाई को भूल जाते
हैं कि हम यहाँ हमेशा के लिए नहीं है तो हम अनेक बंधनों और अवगुणों की जंजीरों से
खुद को जकड़ लेते हैं | जब हमें इस बात का एहसास बना रहता है
कि हमें इस संसार से एक न एक दिन चले जाना है तो हम बुराइयों और मिथ्या बंधनों से
बचे रहते हैं | तुम्हारे भीतर भी इतने बदलाव इसीलिए आए
क्योंकि तुमने पिछले उनतालीस दिन यह सोचकर बिताए कि तुम्हें इस दुनिया से चले जाना
है | तुम अपने सभी अधूरे कामों को पूरा करते रहे और बुराइयों
से दूर बने रहे |”
इसी तरह से हमें भी हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए कि हम
इस संसार में एक ख़ास मकसद से आए हैं हमारे हैं पास भी थोड़ा ही समय है | हम न तो कुछ साथ लाए थे और न ही साथ ले जाएँगे | हमें
जल्दी से जल्दी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लेना चाहिए और उस लक्ष्य को हासिल करने
की दिशा में काम करना चाहिए | जब हम अपने कार्यों को इस सोच
के साथ करेंगे तो सभी बुराइयों और बंधनों से दूर बने रहेंगे | - रश्मि
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