आत्मसम्मान
एक कुम्हार मिट्टी से सामान बना रहा था | पास ही अनेक घड़े, दिए, मूर्तियां, गुल्लकें बनी रखीं थीं| सभी आपस में बातें कर रहे थे |
घड़े ने दीयों से कहा– “तुम सभी कितने सुन्दर हो भिन्न-भिन्न आकृतियों के | एक हम हैं... सब के सब मोटे-मोटे | ज़रा-सा जो ढलक जाएँ तो तुरंत टूट जाएँ |”
पास बैठे दीये घड़े की बात सुन रहे थे | एक दीया बोला– “अरे ! कहाँ घड़े काका, हमारा आकर तो देखो आपके आगे कितना छोटा है | हम तो इतने छोटे हैं कि किसी कोने या सामान के पीछे कब दब जाएँ, टूट जाएँ.... पता भी न चले | हमारी बजाए तो ये मूर्तियाँ कहीं ज्यादा सुन्दर हैं | काश ! हम भी मूर्ति होते |”
दीये और घड़े की बातचीत सुनकर मूर्तियाँ भी कुछ उदास हो उठीं | एक मूर्ति बोली– “दीये भैया, ये आप क्या कह रहे हैं ! आपको नहीं पता कि हमें इस आकर को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है | अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं | हमें तो गुल्लक बनना पसंद था | काश ! हम गुल्लक होते तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते |”
गुल्लकें जो कि काफी देर से सबकी बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं | एक गुल्लक विफर पड़ी और बोली– “आप सभी हमारा दर्द नहीं समझ पाएँगे | हम से बड़ा दुर्भाग्यशाली और कोई नहीं होगा | लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे किन्तु इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी ही निर्ममता से जमीन पर पटक कर तोड़ देते हैं | अब आप ही बताइए क्या आपको कोई ऐसे निर्ममता से तोड़ता है ? आप में से सभी स्वतः ही टूट जाएँ तो और बात है किन्तु कोई निर्दयतापूर्वक तोड़ता नहीं है | इसीलिए मुझे तो अपने अलावा आप में से सभी की ज़िन्दगी पसंद है |”
इधर कुम्हार की चक्की जल्दी-जल्दी अपना काम भी करती जा रही थी और इन सभी की तकलीफें भी सुनती जा रही थी | जब उसका काम समाप्त हो गया तो उसने सभी के साथ प्रेमपूर्वक बातचीत शुरू कर दी |
उसने घड़े को समझाया– “तुम बहुत ही उपयोगी हो | क्या तुम्हें पता है कि तुम अपने शीतल जल से लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक संग्रह करते हैं |”
फिर वह दीये से बोली– “तुम आकार में बेशक बहुत छोटे हो लेकिन तुम्हारे भीतर से अनंत प्रकाश फूटता है | तुम मंदिरों में जगह पाते हो.. तो कभी-कभी घरों और देहरियों को जगमगाते हो |”
अब उस चक्की ने मूर्तियों की तरफ देखते हुए कहा– “तुम्हारी शोभा इसीलिए तो चौगुनी हो जाती है क्योंकि तुम इतनी तकलीफ सहती हो | और जानती हो ! इसीलिए तुम संसार भर के लोगों के घरों, मंदिरों, दफतरों की शोभा बढाती हो |”
आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा– “तुम सभी बहुत कीमती हो | तुम बच्चों की ख़ुशी हो... तो गरीब का आसरा हो | तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो |”
इस प्रकार वह चक्की उन माटी की चीजों के साथ-साथ हम मनुष्यों को भी ये सीख दे गई कि हमें अपने गुणों को पहचान कर खुद का सम्मान करना चाहिए | दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए | अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं, हमें स्वयं अपना मोल पहचानना चाहिए |— रश्मि
