ईश्वर : सबसे बड़ा हितैषी
एक
बार पिता और पुत्र कहीं चले जा रहे थे | वे चलते-चलते थक गए
और एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगे | पेड़ पर सुन्दर और
रसीले फल लगे थे | पिता अपने पुत्र से बेहद प्रेम करता था |
उसे चिंता हुई कि उसका बेटा भूखा होगा इसलिए उसने दो-तीन फल तोड़े और
पुत्र को दे दिए | पुत्र फल खाने लगा | एक के बाद दूसरा.... फिर तीसरा.... वह रुक ही नहीं रहा था | पिता ने सोचा- ‘हद है ! क्या ये फल इतने स्वादिष्ट
हैं कि एक के बाद एक खाए जा रहा है, मुझे दे ही नहीं रहा !
मुझे भी खाकर देखना चाहिए |’
पिता से रहा नहीं गया और उसने जल्दी-से
एक आखिरी बचा फल खाने के लिए उठाया तो पुत्र वह भी लेने का प्रयास करने लगा | लेकिन पिता ने झट से वह फल अपने मुँह में
डाल लिया |
.....उसमें तो कोई स्वाद ही नहीं था, बल्कि यह तो बिल्कुल ज़हर के समान
कडवा-कसैला था | पिता हैरान रह गया |
उसने पुत्र से पूछा - ‘बेटा ! तुम
कुछ बोले क्यों नहीं | तुम्हें मना कर देना चाहिए था,
आखिर इतने कड़वे फलों को आराम से क्यों खा रहे थे !’
पुत्र ने ज़वाब दिया – ‘आप हमेशा
मेरी ख़ुशी के बारे में ही सोचते हैं, मेरी सुख-सुविधाओं का
ख्याल रखते हैं | यदि कोई वस्तु कम हो तो आप खुद न लेकर मुझे
दे देते हैं | आपने मुझे इतनी सारी स्वादिष्ट चीज़ें खाने को
दीं, यदि आज आपके ही द्वारा दिए कुछ कड़वे फल मैंने खा लिए तो
क्या हुआ |’
पिता की आँखों में प्रेम के आँसू आ गए और उसने अपने पुत्र को गले से
लगा लिया |
इसी तरह का सम्बन्ध हमारा ईश्वर के साथ भी है | ईश्वर हमें अनगिनत खुशियाँ देता है | इसके बावज़ूद हम
और... और मांगते रहते हैं, कभी संतुष्ट नहीं होते | हम हमेशा लेते रहते हैं और मुस्कुराते रहते हैं किन्तु वह न दे तो
शिकायतें करने लगते हैं | हमें उसकी मंशा को समझना चाहिए,
वह जो भी करता है हमारे भले के लिए ही करता है | हमें हमेशा ईश्वर की दी हर चीज़ का सम्मान करना चाहिए | वह हमारा परम-पिता है, हमेशा हमारी खुशियों और भलाई
के बारे में ही सोचता है, इस बात का विश्वास रखना चाहिए |
यदि वह हमें दुःख भी दे तो नाराज़ नहीं होना चाहिए बल्कि सोचना चाहिए
कि ‘इसके पीछे भी ईश्वर का कोई ख़ास उद्देश्य ही होगा |
वह हमारा भला हमसे बेहतर जानता है अतः यह दुःख भी उसी बेहतरी के लिए
ही होगा | आखिरकार वही तो हमारा परमपिता है और सबसे बड़ा
हितैषी भी |’
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