शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

'रेल की यात्रा'

हमारा जीवन 'रेल की यात्रा' के जैसा है | एक ऐसी यात्रा, जिसमें अनेक स्टेशन आते हैं और दुर्घटनाएं भी होतीं हैं | हमारे इस सफ़र की शुरुवात हमारे माता-पिता के साथ होती है क्योंकि वे दोनों ही हमारे लिए इस सफ़र का टिकिट लेते हैं | अपने छुटपन में हम ये सोचते हैं कि वे इस ट्रेन में हमेशा हमारे साथ चलेंगें लेकिन वे दोनों भी अपने-अपने स्टेशनों पर चुपचाप उतर जाते हैं और हमें इस सफ़र पर अकेले आगे बढ़ने के लिए छोड़ जाते हैं | .....और फिर समय के साथ-साथ ये ट्रेन आगे बढ़ती जाती है और अलग-अलग स्टेशनों में हमें अनेक सहयात्रियों से मिलवाती है– वे सहयात्री हमारे भाई-बहन, मित्र, रिश्तेदार, प्रेमी, जीवन-साथी, बच्चे, दोस्त-दुश्मन आदि अनेक रूपों में आकर हमसे जुड़ते हैं और इस सफर के हिस्सेदार बनते हैं | धीरे-धीरे ये सब भी अपने-अपने स्टेशनों पर उतर जाते हैं| हम इनके उतर जाने पर बेहद उदास हो जाते हैं और इस सफर से उकता भी उठते हैं| किन्तु सच तो ये है कि जिस प्रकार हमारे जीवन की रेलगाड़ी में उनका चढ़ना हम तय नहीं करते उसी प्रकार से उनका उतरना भी हमारे वश में नहीं होता|

ज़िन्दगी की इस रेल में किसी स्टेशन पर हम अपने भाइयों को पाते हैं तो किसी में मित्रों को| कहीं कोई माँ-स्वरुपा मिल जाती है तो कोई हमारे गुरु-तुल्य बन जाते हैं| हमें हमारा प्यार भी अचानक किसी स्टेशन पर मिल जाता है| कोई हमसे स्वार्थ वश जुड़ जाता है तो किसी से नियति मिलवा देती है और हम अंत तक उससे प्रेम और जुड़ाव का कारण नहीं जान पाते| इस सफ़र में किसी-किसी से दिल इतने मिल जाते हैं कि हम अक्सर उन स्टेशनों से आगे बढ़ना ही नहीं चाहते और कभी-कभी कुछ ऐसे स्टेशन भी मिलते हैं जहाँ हम पल भर भी ठहरना नहीं चाहते, किन्तु हमारे जीवन का ये सफ़र बिना रुके अपनी ही गति और मर्ज़ी से चलता रहता है| हमारे जीवन में किसी का आना या किसी का चले जाना हमारी मर्ज़ी पर निर्भर नहीं है| कुछ लोग बहुत दूर तक हमारे साथ चलते हैं तो कुछ लोग चंद क़दमों के साथ से ही उकता जाते हैं| यहाँ सबसे बड़ी बात ये है कि जिस प्रकार से उनका हमारे जीवन में आना हमारे वश में नहीं है उसी प्रकार से उन्हें हम अपने जीवन से निकाल भी नहीं सकते|

इसलिए बेहतर यही है कि हम अपने जीवन को अनवरत हर्ष और उल्लास के साथ चलाते रहें| जब जब हमारे साथ की सीट पर कोई आकर बैठे तो उसे भरपूर स्नेह दें और जब अकेले हो जाएँ तो अगले स्टेशन का इंतज़ार करें क्योंकि वहाँ कोई न कोई हमारे इंतज़ार में बैठा है ; यकीनन इस सफर में कोई अकेला नहीं होता | लोग बस मिलते-बिछड़ते रहते हैं | किसी के साथ इस कदर भी न जुड़ें कि उसका स्टेशन आने पर व्याकुल हो उठें और किसी के साथ इतना भी उदासीन न हो जाएँ कि सफर काटना मुश्किल हो जाए |


हमारा सोशल मीडिया का ये सफर भी तो ‘रेल के सफर’ के समान ही है जहाँ अनेक स्टेशनों पर आप सभी लोग कभी मित्र बनकर, कभी भाई-बहन बनकर तो कभी गुरु बनकर और मार्गदर्शक बनकर हमसे आ जुड़ते हैं | तो मित्रों! क्यों न अपने जीवन के इस सफर को और खुशनुमा बनाया जाए अनेक मीठी यादें दी जाएँ ली जाएँ | आखिर चलना तो हम सबको साथ ही है | है न ? – आपकी रश्मि          

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