एक कुम्हार मिट्टी से सामान बना रहा था | पास ही अनेक घड़े, दिए, मूर्तियां, गुल्लकें बनी रखीं थीं| सभी आपस में बातें कर रहे थे |
घड़े ने दीयों से कहा– “तुम सभी कितने सुन्दर हो भिन्न-भिन्न आकृतियों के | एक हम हैं... सब के सब मोटे-मोटे | ज़रा-सा जो ढलक जाएँ तो तुरंत टूट जाएँ |”
पास बैठे दीये घड़े की बात सुन रहे थे | एक दीया बोला– “अरे ! कहाँ घड़े काका, हमारा आकर तो देखो आपके आगे कितना छोटा है | हम तो इतने छोटे हैं कि किसी कोने या सामान के पीछे कब दब जाएँ, टूट जाएँ.... पता भी न चले | हमारी बजाए तो ये मूर्तियाँ कहीं ज्यादा सुन्दर हैं | काश ! हम भी मूर्ति होते |”
दीये और घड़े की बातचीत सुनकर मूर्तियाँ भी कुछ उदास हो उठीं | एक मूर्ति बोली– “दीये भैया, ये आप क्या कह रहे हैं ! आपको नहीं पता कि हमें इस आकर को पाने के लिए कितनी तकलीफ सहनी पड़ती है | अपने अंगों को जगह-जगह से सुडौल आकार देने की खातिर कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं | हमें तो गुल्लक बनना पसंद था | काश ! हम गुल्लक होते तो सब हमारे भीतर खूब सारे पैसे रखते |”
गुल्लकें जो कि काफी देर से सबकी बातें सुन रहीं थीं, वे भी विचलित हो उठीं | एक गुल्लक विफर पड़ी और बोली– “आप सभी हमारा दर्द नहीं समझ पाएँगे | हम से बड़ा दुर्भाग्यशाली और कोई नहीं होगा | लोग हमारे भीतर अपनी सबसे प्रिय वस्तु ‘अपना पैसा’ संचित करते हैं ताकि वह इधर-उधर न पड़ा रहे और सुरक्षित रहे किन्तु इसी पैसे की खातिर वे लोग एक दिन हमें बड़ी ही निर्ममता से जमीन पर पटक कर तोड़ देते हैं | अब आप ही बताइए क्या आपको कोई ऐसे निर्ममता से तोड़ता है ? आप में से सभी स्वतः ही टूट जाएँ तो और बात है किन्तु कोई निर्दयतापूर्वक तोड़ता नहीं है | इसीलिए मुझे तो अपने अलावा आप में से सभी की ज़िन्दगी पसंद है |”
इधर कुम्हार की चक्की जल्दी-जल्दी अपना काम भी करती जा रही थी और इन सभी की तकलीफें भी सुनती जा रही थी | जब उसका काम समाप्त हो गया तो उसने सभी के साथ प्रेमपूर्वक बातचीत शुरू कर दी |
उसने घड़े को समझाया– “तुम बहुत ही उपयोगी हो | क्या तुम्हें पता है कि तुम अपने शीतल जल से लोगों की प्यास बुझाते हो और कुछ लोग तो तुम्हारे भीतर अपना अनाज तक संग्रह करते हैं |”
फिर वह दीये से बोली– “तुम आकार में बेशक बहुत छोटे हो लेकिन तुम्हारे भीतर से अनंत प्रकाश फूटता है | तुम मंदिरों में जगह पाते हो.. तो कभी-कभी घरों और देहरियों को जगमगाते हो |”
अब उस चक्की ने मूर्तियों की तरफ देखते हुए कहा– “तुम्हारी शोभा इसीलिए तो चौगुनी हो जाती है क्योंकि तुम इतनी तकलीफ सहती हो | और जानती हो ! इसीलिए तुम संसार भर के लोगों के घरों, मंदिरों, दफतरों की शोभा बढाती हो |”
आखिर में उसने गुल्लकों की और बड़े प्यार से देखते हुए कहा– “तुम सभी बहुत कीमती हो | तुम बच्चों की ख़ुशी हो... तो गरीब का आसरा हो | तुम लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आकर अपना जीवन सार्थक कर देती हो |”
इस प्रकार वह चक्की उन माटी की चीजों के साथ-साथ हम मनुष्यों को भी ये सीख दे गई कि हमें अपने गुणों को पहचान कर खुद का सम्मान करना चाहिए | दूसरों के साथ अपनी तुलना करके खुद को कमतर नहीं आंकना चाहिए | अपनी-अपनी जगह पर हम सभी उपयोगी हैं, हमें स्वयं अपना मोल पहचानना चाहिए |— रश्मि
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